परिकल्पना के प्रकार - Types of Hypothesis

 परिकल्पना के प्रकार - Types of Hypothesis


सामाजिक विज्ञानों में कई प्रकार की परिकल्पनाओं का प्रयोग किया जाता है। सामाजिक घटनाओं तथ्यों एवं समस्याओं की प्रकृति अति जटिल होती है, इसलिए वैज्ञानिक शोध में अनेक प्रकार की परिकल्पनाएं प्रयोग में लाई जाती हैं। इन परिकल्पनाओं को मोटे रूप में तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है :


(1) वर्णनात्मक परिकल्पना :


वे परिकल्पनाएँ जो किसी घटना, वस्तु अथवा व्यक्ति आदि की विशेषताओं को दर्शाती हैं, जैसे किसी कॉलेज के 30 प्रतिशत विद्यार्थी सिगरेट पीते हैं या किसी समुदाय में 8 वर्ष से नीचे की बालिकाओं की संख्या 25 प्रतिशत है, या किसी दफ्तर में केवल 10 प्रतिशत कर्मचारी सही समय पर नहीं आते हैं।

इस प्रकार की परिकल्पनाओं वाले अध्ययनों में कुछ नए तथ्यों को संकलित कर परिकल्पना की पुष्टि या उसका खंडन किया जाता है। ऐसी परिकल्पनाओं का मुख्य उद्देश्य किसी घटना अथवा किसी समुदाय की विशेषताओं का वर्णन करना मात्र होता है। सांख्यिकीय अर्थों में, ऐसी परिकल्पनाओं को एक चर परिकल्पना कहा जाता है जिसमें केवल चर के वितरण को प्रदर्शित किया जाता है। समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में विभिन्न जनजातीय समूहों और समुदायों के प्रारंभिक अध्ययन वर्णनात्मक प्रकार के ही थे।


(2) संबंधात्मक परिकल्पना : 


दो या दो से अधिक चरों के बीच संबंधों को दर्शाने वाली परिकल्पनाएं संबंधात्मक परिकल्पनाएं कहलाती हैं। दुर्खीम द्वारा आत्महत्या संबंधी निर्मित परिकल्पनाएं इसी श्रेणी में आती हैं, जैसे


• विवाहितों की अपेक्षा अविवाहित अधिक आत्महत्या करते हैं।


• कैथोलिक लोगों की अपेक्षा प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायी अधिक आत्महत्या करते हैं।


• लड़कों की अपेक्षा लड़कियां अधिक मेहनती होती हैं।


सांख्यिकीय दृष्टि से, संबंधात्मक परिकल्पनाओं के दो प्रमुख रूप हैं पहला द्विचर परिकल्पना, ऐसी परिकल्पनाओं में दो चरों के बीच संबंध प्रकट किया जाता है. जैसे बढ़ती हुई जनसंख्या अपराध की दर में भी वृद्धि करती है. भारत में प्रजातांत्रिक प्रक्रिया ने जातीय निष्ठा में वृद्धि की है। दूसरा बहुचर परिकल्पना, दो से अधिक चरों के मध्य संबंधों को प्रदर्शित करने वाली परिकल्पना को बहुचर परिकल्पना कहते हैं, जैसे किसी स्थान पर जितना ही अधिक जनसंख्या का घनत्व होगा.

वहां नशीले पदार्थों के सेवन की प्रवृत्ति और अपराध कि दर उतनी ही अधिक तथा शिक्षा का स्तर निम्न होगा। इस परिकल्पना में जनसंख्या के घनत्व को तीन चरों नशीले पदार्थों, अपराध और शिक्षा के स्तर के साथ जोड़ा गया है। इस प्रकार की परिकल्पना को जटिल परिकल्पना भी कहा जाता है। ऐसी परिकल्पनाओं में स्वतंत्र चर की संख्या आश्रित चर से कम होती है। उपरोक्त उदाहरण में जनसंख्या का घनत्व' स्वतंत्र चर है, जो एक ही है और इस पर आश्रित चर तीन हैं, नशीले पदार्थ, अपराध और शिक्षा स्वतंत्र चर में परिवर्तन आश्रित चरों को भी प्रभावित करता है। 


(3) कारणात्मक परिकल्पना :


संबंधात्मक परिकल्पना का एक रूप कारणात्मक परिकल्पना' के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें विभिन्न चरों के बीच कारणात्मक संबंधों को प्रदर्शित किया जाता है।

इसमें किसी विशिष्ट चर को अन्य चरों के उत्पन्न होने के कारण या कारण के रूप में दर्शाया जाता है, जैसे- शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था के अनुभव प्रौढ़ व्यक्तित्व के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यहां ऊपर बताए गए बहुचरीय परिकल्पना के उदाहरण भी कारणात्मक परिकल्पनाएं ही हैं, जिनमें स्वतंत्र चर 'कारण' और आश्रित चर प्रभाव को प्रकट करता है।


इन तीन चरों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य प्रकार की परिकल्पनाएं महत्वपूर्ण हैं :


(1) शून्य परिकल्पना शून्य अर्थात निष्प्रभावी एक ऐसी परिकल्पना है, जिसके द्वारा दो या दो से अधिक चरों के बीच शून्य संबंधों को दर्शाया जाता है।

शून्य संबंधों से तात्पर्य किसी प्रकार के संबंध या अंतर न होने से है, जैसे X और Y के बीच कोई संबंध नहीं है, या यह कहना कि "लड़कियों और लड़कों के औसत बुद्धि में कोई अंतर नहीं है" या "एक समूह का औसत शून्य के बराबर है" या " औसतों के बीच कोई अंतर नहीं है"। वास्तव में, शून्य परिकल्पना शोध परिकल्पना का उल्टा रूप होता है जो शोध परिकल्पना में प्रदर्शित चरों के बीच के संबंधों को नकारता है।


(2) शोध परिकल्पना किसी सामाजिक तथ्य या घटना के बारे में शोधकर्ता की प्रस्थापना या समस्या को शोध परिकल्पना कहते हैं। इसमें घटना या तथ्य के विशिष्ट गुणों का उल्लेख नहीं होता है।

शोधकर्ता उक्त प्रस्थापना के बारे में यह अनुभव करता है कि यह सही है और वह चाहता है कि इसे गलत सिद्ध किया जाए। सामान्यतः शोध परिकल्पनाओं की रचना किन्ही सिद्धांतों के आधार पर होती है या इन परिकल्पनाओं के आधार पर सिद्धांतों की रचना की जाती है। दुर्खीम के सामाजिक एकीकरण के सिद्धांत के आधार पर आत्महत्या संबंधी परिकल्पनाएं शोध परिकल्पना के अच्छे उदाहरण हैं। अन्य उदाहरण यह हो सकते हैं- मुसलमानों की अपेक्षा ईसाइयों के कम संतानें होती हैं एवं गरीब विद्यार्थियों की अपेक्षा धनी विद्यार्थी नशीले पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं।


(3) वैकल्पिक परिकल्पना : नल अथवा शून्य की अस्वीकृति के उपरांत जिस परिकल्पना को स्वीकार किया जाता है. उसे वैकल्पिक परिकल्पना कहते हैं।

नल और वैकल्पिक परिकल्पनाओं का एक अत्यंत सरल उदाहरण सिक्के के उछालने का दिया जा सकता है। किसी सिक्के को कई बार उछालने के बाद यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि सिक्का ठीक भी है अथवा नहीं। इस बारे में दो संभावनाएं हैं पहला सिक्का ठीक है दूसरा सिक्का ठीक नहीं है। इन दोनों वैकल्पिक निर्णयों में से शोधकर्ता को एक निर्णय लेना है। मान लीजिए, वह इस निर्णय से प्रारंभ करता है कि सिक्का ठीक है। यह प्रारंभिक परिकल्पना जिसे परीक्षण के लिए स्वीकार किया गया है. नल परिकल्पना और दूसरी, अर्थात सिक्का ठीक नहीं है, वैकल्पिक परिकल्पना कहा जाएगा। इन दोनों परिकल्पनाओं के निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं-


वैकल्पिक परिकल्पना पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां मंदिर अधिक जाती हैं। नल परिकल्पना - पुरुषों और स्त्रियों में मंदिर जाने की प्रवृत्ति में कोई अंतर नहीं पाया जाता है।


(4) कार्यवाहक अथवा कार्यकारी परिकल्पना शोध विषय के बारे में प्रारंभिक अनुमान को कार्यवाहक या कार्यकारी परिकल्पना कहते हैं। इस परिकल्पना की रचना की जरूरत तब पड़ती है जब हमें शोध विषय और उसके क्षेत्र की अधूरी या बहुत कम जानकारी होती है, जिसके आधार पर एक पूर्णता निश्चित परिकल्पना बनाई जा सके। दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों या चांद और मंगल की खोज करने वालों ने अपनी खोज की शुरुआत इसी प्रकार की कार्यकारी परिकल्पनाओं में से की होगी। चांद या मंगल ग्रह पर पानी और ऑक्सीजन हो सकता है, यह एक कार्यकारी परिकल्पना ही है। कार्यकारी परिकल्पना को हम मूल शोध परिकल्पना का प्रथम कदम कह सकते हैं। चुंकी इस परिकल्पना का कोई ठोस आधार नहीं होता, अतः इसे कुछ लेखकों ने एक चतुर अनुमान भी कहा है। इस प्रकार की परिकल्पना का प्रयोग एक सुनिश्चित शोध योजना बनाने के एक आधार के रूप में किया जाता है। बिना इस प्रकार की परिकल्पना के शोध अंधेरे में किसी वस्तु की खोज के समान है।