विवाह के प्रकार - Types of Marriage

 विवाह के प्रकार - Types of Marriage


विभिन्न समाजों में विवाह के स्वरूप भिन्न-भिन्न हैं, इन्हें मुख्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है


1. एक विवाह (Monogamy) एक विवाह, विवाह का वह स्वरूप है, जिसमें एक समय में एक स्त्री एवं पुरूष एक पुरूष एवं एक ही स्त्री से विवाह करते हैं। वर्तमान में एक विवाह को विवाह का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप माना जाता है एवं अधिकांश समाजों में यही स्वरूप प्रचलित है। हमारे देश में भी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के द्वारा एक विवाह को आवश्यक माना गया है। अर्थात हमारा संविधान एक विवाह के स्वरूप की ही अनुमति देता है। जनजातीय समाज भी परिवर्तन का अपवाद नहीं है। उनके बीच भी विवाह का यही स्वरूप दिखाई देता है। यद्यपि उनके परंपरागत सामाजिक संरचना में अन्य स्वरूपों का अस्तित्व अभी बचा हुआ है।


पिडिगटन का कथन है एक विवाह, विवाह का वह स्वरूप है जिसमें किसी एक समय कोई भी पुरूष एक से अधिक स्त्रियों से विवाह नहीं कर सकता।” इससे स्पष्ट होता है कि एक विवाह जीवन में केवल एक बार ही विवाह करना नहीं है

बल्कि यह वह नियम है जिसके अंतर्गत एक पत्नी अथवा एक पति के रहते हुए कोई पक्ष दूसरी स्त्री अथवा दूसरे पुरूष से विवाह नहीं कर सकता। एक विवाह प्रत्येक समाज में विवाह का सर्वोत्तम नियम माना जाता है। मुसलमानों में बहुत से शिया लोग एक विवाह को मानते हुए भी इसे अस्थायी रूप देने में संकोच नहीं करते वास्तविकता यह है कि एक निश्चित समय के लिए किए गए अस्थायी विवाह को एक विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। एक विवाह में स्थायित्व का गुण होना सबसे अधिक आवश्यक है। साधारणतया जिन समाजों में एक विवाह को सर्वोच्च सामाजिक मूल्य के रूप में देखा जाता है। वहाँ सभी व्यक्तियों पर यौन के क्षेत्र में कठोर नियंत्रण लगाए जाते हैं। इस पद्धति से किए गए विवाह को तोड़ना अत्यधिक कठिन तो होता ही है साथ ही ऐसा करना सामाजिक रूप से अनुचित भी समझा जाता है। इस आधार पर एक विवाह की व्यापकता को स्पष्ट करते हुए वेस्टरमार्क ने लिखा है कि मनुष्य तो क्या पशु और पक्षी भी हमेशा से एक विवाही ही रहे हैं।


A. एक विवाह के कारण


एक विवाह के निम्नलिखित कारण इस प्रकार हैं -


1. एक विवाह का सबसे प्रमुख कारण सभी स्त्री और पुरुषों में ईर्ष्या की भावना होना हैं।

कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि उसके दाम्पत्य अधिकार का बंटवारा अनेक व्यक्तियों में हो जाए इस प्रवृत्ति से एक विवाह को प्रोत्साहन मिलता है।


2. कुछ समाजों को छोड़कर, लगभग सभी समाजों में स्त्री और पुरुषों का अनुपात लगभग समान होता है। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति को केवल एक जीवन साथी का चुनाव करने की ही सुविधा मिल पाती है।


3. प्रत्येक व्यक्ति पारिवारिक संघर्षो से दूर रहने का प्रयत्न करता है। इस इच्छा के कारण भी एक विवाह संख्या में निरंतर वृद्धि होती जा रही है।


4. एक विवाह का एक अन्य प्रमुख कारण समाज में आर्थिक साधनों की कमी होना भी है।


5. अंत में हमारे सामाजिक नियम और वर्तमान कानून भी एक विवाह को ही समाज के लिए आवश्यक समझते हैं।


इन्हीं कारणों के फलस्वरूप कुछ समय पहले के बहुविवाही समूह भी अब एक विवाही बनते जा रहे हैं।


B. एक विवाह के लाभ


एक विवाह के निम्नलिखत लाभ इस प्रकार हैं -


1. विवाह के सभी स्वरूपों में एक विवाह सबसे अधिक न्यायपूर्ण ही नहीं है बल्कि इसमें स्त्री-पुरूष के पारस्परिक अधिकार भी सबसे अधिक सुरक्षित रहते हैं।


2. एक विवाह से बनने वाले परिवार कहीं अधिक स्थायी और संगठित होते हैं। क्योंकि उनमें सघर्ष होने की सम्भावना बहुत कम रहती है।


3. ऐसे परिवारों में बच्चों की देख-रेख शिक्षा और अनुशासन का सबसे अच्छा प्रबंध सम्भव हो पाता है।


4. इन विवाहों के द्वारा समाज में स्त्रियों को उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है। ऐसा इस कारण है कि विवाह से संबंधित दोनों पक्षों को एक दूसरे को समझने का काफी अवसर मिल जाता है। 


5. एक विवाह ने मानसिक स्थिरता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका कारण यह है कि एक विवाह से ही व्यक्ति अपने साधनों और अवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित कर पाता है।


C. एक विवाह की हानियां


यद्यपि एक विवाह अधिकांश सामाजिक गुणों से युक्त है। लेकिन तो भी कुछ विचारकों का कहना है कि एक विवाह के कारण समाज में अनैनिकता संबंधी दोष उत्पन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि व्यक्ति को प्रत्येक समय अपना जीवन कठोर संयम में व्यतीत करना कभी-कभी कठिन महसूस होता है। यह भी कहा जाता है कि एक विवाह एकाधिकारी व्यवस्था के समान है और इसमें स्त्रियों का शोषण होने की सम्भावना भी बढ जाती है।

वास्तविकता यह है कि एक विवाह की ऐसी आलोचनाएं उचित नहीं है। यह प्रमाणित हो चुका है कि विवाह की सभी पद्धतियों में केवल एक विवाह ही ऐसी पद्धति है जिसमें सामाजिक जीवन अधिक प्रगतिशील बन सकता है।


2. बहुविवाह (Polygamy) - बहुविवाह, विवाह का वह स्वरूप है जिसमें एक पुरूष एक से अधिक स्त्रियों से अथवा एक स्त्री एक से अधिक पुरुषों से विवाह करती/करती है। बहुविवाह मुख्यतः दो प्रकार से होते हैं


1. बहुपत्नी विवाह (Polygyny) जब एक पुरूष एक समय में एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है, तो इसे बहुपत्नी विवाह कहते हैं। इस प्रकार के विवाह गोंड, भील, बैगा, टोडा, लुशाई एवं नागा जनजातियों में पाए जाते हैं।


बहुपत्नी विवाह का सबसे प्रमुख कारण किसी समाज में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या का अधिक होना है। उदाहरण के लिए अधिकांश जनजातियों में स्त्रियों का अनुपात पुरूषों से अधिक होने के कारण वहाँ बहुपत्नी विवाह का प्रचलन पाया जाता है। इस प्रथा का दूसरा कारण पुरूष में नवीनता और साथ ही एकाधिकार की भावना का आधिक्य होना है।

कभी-कभी पहली पत्नी से संतान न होने के फलस्वरूप भी बहुपत्नी विवाह को प्रोत्साहन मिलता है। अनेक समाजों में अनेक पत्नियों का होना सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा का सूचक बन जाता है। जिसके कारण सम्पन्न व्यक्ति एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करने लगते हैं।


अनेक मानव समूह ऐसे हैं जिनमें स्त्रियाँ जीविका उपार्जित करने में पुरुषों की बहुत सहायता करती हैं इसके फलस्वरूप पुरूष अनेक स्त्रियों से विवाह करके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रथा के अनेक लाभों को जैविकीय और आर्थिक क्षेत्र में स्पष्ट किया जा सकता है। इस प्रथा के कारण किसी समूह में अच्छे वंशानुक्रम की संतानों के जन्म की सम्भावना बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि बहुपत्नी विवाह करने वाले व्यक्ति साधारणतया उच्च स्थिति के व्यक्ति होते है। स्वाभाविक है कि उनकी संतानों से भी गुणवान होने की आशा की जा सकती है। एक परिवार में अधिक स्त्रियाँ होने से बच्चों के पालन-पोषण में सरलता रहती है। तथा परिवार में श्रम विभाजन के द्वारा सभी दायित्वों को जल्दी ही पूरा कर लिया जाता है। साधारणतया बहुपत्नी विवाह से संबंधित समाजों में अनैतिकता की समस्या बहुत कम होती हैं क्योंकि ऐसे समाजों में पुरुषों के नवीनता की इच्छा परिवार के अंदर ही पूर्ण हो जाती है।


इस प्रथा से लाभ की अपेक्षा हानियाँ बहुत अधिक है जिन्हें प्रमुख रूप से पारिवारिक और सामाजिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। ऐसे विवाहों में स्त्रियों को परिवार में कोई भी सम्मानपूर्ण स्थान नहीं मिल पाता वे केवल कामवासना को संतुष्ट करने का एक साधन बनकर रह जाती हैं। ऐसे विवाहों से संबंधित परिवारों में पारस्परिक कलह, ईर्ष्या और मतभेद की संभावना कहीं अधिक रहती है। जिसके फलस्वरूप अक्सर बच्चों के व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो पाता। बहुपत्नी विवाह की प्रथा सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी उचित नहीं है। यह प्रथा पुरूषों को विशेषाधिकार देकर स्त्रियों का शोषण करती है। इस प्रथा के कारण परिवार में बच्चों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है। सीमित साधनों के कारण उनकी उचित देख-रेख भी नहीं हो पाती जिसके फलस्वरूप एक निरंकुश और अशिक्षित पीढी का निर्माण होता है।


वास्तव में बहुपत्नी विवाह की प्रथा आज तेजी से समाप्त होती जा रही है। इसका प्रमुख कारण वर्तमान सामाजिक अधिनियम, कठिनाइयाँ तथा स्त्री में सामाजिक जागरूकता की वृद्धि होना है।

यद्यपि अनेक सभ्य समाज आज भी धर्म अथवा संस्कृति के नाम पर बहुपत्नी विवाह को बनाए रखने के पक्ष में हैं, लेकिन इसके फलस्वरूप ऐसे समाजों की सामाजिक प्रगति बिल्कुल रूक गयी है। बहुपत्नी विवाह को आज प्रमुख रूप से जनजातीय जीवन तथा मुस्लिम समाज की ही विशेषता समझा जाता है।


2. बहुपति विवाह (Polyandry) - जब एक स्त्री एक समय में एकाधिक पुरूषों से विवाह करती है तो इसे बहुपति विवाह कहते हैं। बहुपत्नी विवाह प्रमुख रूप से जनजातियों के जीवन से ही संबंधित है माईकेल का कथन है “एक स्त्री द्वारा एक पति के जीवित होते हुए अन्य पुरुषों से भी विवाह करना अथवा एक समय पर दो या दो से अधिक पुरुषों से विवाह करने की स्थिति को हम बहुपत्नी विवाह कहते है।" लगभग इन्हीं शब्दों में कपाडिया का कथन है बहुपत्नी विवाह वह संबंध है जिसमें एक स्त्री एक समय में एक से अधिक पुरूषों का वरण कर लेती है अथवा जिसके अंतर्गत अनेक भाई एक स्त्री को पत्नी के रूप में सम्मिलित रूप से उपभोग करते हैं।" वास्तव में बहुपति विवाह की प्रथा आज जनजातियों में भी शिक्षा और सांस्कृतिक संपर्क के प्रभाव से बराबर कम होती जा रही है।


भारत की खस, टोड, कोटा, कुसुम्ब और कम्मल जनजातियों में बहुपति विवाह आज भी देखने को मिलता है। लेकिन अधिकांश जनजातियाँ ऐसी है जो धीरे-धीरे इस प्रथा को छोडती जा रही हैं। बहुपति विवाह की विशेषताओं को प्रमुख रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है -


1. इस प्रथा के अंतर्गत एक स्त्री के अनेक पति आपस में भाई भाई हो सकते हैं अथवा उनका आपस में कोई संबंध नहीं भी हो सकता है।


2. बहुपति विवाह में भी स्त्री के सबसे बड़े पति को दूसरे पतियों की अपेक्षा अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं।


3. यदि एक स्त्री का विवाह अनेक भाइयों के साथ हो तो पारिवारिक अथवा यौनिक अधिकारों के क्षेत्र में भी छोटे भाइयों को बड़े भाई के आदेशों का पालन करना अनिवार्य समझा जाता है।


4. मातृ प्रधान जनजातियों में स्त्री अपनी इच्छानुसार अनेक पुरूषों का पति के रूप में चयन करती है जबकि पितृ प्रधान जनजातियों में अनेक पुरूष मिलकर एक स्त्री का पत्नी के रूप में चुनाव कर लेते है।


5. सामान्यतया इस प्रथा के अंतर्गत बच्चों के पित्त्व का निर्धारण सामाजिक रूप से होता है। 6. विवाह की इस रीति से साधारणतया पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की स्थिति अधिक उँची होती है।


बहुपति विवाह भी दो प्रकार का होता है


1. भ्रातृ बहुपति विवाह


2. अभ्रातृ बहुपति विवाह


1. भ्रातृ बहुपति विवाह (Fraternal Polyandry)- भ्रातृ बहुपति विवाह वह है जिसमें एक स्त्री के अनेक पति आपस में भाई-भाई होते हैं। विवाह का यह रूप 'खस' जनजाति में बहुत स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। खस जनजाति में जब बड़ा भाई किसी स्त्री से विवाह करता है तब उसकी पत्नी सभी छोटे भाइयों की पत्नी मान ली जाती है। यदि छोटे भाई की आयु बहुत कम है तो बडा होने पर उसे एक अन्य स्त्री से भी विवाह करने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन इस नई स्त्री को भी सभी भाइयों की पत्नी के रूप में रहना आवश्यक होता है इससे स्पष्ट होता है कि भ्रातृ बहुपति विवाह में पत्नी पर वास्तविक अधिकार सबसे बड़े भाई का ही होता है यदि कोई भाई एक पृथक पत्नी रखने का प्रयत्न करता है तो उसे परिवार की संपत्ति से वंचित किया जा सकता है। पत्नी से उत्पन्न संतानों का भरण-पोषण करना भी सबसे बड़े भाई का ही दायित्व है। इस प्रथा की प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत साधारणतया सबसे पहली संतान का पिता सबसे बड़े भाई को दूसरी संतान का पिता उससे छोटा भाई की और इसी प्रकार आगे होने वा संतानों के पितृत्व का निर्धारण सामाजिक रूप से होता रहता है।


2. अभ्रातृ बहुपति विवाह (Non-fraternal Polyandry)- यह विवाह का वह रूप है जिसमें अनेक पतियों के बीच किसी प्रकार का रक्त संबंध होना आवश्यक नहीं होता विवाह की यह प्रथा नीलगिरी पहाड़ियों की टोडा जनजाति में पायी जाती है। इस जनजाति में स्त्री के अनेक पति भिन्न-भिन्न स्थानों के निवासी होते है और अपनी इच्छानुसार किसी भी पति के साथ रह सकती है। लेकिन व्यावहारिक रूप से एक पति के साथ रहने की अवधि एक माह से अधिक नहीं होती। इस जनजाति में स्त्री को पुरूष की अपेक्षा अधिक अधिकार मिले होते हैं। बडी मनोरंजक बात यह है कि यदि पत्नी की मृत्यु हो जाय तो उसके सभी पतियों को विधुर जीवन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अभ्रातृ बहुपति विवाह की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बच्चे के पितृत्व का निधारण कैसे किया जाए इसके लिए टोडा जनजाति में ‘परसुतपिमि' संस्कार किया जाता है। अर्थात बच्चे के जन्म के बाद जो पति अपनी पत्नी को धनुष बाण देकर बच्चे का दायित्व लेने की घोषणा करता है उसी को उस बच्चे का पिता स्वीकार कर लिया जाता है। इसके पश्चात भी वास्तविकता यह है कि टोडा जनजाति में भी ऐसे विवाहों का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। कुछ समय पहले की बहुपति विवाही नायर जनजाति भी अब एक विवाही समूह के रूप में बदलती जा रही है।