विवाह के प्रकार -Types of Marriage

विवाह के प्रकार -Types of Marriage


मानव समाज के विकास के साथ-साथ विवाह के भी विभिन्न प्रकार अस्तित्व में आए हैं। पति पत्नी की संख्या के आधार पर विवाह के प्रमुख प्रकारों को हम निम्नांकित प्रकार से हैं -


(1) एक विवाह (Monogamy):- एक विवाह उस विवाह को कहते हैं जिसमें एक स्त्री का विवाह एक समय में एक ही पुरूष से किया जाता है। बुकेनोविक के अनुसार वह विवाह एक विवाह है जिनमें एक स्त्री का विवाह एक समय में एक ही पुरुष के साथ किया जाय जिसमें न केवल एक पुरूष की एक पत्नी या एक स्त्री का एक ही पती हो बल्कि दोनों में से किसी की मृत्यु हो जाने पर भी दूसरा पक्ष अन्य विवाह न करे। विवाह की यह प्रथा सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। वर्तमान में विवाह का यह आदर्श रूप संवैधानिक मान्यता प्राप्त स्वरूप है। बेस्टरमार्क का मानना था कि एक विवाह ही विवाह का आदि स्वरूप है।" मैलिनोवस्की का भी मानना था कि एक विवाह ही विवाह का सच्चा स्वरूप है, रहा या और रहेगा।" शिक्षा एवं सभ्यता के विकास के साथ-साथ एक विवाह का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955" के द्वारा एक विवाह को आवश्यक कर दिया गया है। एक विवाह असम की खासी बिहार की संथाल और केरल की कादर जनजातियों में पाया जाता है। "हो" जनजाति में अत्यधिक कन्यामूल के कारण वहाँ एक पुरुष के लिए एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करना असंभव है. इस कारण वे भी एक प्रकार से एक विवाही हैं।


एक विवाह के लाभ (Merits of Monogamy):


1. एक विवाह से निर्मित परिवार अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होता है।


2. ऐसे विवाहों से निर्मित परिवारों में स्त्री की प्रतिष्ठा ऊँची होती है।


3. एकल-विवाही परिवारों में बच्चे का लालन-पोषण, समाजीकरण एवं शिक्षा का कार्य उचित ढंग से संपन्न होता है।


4. एक- विवाही परिवारों में संघर्ष के अभाव में मानसिक तनाव भी कम पाया जाता है।


5. एक विवाही परिवार का जीवन स्तर ऊंचा होता है।


6. एक विवाही परिवारों में संतानों की संख्या कम होती है, अतः परिवार छोटा एवं सुखी होता है।


एक विवाह के दोष (Demerits of Monogamy)


1. एक-विवाह के कारण यौन अनैतिकता में वृद्धि होती है। इसमें अतिरिक्त यौन संबंध (Extra Merital Sex relation) के अवसर बढ़ जाते हैं। 


2. किसी एक व्यक्ति के न रहने पर परिवार का संतुलन बिगड़ता है।


3. ऐसे विवाह से सृजित परिवार में एकाधिपत्य की प्रवृत्ति पायी जाती है और स्त्रियों का शोषण होता है। एक विवाह इन कमियों की तुलना में इसमें लाभ अधिक है इसलिए वर्तमान में लगभग विश्व के सभी देशों में एक विवाह प्रथा पर अधिक जोर दिया जाता है।


बहुर्विवाह (Polygamy):


जब एकाधिक पुरूष अथवा स्त्रियाँ विवाह बंधन में बंधते हैं तो ऐसे विवाह बहुविवाह कहे जाते


हैं। ये चार प्रकार के होते हैं


(1) बहुपति विवाह


(2) बहुपत्नी विवाह


(3) द्विपत्नी विवाह


(4) समूह विवाह


1. बहुपति विवाह (Polyandry):


डॉ. रिवर्स (सामाजिक संगठन, पृ. 34), "एक स्त्री का कई पुरुषों के साथ विवाह संबंध बहुपति विवाह कहलाता है।"


मिचेल (Mitchel), ‘“एक स्त्री द्वारा एक पति के जीवित होते हुए अन्य पुरूषों से भी विवाह करना या एक समय पर दो से अधिक पुरुषों से विवाह करना बहुपति विवाह है।"

(जी.डी. मिथेल, डिक्शनरी ऑफ सोशियोलॉजी. पू. 134) डॉ. के. एम. कपाड़िया (मैरिज एण्ड फैमिली इन इण्डिया, पू. 134). 


"बहुपति विवाह एक प्रकार का संबंध है, जिसमें एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं या जिसमें सब भाई एक पत्नी या पत्नियों का सम्मिलित रूप से उपभोग करते हैं।


यह प्रथा मुख्यतः भारत के खस, टोडा, कोटा आदि जनजातियों में पायी जाती है तथा अन्य बहुधा प्रकार की जनजातियों में जैसे- एस्कीयमों लोगों में आर्थिक व्यवस्था खराब होने के कारण यह प्रथा पायी जाती है। ग्रीक के अनुसार उत्तर नाइजीरिया की ग्वारी जाति में, पूर्वी अफ्रिका का वाहुमा जनजाति में यह प्रथा प्रचलित है। यह विवाह भी दो रूपों में पाये जाते हैं।


(I) भ्रातृक बहुपति विवाह (Praternal Adelphic Polyandry):- एक स्त्री से विवाह कर लेते हैं अथवा सबसे बड़े भाई की पत्नी स्पष्टः ही अन्य भाइयों की पत्नी मानी जाती है। इसे ही भ्रातृक बहुपति विवाह कहते हैं।


जैसे- खास, टोडा, कोटा, पंजाब के पहाड़ी, भागों, लद्दाख कांगड़ जिले के स्पीती और लाहौर परगनों में यह पाया जाता है।


(II) अभ्रातृक बहुपति विवाह (Non Fraternal Adelohic Polyandry):- इस प्रकार के विवाह में पति परस्पर भाई नहीं होते हैं। स्त्री बारी-बारी से समान अवधि के लिए प्रत्येक पति के पास रहती है। यह प्रथा प्रायः टोडा तथा नायरों में पायी जाती है।


बहुपति विवाह के कारण (Cause of Polandry):


1. वेस्टरमार्क के अनुसार बहुपति विवाह का मुख्य कारण लिंग विवाह का असंतुलन है। 


2. समनर, कनिघम, डॉ. सक्सेना ने निर्धनता को इस प्रकार के विवाहों के लिए उत्तरदायी माना है।


3. जनसंख्या को मार्यादित रखने की इच्छा के कारण भी बहुपति विवाह का पालन किया जाता है।


4. कई समाजों में बहुपति विवाह का कारण वधु मूल्य की अधिकता है। 


5. संपत्ति के विभाजन को रोकने के लिए भी बहुपति विवाह का प्रचलन पाया जाता है।


6. भौगोलिक परिस्थितियां एवं धार्मिक कारण भी बहुपति विवाह के लिए उत्तरदायी है।


बहुपति विवाह के गुण (Marits of Polyandry):


1. इस विवाह के कारण कम संताने पैदा होती है जो जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सहायक है।


2. इसके कारण संपत्ति की संयुक्तता बनी रहती है तथा कृषि योग्य भूमि का भी बँटवारा नहीं होने पाता।


3. इस विवाह के कारण परिवार का विभाजन एवं विघटन नहीं हो पाता है।


4. इस प्रथा के कारण परिवार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने एवं आर्थिक क्रियाओं के संपादन में भी सभी का सहयोग प्राप्त होता है।


दोष (Demerits):


1. इस तथ्य की पुष्टि नहीं हुई है फिर भी माना जाता है कि इस विवाह के कारण खियों में बाँझपन आ जाता है।


2. इस विवाह में लड़कियों की अपेक्षा लड़के अधिक जीवित रहते हैं क्योंकि वंश को चलाने के लिए लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है। इस कारण यहाँ यौन असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।


3. इस विवाह में एक स्त्री कई पुरूषों के साथ संबंध रखती है जिसके कारण कई प्रकार के यौन रोग भी पनपने लगते हैं।


(2) बहुपत्नी विवाह (Polygyne) :- इस प्रकार के विवाहों में एक पुरूष एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है। कपाड़िया का मत है कि भारत में बहुपत्नी विवाह का प्रचलन वैदिक युग से वर्तमान समय तक प्रचलित है। अल्टेकर का मत है कि बहुपत्नी प्रथा धनी, शासक एवं अभिजात वर्गों के लोगों में सामान्य थी, बहुपत्नी विवाह भी दो रूपों में पायी जाती है- सीमित एवं असीमित।


सीमित बहुपत्नी प्रथा में एक स्त्री के मरने पर ही दूसरी स्त्री से विवाह किया जाता है। असीमित बहुपत्नी प्रथा में स्त्री के बांझ होने पर या अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए पुरूष एक से अधिक विवाह करते हैं। मनु, कौटिल्य, आपस्तम्ब आदि ने सैद्धांतिक रूप से बहुपत्नी विवाह को स्वीकार किया है। भारत में बहुपत्नी प्रथा हिंदू व मुसलमानों के अतिरिक्त नागा, गोंड, भील, बैंगा आदि जनजातियों में पाया जाता है। बंगाल में अनुलोम व कुलीन तथा दक्षिण में नंबूदरी ब्राह्मणों में भी यह प्रथा पायी जाती है। वर्तमान में बहुपत्नी में प्रथा कानूनी एवं सामाजिक रूप से समाज में प्रतिबंधित है।