सामाजिक परिवर्तन के प्रकार या प्रारूप - types or forms of social change
सामाजिक परिवर्तन के प्रकार या प्रारूप - types or forms of social change
सभी समाज और सभी कालों में सामाजिक परिवर्तन एक जैसा नहीं होता है। अतः हमें सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप के सन्दर्भ में उसके प्रतिरूप (Patterns), प्रकार ( Kinds) या प्रारूप (Models) पर विचार करना चाहिए। अर्थ की दृष्टि से तीनों शब्दों में काफी भेद है, पर विषय-वस्तु की दृष्टि से समानता। वे सभी एक ही किस्म की विषय-वस्तु के द्योतक हैं। निम्न विवरण से इस तथ्य की पुष्टि हो जाएगी। सामाजिक परिवर्तन के अनेक प्रतिरूप (Pattems) देखने को मिलते हैं। कुछ विचारकों ने सर्वसम्मत, विरोध मत एवं एकीकृत प्रतिमानों की चर्चा की है। मकीवर एवं पेज ने सामाजिक प्रतिरूप के मुख्य तीन स्वरूपों की चर्चा की है. जो इस प्रकार हैं- सामाजिक परिवर्तन कभी-कभी क्रमबद्ध तरीके से एक ही दिशा में निरंतर चलता रहता है भले ही परिवर्तन का आरंभ एकाएक ही क्यों न हो। उदाहरण के लिए हम विभिन्न अविष्कारों के पश्चात् परिवर्तन के क्रमों की चर्चा कर सकते हैं। विज्ञान के अन्तर्गत परिवर्तन की प्रकृति एक ही दिशा में निरंतर आगे बढ़ने की होती है. इसलिए ऐसे परिवर्तन को हम रेखीय (Linear) परिवर्तन कहते हैं।
अधिकांश उद्विकासीय समाजशास्त्री (Evolutionary Sociologists) एक रेखीय सामाजिक परिवर्तन में विश्वास करते हैं। कुछ सामाजिक परिवर्तनों में परिवर्तन की प्रकृति ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाने की होती है, इसलिए इसे उतार-चढ़ाव परिवर्तन (Fluctuating (Changes ) के नाम से भी हम जानते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय सांस्कृतिक परिवर्तन की चर्चा कर सकते हैं। पहले भारत के लोग आध्यात्मवाद (Spiritualism) की ओर बढ़ रहे थे, जबकि आज वे उसके विपरीत भौतिकवाद (Materialism) की ओर बढ़ रहे हैं। पहले का सामाजिक मूल्य 'त्याग' पर जोर देता था, जबकि आज का सामाजिक मूल्य 'भोग' एवं संचय पर जोर देता है। इस प्रतिरूप के अन्तर्गत यह निश्चित नहीं होता कि परिवर्तन कब और किस दिशा की ओर उन्मुख होगा। परिवर्तन के तृतीय प्रतिरूप को तरंगीय परिवर्तन के भी नाम से जाना जाता है। इस परिवर्तन के अन्तर्गत उतार चढ़ावदार परिवर्तन में परिवर्तन की दिशा एक सीमा के बाद विपरीत दिशा की ओर उन्मुख हो जाती है। इसमें लहरों (Waves) की भाँति एक के बाद दूसरा परिवर्तन आता है। ऐसा कहना मुश्किल होता है कि दूसरी लहर पहली लहर के विपरीत है। हम यह भी कहने की स्थिति में नहीं होते हैं कि दूसरा परिवर्तन पहले की तुलना में उन्नति या अवनति का सूचक है। इस प्रतिरूप का सटीक उदाहरण है फैशना हर है समाज में नये-नये फैशन की लहरें आती रहती हैं। हर फैशन में लोगों को कुछ-न-कुछ नया परिवर्तन दिखाई देता है। ऐसे परिवर्तनों में उत्थान, पतन और प्रगति की चर्चा फिजूल है।
वार्तालाप में शामिल हों