विपरीत की एकता एवं संघर्ष का नियम - Unity of Opposite and Law of Conflict
विपरीत की एकता एवं संघर्ष का नियम - Unity of Opposite and Law of Conflict
विपरीत की एकता एवं संघर्ष का नियम द्वंद्वात्मकता का केंद्रीय पक्ष है। यह नियम भौतिक जगत के विकास तथा शाश्वत परिवर्तन के वास्तविक कारण अर्थात् स्रोतों को उजागर करता है। इसके अनुसार वस्तुओं या प्रघटनाओं में आंतरिक प्रवृत्तियाँ तथा शक्तियाँ होती हैं, जो कि परस्पर विपरीत होती हैं। अर्थात् संसार की प्रत्येक वस्तु परस्पर विरोधी तत्वों से बनी हुई है। इन परस्पर विपरीत प्रवृत्तियों अथवा विरोधाभासों के विभिन्न अंतरसंबंध विपरीत की एकता के लिए उत्तरदाई होते हैं। विश्व की वस्तुओं एवं प्रघटनाओं का यह विरोधाभास सामान्य व सार्वभौमिक प्रकृति का होता है। विश्व की कोई भी वस्तु अथवा प्रघटना ऐसी नहीं है, जिसे कि विपरीत में विभक्त न किया जा सके। परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों अथवा विपरीत में सह-अस्तित्व होता है तथा एक के बिना दूसरे के बारे में सोचा नहीं जा सकता। फिर भी, ये विपरीत शक्तियाँ किसी भी वस्तु में शांति से सह-अस्तित्व में नहीं रह सकती। इन विपरीत शक्तियों की परस्पर विरोधी प्रकृति इनमें अनिवार्यतः संघर्ष पैदा करती है। प्रचीन एवं नवीन, नवोदित एवं पुरातन के मध्य संघर्ष पैदा अनिवार्य हैं विपरीत की एकता संघर्ष की एक आवश्यक दशा है. क्योंकि संघर्ष तब ही घटित होता है,
जब किसी एक वस्तु अथवा प्रघटना में विपरीत शक्तियाँ अस्तित्व में होती हैं। प्रायः इन विरोधी शक्तियों में से एक शक्ति यथास्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहती है। इस संघर्ष के कारण अनेक मात्रात्मक परिवर्तनों के पश्चात जब भी परिपक्व अवस्थाएँ अस्तित्व में आती हैं तो एक नई स्थिति, वस्तु, प्रघटना या अवस्था या परिवर्तन का जन्म होता है। यह क्रांतिकारी गुणात्मक परिवर्तन है।
इस प्रकार सभी प्रकार के परिवर्तनों का स्रोत आंतरिक विरोधाभास है। नए विरोधाभासों का प्रादुर्भाव एक नए प्रकार के परिवर्तन को जन्म देता है जबकि इन विरोधाभासों की विलुप्ति एक और नए प्रकार के परिवर्तन का कारण बनती है। इस नए परिवर्तन के लिए अन्य विरोधाभास उत्तरदाई होते हैं। •विपरीत तत्वों में कभी संभावना नहीं आ पाती है। विपरीत तत्वों का समान प्रभाव अस्थाई व सापेक्षिक होता है, जबकि उनके बीच संघर्ष हमेशा चलता रहता है। विपरीत की एकता व संघर्ष के इस अमूर्त नियम को सामाजिक विकास के इतिहास की क्रमिक उत्पादन प्रणाली पर लागू किया जाए तो इसको सरलता से समझा जा सकता है।
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