सार्वभौमिक प्रकार्यावादिता - Universal Functionalism

 सार्वभौमिक प्रकार्यावादिता - Universal Functionalism

मर्टन की दूसरी और ऐमट की तीसरी मान्यता यही है कि प्रत्येक सामाजिक तथ्य का एक प्रकार्य होता है। यह मान्यता विशेष रूप से मैलिनोवस्कीपर आधारित है। मैलिनोवस्कीने लिखा है- "संस्कृति का प्रकार्यात्मक विचार इस सिद्धांत पर बल देता है कि हर प्रकार की सभ्यता में, प्रत्येक प्रथा, भौतिक वस्तु, विचार और विश्वास कोई न कोई आवश्यक प्रकार्य पूरा करता है। क्लकहान ने भी इसकी पुष्टि करते हुए लिखा है- “यही मेरी मौलिक मान्यता है कि कोई संस्कृति का प्रकार जीवित नहीं रहता, यदि कुछ अर्थों में, ऐसे प्रतिउत्तर न रखता हो, जो सामंजस्य या अनुकूलन को उत्पन्न करते हों।”


क्लकहान ने इसको बहुत ही सामान्य रूप से देखने का प्रयत्न किया है। परंपरा से संबंध रखने से की बात को सामान्य रूप से कहा जा सकता है, पर इसका कोई अर्थ नहीं होता। इसको मान लेने से. एक यह भी हानि होती है कि हम कुछ ऐसी प्रथाओं को जो अब (अवशेष मात्र (Survivals) ही रह गई हैं, उनके लिए भी कोई न कोई प्रकार्य ढूंढ़ने लगते हैं।