असम्भावित निदर्शन - unlikely model

  असम्भावित निदर्शन - unlikely model


सामाजिक शोध के कई ऐसे विषय हैं जैसे बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति धूम्रपान करने वाले व्यक्ति, शराबी व्यक्ति, विधवाएं, प्रवासी व्यक्ति इत्यादि, जिनमें संभाव्य विधि का प्रयोग दुष्कर और अनुपयुक्त रहता है। ऐसे विषयों के अध्ययन के लिए उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जानबूझ कर बीमारी से ग्रसित प्रतिदर्श इकाइयों का चयन किया जाता है। असंभावित निदर्शन संभावित निदर्शन के विपरीत होते हैं। इसमें संभावना एवं संयोग का कोई महत्व नहीं होता है। इसलिए ही इसे असंभावित निदर्शन कहते हैं। इसमें निदर्शन की इकाइयों का चयन अनुसंधानकर्ता की इच्छा पर निर्भर करता है। इसमें न तो प्रत्येक इकाई के निदर्शन में सम्मिलित होने के और न उसके चुने जाने की ही संभावना होती है। इसमें तो अध्ययनकर्ता उन इकाइयों का चुनाव करता है जो अध्ययनकर्ता के विषय या समस्या के उद्देश्यों एवं सुविधा के अनुरूप हों। इसमें किसी भी स्तर पर संभाव्य सिद्धांत का प्रयोग नहीं किया जाता है, अतः इन विधियों से निकाले गए निष्कषों की विश्वसनीयता संदिग्ध रहती है, इसके साथ ही इनमें प्रतिदर्श त्रुटि का अनुमान लगाना भी कठिन होता है। 


(अ) कोटा निदर्शन :


कोटा निदर्शन स्तरित तथा उद्देश्यपूर्ण निदर्शन का एक मिश्रित स्वरूप है। इस प्रविधि के अंतर्गत सर्वप्रथम समग्र कि सभी इकाइयों को इन श्रेणियों में विभाजित कर लिया जाता है जैसे- उम्र, लिंग, शिक्षा, भौगोलिक आधार पर घर की बनावट, सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति, नृजातीय पृष्ठभूमि आदि। यह सभी समान रूप में नहीं होते हैं। इसके पश्चात विभिन्न वर्गों अथवा श्रेणियों के तुलनात्मक महत्व को देखते हुए प्रत्येक वर्ग में से चुने जाने वाली इकाइयों की संख्या निर्धारित की जाती है। विभिन्न वर्गों में से चुने जाने वाली इकाइयों की संख्या निर्धारित करते समय अनुसंधानकर्ता के लिए यह आवश्यक नहीं होता कि उनका निर्धारण विभिन्न श्रेणियों की संख्या के अनुपात में ही किया जाए। किसी वर्ग में इकाइयों की संख्या अधिक होने पर भी यदि उसका कार्यात्मक महत्व तुलनात्मक रूप से कम होता है तो उसमें से कम इकाइयों का चुनाव किया जा सकता है।

इसका तात्पर्य है कि अध्ययनकर्ता को प्रत्येक वर्ग अथवा श्रेणी में से उद्देश्यपूर्ण रूप से इकाइयों को चुनने की स्वतंत्रता होती है। इसके पश्चात भी प्रत्येक वर्ग में से इच्छित संख्या में इकाइयों का चयन करने के लिए सदैव निदर्शन की विभिन्न प्रणालियों में से ही किसी एक का उपयोग किया जाता है। ऐसे निदर्शन का चुनाव करने में अनुसंधानकर्ता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। विभिन्न श्रेणियों में से इकाइयों की संख्या का निर्धारण अनुसंधानकर्ता द्वारा करने के कारण ऐसे निदर्शन में वैयक्तिक पक्षपात की संभावना भी बनी रहती है। यही कारण है कि कोटा निदर्शन के आधार पर कोई अध्ययन करना केवल तभी उपयोगी समझा जाता है जब स्तरित निदर्शन के द्वारा प्रतिनिधि इकाइयों का चयन करना संभव न होता हो।


(ब) उद्देश्यपूर्ण निदर्शन :


जब शोधकर्ता किसी विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए प्रतिदर्श इकाइयों का सचेतन रूप से चयन करता है, तब इसे उद्देश्यपूर्ण निदर्शन कहते हैं।

इस प्रकार की विधि में प्रतिदर्श इकाइयों के चुनाव में शोधकर्ता का उद्देश्य, निर्णय या इच्छा ही सर्वोपरि होती है और संयोग के तत्व की अवहेलना की जाती है। यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि एक अच्छे निर्णय के द्वारा एक शोधकर्ता ऐसी प्रतिदर्श इकाइयों का चयन कर सकता है, जो उसके अध्ययन की आवश्यकताओं के अनुसार संतोषजनक हो। उदाहरण के लिए, किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों में नशीली दवाओं और तंबाकू के सेवन करने वालों, शराब या धूम्रपान करने वाले विद्यार्थियों की आदतों, प्रवृत्तियों एवं इसके कारणों का अध्ययन करने में उद्देश्यात्मक निदर्शन का प्रयोग इसलिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है कि इसमें शोध के उद्देश्यानुसार उन्हीं विद्यार्थियों में से चयन किया जाएगा जो उपरोक्त नशीले पदार्थों का प्रयोग करते हैं। यदि इस प्रकार के अध्ययन में हम किसी रेंडम प्रतिचयन विधि का प्रयोग करते हैं तब संभव है

कि हमारे प्रतिदर्श में उचित मात्रा में ऐसी इकाइयों का चयन नहीं हो पाए जो नशीले पदार्थों का प्रयोग करते हों। यही नहीं, रेंडम विधि से प्रतिदर्श में सभी इकाइयां किसी एक वर्ग, जाति या धर्म की सम्मिलित होने की संभावना हो सकती है। ऐसे प्रतिदर्श में अध्ययन की दृष्टि से प्रतिनिधित्वता की कमी आ सकती है। इस प्रकार, यदि हम तलाक या अंतर्जातीय विवाह की समस्याओं का अध्ययन करना चाहते हैं, तब हमें उन्हीं व्यक्तियों में से जानबूझकर चुनाव करना होगा जिनमें तलाक हुआ है या जिन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया है। अति संक्षेप में, उद्देश्यात्मक प्रतिचयन में समग्र में से उन्ही इकाइयों का चुनाव किया जाता है जो शोध के उद्देश्यों को पूरा करती हों या शोध की दृष्टि से विशेष महत्व रखती हो। यह विधि व्यक्तिपरक अवश्य है. किंतु इसमें शोधकर्ता से यह आशा की जाती है कि वह इकाइयों का चुनाव करते समय सभी प्रकार की इकाइयों का चयन कर प्रतिदर्श को अधिकाधिक प्रतिनिधिक बनाने का प्रयत्न करे ताकि यथार्थ निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकें। इस विधि में सामान्य रूप से एक ऐसी व्यूह रचना अपनाई जाती है ताकि उन्ही इकाइयों का चुनाव किया जा सके जो कुछ विशिष्टता रखती हैं और जिनमें शोधकर्ता की रुचि है। इसमें यह माना जाता है कि चयन में निर्णय की त्रुटियां एक-दूसरे को प्रति संतुलित कर देती हैं। 


(स) स्व-चयनित या आकस्मिक निदर्शन:


कभी-कभी अनुसंधानकर्ता को निदर्शन का चुनाव करने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि कुछ व्यक्ति स्वयं अपनी रुचि अथवा जागरूकता के आधार पर निदर्शन का अंग बन जाते हैं। ऐसा निदर्शन साधारणतया संचार के विभिन्न साधनों द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, रेडियो, दूरदर्शन, समाचार पत्रों तथा विभिन्न पत्रिकाओं के माध्यम से अक्सर ऐसी सूचनाएं प्रसारित अथवा प्रकाशित की जाती हैं जिनमें एक विशेष विषय पर लोगों की प्रतिक्रियाओं और विचारों को समझा जा सके। इस स्थिति में जो व्यक्ति अपने विचार अध्ययनकर्ता के पास लिख कर भेज देते हैं, उन्हीं व्यक्तियों को निदर्शन की इकाइयां मान लिया जाता है।

स्पष्ट है कि ऐसे निदर्शन का न तो किसी व्यवस्थित प्रणाली के द्वारा चुनाव किया जाता है और न ही यह निदर्शन विभिन्न वर्गों का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर पाता है। वास्तव में, स्वयं चयनित प्रतिदर्श अथवा निदर्शन एक अत्यधिक सामान्य प्रकृति का निदर्शन है तथा इसका उपयोग बहुत सामान्य प्रकार के अध्ययनों के लिए किया जाता है। ऐसे निदर्शन का उद्देश्य बहुत कम समय में कुछ व्यक्तियों के विचारों को समझकर किसी विषय से संबंधित सामान्य प्रवृत्ति को स्पष्ट करना होता है, कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष प्रस्तुत करना नहीं। 


(द) खण्ड निदर्शन :


इस प्रकार के निदर्शन में संपूर्ण समग्र का अध्ययन न करके किसी एक खंड को सुविधानुसार अध्ययन हेतु चुन लिया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई अनुसंधानकर्ता भोपाल के मतदाताओं का अध्ययन कर रहा है और वह केवल अपने मोहल्ले को निदर्शन की एक खंड के रूप में चुन लेता है

तो इसे खंड निदर्शन कहा जाएगा। उसने अपने मोहल्ले का चयन अपनी सुविधानुसार किया है क्योंकि मोहल्ले वाले उसके परिचित हैं तथा मतदाता के रूप में जो भी जानकारी उसे चाहिए वह उसे उनसे मिल सकती है। 


(य) हिमगेंद (स्नोबॉल) निदर्शन :


असंभावित प्रतिचयन या निदर्शन की यह एक ऐसी तकनीक या विधि है जिसमें शोधकर्ता अपना अध्ययन उन लोगों से शुरू करता है, जिनके बारे में उसे थोड़ी बहुत यह जानकारी है कि ये लोग वे विशिष्ट विशेषताएं रखते हैं, जिनका अध्ययन वह करने जा रहा है। ऐसे लोगों से अध्ययन शुरुआत कर वह इन्हीं व्यक्तियों से यह जानकारी जुटाता है

कि ऐसे अन्य लोग कौन हैं जिनमें यह विशेषता पाई जाती है। इस विधि में, एक से दूसरे के बारे में, दूसरे से तीसरे तथा अन्य के बारे में जानकारी जुटाई जाती है और यह क्रम आगे चलता रहता है। इस प्रकार प्रतिदर्श की मात्रा में तब तक बढ़ोतरी की जाती रहती है जब तक पर्याप्त मात्रा में प्रतिदर्श की प्राप्ति नहीं हो जाती या आगे अन्य कोई ऐसा सूचनादाता नहीं मिलता जो उक्त विशेषता रखता हो और उसके पास शोध विषय के बारे में पर्याप्त जानकारी हो। इसे हिमगेंद प्रतिचयन इसलिए कहा जाता है क्योंकि बर्फ की गेंद बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत पहले थोड़ी सी बर्फ से की जाती है। बाद में उसमें धीरे-धीरे और बर्फ जोड़ते जाते हैं और इस प्रकार यह बर्फ एक गेंद का आकार ले लेती है। इसी प्रकार इस प्रतिचयन विधि में ऐसे दो-चार या कुछ अधिक व्यक्तियों से साक्षात्कार की शुरुआत की जाती है. जो शोध विषय की दृष्टि से उपयुक्त होते हैं। इन्हीं व्यक्तियों से अन्य ऐसे व्यक्तियों के बारे में पूछा जाता है जो उक्त जानकारी रखते हैं। इस प्रकार बर्फ की गेंद के आकार में वृद्धि की भांति प्रतिदर्श का आकार बढ़ता जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा लाभ प्रतिदर्श का छोटा आकार और कम लागत खर्च का होना है, किंतु पूर्वाग्रह इस विधि का सबसे बड़ा दोष है।

इस विधि में पूर्वाग्रह तब आ जाती है जब एक व्यक्ति उसे कोई अन्य व्यक्ति (जो प्रतिदर्श की इकाई है) भी जानता है उसमें पहले व्यक्ति के समान ही गुण होने की अधिक संभावना होती है। 


(र) स्वैच्छिक निदर्शन:


कई बार कुछ व्यक्ति स्वैच्छिक रूप में किसी विषय के बारे में जानकारी देने के लिए तैयार हो जाते हैं। जब ऐसे व्यक्तियों को प्रतिचयन की इकाई बनाया जाता है. तब इसे स्वैच्छिक निदर्शन कहते हैं। कभी-कभी संयोग से ऐसे व्यक्ति से अचानक मुलाकात हो जाती है जो हमारे अध्ययन विषय के बारे में जानकारी रखता है और वह हमें उक्त जानकारी देना चाहता है। इस प्रकार का व्यक्ति हमारे प्रतिदर्श की एक इकाई बन सकता है। संयोगिक प्रतिचयन भी कहा जाता है। सड़क पर चलते हुए किसी राहगीर से अपने अध्ययन से संबंधित सूचनाएं एकत्रित करना इसी प्रकार की प्रतिचयन विधि का एक उदाहरण है।