दूर शिक्षा की उपयोगिता एवं संभावनाएं - Utility and possibilities of distance education

दूर शिक्षा की उपयोगिता एवं संभावनाएं - Utility and possibilities of distance education


दूर शिक्षा के विकासात्मक इतिहास के सूक्षम अध्ययन से स्पष्ट है कि शिक्षा की इस नवीन प्रणाली ने बहुत कम समय में ही पूरे विश्व में अपने को स्थापित कर लिया है। इसके सिद्धांतों से यह भी पता चलता है कि यह शैक्षिक संप्रत्यय मात्र गुब्बारे की तरह फूलने एवं फुस्स हो जाने जैसा नहीं है अपितु यह ठोस वैचारिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह शैक्षिक संप्रतयय निरंतर परीक्षण के दौर से गुजर रहा है जिसके माध्यम से एक नई शैक्षिक संस्कृति के निर्माण का प्रयास हो रहा है। चूंकि दूरवर्ती शिक्षा का प्रारम्भिक उद्भव विकसित देश से हुआ है तथा विकसित एवं विकासशील देशों की सामाजिक, आर्थिक,शैक्षिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों में पर्याप्त अंतर होता है। अतः दूर शिक्षा की उपयोगिता को हमें भारतीय सामाजिक शैक्षिक समस्याओं की दृष्टि से परखना अति आवश्यक है।


दूर शिक्षा की उपयोगिता एवं संभावनाएं को भारतीय संदर्भ में परखने के लिए अपने देश के सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों को निरंतर ध्यान में रखना होगा। हमारी सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियाँ विश्व के अन्य देशों से भिन्न हैं। चूंकि हमारे देश में सामाजिक शैक्षिक समस्याएँ अनेक एवं असीमित हैं तथा यहाँ पर उन सभी की चर्चा कर पाना संभव नहीं है। अतः हम चार प्रमुख मुद्दों पर ही ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करेंगे।


i. भारतीय आर्थिक स्थिति के अंतर्गत सामाजिक राजनैतिक मुद्दे 


ii. शैक्षिक मुद्दे- एक सुधारात्मक शैक्षिक योजना के रूप में दूर शिक्षा की सामाजिक शैक्षिक 


iii. विश्वसनीयता शैक्षिक मुद्दे- दूर शिक्षा एक अनुशासन के रूप में।


IV. दूर शिक्षा के मार्ग में आने वाली सूक्षम एवं वृहद समस्याएँ।


सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे भारत में दूर शिक्षा की उपयोगिता को संदिग्ध सिध्द करने के लिए की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति का एक समीक्षात्मक विश्लेषण करना आवश्यक है। यह विश्लेषण एक प्रश्न के माध्यम से सरलता से प्रारम्भ किया जा सकता है। यह प्रश्न है-


क्या एक सुधारात्मक शैक्षिक व्यूह रचना के रूप में दूर शिक्षा की ओर अग्रसर होना भारतीय आर्थिक स्थिति के अंतर्गत सामाजिक राजनाइटिक दृष्टि से न्याय संगत है ?


इस प्रश्न का समाधान एचएम एक शैक्षिक एकल अध्ययन (Educational Case Study ) के विश्लेषण के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। इस केश स्टडी के विश्लेषण से हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि आंग्ल भाषा शिक्षण से संबन्धित भारतीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाएं किन सामाजिक संस्कृतिक अवरोधों का सामना कर रही हैं।

भारत मेन विशिष्ट रूप आंग्ल भाषा शिक्षण हेतु स्थापित आंगल भाषा शिक्षण संस्थाएं (English Language Teaching Institutes) ELTLs' मुख्य रूप से निम्नांकित समस्याओं का सामना कर रहीं हैं


1. बहुत बड़ी संख्या में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की समस्या 


II. उन्हें प्रशिक्षित करने हेतु अधिक धन की उपलब्धता की समस्या, 


III. सभी शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु अधिक समय की आवश्यकता तथा 


IV. प्रशिक्षण की प्रासंगिकता की समस्या


इन सभी समस्याओं में मुख्यतः शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़ी समस्या है जिसको दूर कर शिक्षक प्रशिक्षण संस्था में भाषाई शिक्षकों के कौशल को विकसित किया जा सकता है।


शैक्षिक मुद्दे- भारतीय जन मानस भी नव प्रवर्तन को तत्काल एसवीकरने के प्रति प्रायः संकोचशील ही रहा है। दूर शिक्षा के संदर्भ में भी कमोवेश यही स्थिति रही है। समान्यतः भारतीय शिक्षाविद भी दूर शिक्षा को एक सुधारात्मक शैक्षिक व्यूह रचना के रूप में देखने एवं समझने के प्रति अधिक उत्सुकता नहीं रखते हैं। शिक्षाविदों की इस तरह की अभिवृत्ति भी संस्कृतिजन्य पक्षधरता का परिणाम हो सकती है यद्यपि इसके पक्ष में कोई अनुभव जनित साक्ष्य नहीं है। किन्तु पिछले दो दशकों में भारत में दूर शिक्षा के विस्तार एवं कई क्षेत्रों में इसकी सफलता ने इसकी शैक्षिक विश्वशनीयता भी स्थापित की है। अतः हमारे देश में दूर शिक्षा की आवश्यकता एवं उपयोगिता के बारे में जानने के लिए हमें निम्नांकित मुद्दों पर विचार करना होगा-


1. क्या दूर शिक्षा एक सुधारात्मक शैक्षिक व्यूह रचना है ?


II. क्या भारतीय शिक्षाविद एवं शिक्षा संस्थाएं इसके प्रति संस्कृतजन्य पक्षधरता रखते हैं? 


III. तथा क्या यह परंपरागत शिक्षा प्रणाली से अधिक प्रभावशाली है तथा शैक्षिक दृष्टि से विश्वसनीय है?


आगे हम विद्यार्थियों से इन्हीं प्रश्नो का अनुभावजनित साक्ष्यों पर सकारात्मक उत्तर संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।


दूर शिक्षा एक सुधारात्मक शैक्षिक व्यूह रचना नवीन व्यूह रचनाओं के प्रयोग का ढंग भी परंपरागत प्रणाली के ढंग से भिन्न होता है। किन्तु हम परंपरागत प्रणाली के इतने अधिक अभयस्थ हो चुके हैं कि नवीन व्यूह रचनाओं को भी पुराने ढंग से ही प्रयोग करना प्रारम्भ कर देते हैं। परिणामस्वरूप प्रभावशाली परिणाम नहीं मिल पाते हैं तथा हम बड़ी सहजता से नवीन प्रणाली को ही दोष युक्त लगते हैं।


दूरवर्ती शिक्षा का प्रारम्भ पत्राचार शिक्षा के रूप में हुआ है। अनेक परंपरागत भारतीय विश्वविद्यालय द्वारा पत्राचार शिक्षा संस्थान अथवा निदेशालयों की स्थापना की गयी तथा वे दोनों माध्यमों (परंपरागत व पत्राचार प्रणाली) से डिग्री पाठ्यक्रम प्रदान कर रहें हैं।

कुछ शोधकर्ताओं द्वारा पत्राचार शिक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता पर शोध अध्ययन भी किए गए हैं जिसमें निष्कर्ष रूप में यह बात सामने आयी कि पत्राचार शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत हम परंपरागत शिक्षा की आधारभूत बातों का ही अनुकरण करने लगते हैं। यही इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि दूर शिक्षा में अनुकरनात्मक प्रयोग गुणात्मक दृष्टि से अच्छा परिणाम नहीं प्रदान कर सकता है। अतः इसे नव प्रवर्तन के रूप में प्रयोग करने की आवश्यकता है।


प्रमुख अभिकरणों की सांस्कृतिक पक्षधरता भारतीय शिक्षाविद एवं शिक्षा संस्थाएं जाने-अंजाने संस्कृतिजन्य पक्षधरता से ग्रसित होते हैं। परिणामस्वरूप वे दूर शिक्षा को एक सुधारात्मक व्यूह रचना के रूप मे समझने पर बहुत अधिक ध्यान नहीं देते हैं।

हमारे देश में अभी तक पत्राचार शिक्षा के केवल एक पक्ष- इसका कम खर्चीलापैन एवं अधिसंख्य लोगों तथा अधिक दूरी तक इसकी पहुँच को ही स्वीकारा गया है। किन्तु जहां तक सामाजिक एवं शैक्षिक उपयोगिता का संबंध है इसके अनुकरणनात्मक प्रयोग से अधिक कुछ नहीं कहा जा सका है। अतः इसे उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाने के लिए ब्रिटेन के मुक्त विश्वविद्यालय के तरीके से प्रयास करना होगा। इन प्रयासों में मुक्त प्रवेश, पाठ्यक्रम समिति . संचयी क्रेडिट के आधार पर डिग्री प्रदान करना, प्रति छात्र कम लागत अन्तः अनुशाशन पाठ्यक्रमों का प्रारम्भ पाठ्यक्रमों का संयुक्त निर्माण, अनुभव पश्चात पाठ्यक्रम आदि समलित किए जाने चाहिए। इस प्रकार के शैक्षिक नव प्रवर्तन से पत्राचार शिक्षण पद्धति को शैक्षिक दृष्टि से जीवंत एवं प्रभावशाली तथा सामाजिक दृष्टि से प्रासंगिक बनाया जा सकता है।


इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा ऐसे ही प्रयास एवं प्रयोग किए जा रहे हैं। इस विश्वविद्यालय की स्थापना के पश्चात शिक्षाविदों की संस्कृतिजन्य पक्षधरता में कमी आ रही है तथा दूर शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकारा जाने लगा है।


दूर शिक्षा की सामाजिक शैक्षिक विश्वसनीयता किसी शैक्षिक प्रणाली की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन उद्देश्यों को पूर्ण करने में कितनी अधिक सफल सिद्ध रही है जो उसके लिए समाज द्वारा निर्धारित किए गये हैं। समान्यतया आधुनिक समय में किसी शैक्षिक प्रणाली के निम्नलिखित चार मुख्य उद्देश्य होते हैं-


I.कौशलों का विकास हेतु अनुदेशन प्रदान करना (To give instruction in skills),


II. सुसभ्य समाज का निर्माण करना (To build cultivated society), 


III. अधिगम एवं ज्ञान की वृद्धि करना (To advance learning). तथा


IV. समान मानवीय दृष्टिकोण का संचार करना (To transmit the secular view of man)


अतः कोई भी शैक्षिक प्रणाली आधुनिक समाज के लिए तभी प्रासंगिक हो सकती है जब वह उपर्युक्त उद्देश्यों को अधिकतम सीमा तक पूर्ण करने मेन सक्षम हो। परंतु हमारी परंपरा शिक्षा प्रणाली इन उद्देश्यों को पूर्ण करने मेन पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रही है। हमारी परंपरागत शिक्षा प्रणाली मे प्रायः जिन कमियों की चर्चा की जाती है उनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं


i. शैक्षिक कार्यक्रम / पाठ्यक्रम वर्तमान सामाजिक आवश्यकताओं की दृष्टि से प्रासंगिक नहीं है। सर्वाधिक वेतन प्राप्त करने वाले शिक्षक का लाभ बहुत थोड़ी संख्या में कुछ चयनित छत्र ही उठा पा रहें हैं। 


ii. वर्षों पूरनी कक्षा-शिक्षण विधि बहुत अधिक नीरस, अरूचिकर एवं अप्रभावी होती जा रही है। 


iii. पाठ्यक्रम अवधि.कक्षा में उपस्थिती आदि जैसी रूढ़िगत बाध्यताएँ यथावत हैं तथा इन्हें किसी प्रकार की चुनौती भी नहीं दी जा रही है। 


iv. उच्च एवं अच्छी शिक्षा का लाभ कुछ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग द्वारा ही प्राप्त किया जा रहा है।


उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि परंपरागत शिक्षा प्रणाली एवं वर्तमान शिक्षा प्रणाली सामाजिक -शैक्षिक आवश्यकताओं में कोई तालमेल नहीं बैठा पा रहा है। परंपरागत शिक्षा प्रणाली की इस कमी का एक प्रमुख कारण यह देखा गया है कि शिक्षण एवं शोध जो दो अलग-अलग कार्य हैं उन्हें एक साथ मिला दिया गया है।