सामाजिक शोध के विभिन्न चरण - Various Step of Social Research

 सामाजिक शोध के विभिन्न चरण - Various Step of Social Research


सामाजिक शोध की प्रकृति वैज्ञानिक है और इसलिए एक शोधकर्ता किसी भी समस्या या घटना का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार ही करता है। इस वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किए गए अध्ययनों को कुछ विशेष चरणों से गुजरना आवश्यक होता है। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि एक वैज्ञानिक अपने चिंतन और व्यवहार में जिन प्रक्रियाओं को उपयोग में लाता है, उन्हीं को सोपान अथवा चरण कहा जाता है। एक शोधकर्ता को शोध करते समय इन चरणों का पालन करना पड़ता है, ताकि कार्य व्यवस्थित एवं वस्तुनिष्ठ रूप से पूर्ण हो सकें। सामाजिक शोध के प्रमुख चरण बिलकुल वही हैं जो वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण होते हैं।


रॉय जी. फ्रांसिस ने इसके 12 चरणों का उल्लेख किया है।


1. समस्या क्षेत्र का चयन,


2. प्रचलित सिद्धांत की जानकारी,


3. समस्या की परिभाषा,


4. प्राक्कल्पना की रचना.


5. औपचारिक तर्क की रचना,


6. तथ्यों के स्रोत का निर्धारण,


7. उपकरणों का निर्माण,


8. उपकरणों का पूर्व परिक्षण एवं उनमें आवश्यक संशोधन,


9. तथ्यों का संकलन,


10. तथ्यों का विश्लेषण,


11. निष्कर्षों का लेखन,


12. प्रतिवेदन का प्रकाशन,


पी.वी. यंग और जार्ज ए. लुण्डबर्ग ने निम्न 4 चरणों का उल्लेख किया है।


1. कार्यरत प्रकल्पना की रचना,


2. तथ्यों का अवलोकन एवं संकलन,


3. तथ्यों का वर्गीकरण,


4. वैज्ञानिक सामान्यीकरण एवं सिद्धांत रचना,


ई.आर. बाबी ने वैज्ञानिक पद्धति के निम्न 6 चरणों का उल्लेख किया है।


1. शोध की समस्या या उद्देश्य का स्पष्टीकरण,


2. साहित्य की समीक्षा,


3. सूचनादाताओं का चयन,


4. प्रमापन (अध्ययन के चरों का निर्धारण).


5. तथ्य संकलन की विधियों का निर्धारण.


6. विश्लेषण (विश्लेषण की विधि संबंधी तर्क को स्पष्ट करना), 


विमल शाह ने शोध चरण के निम्न 10 चरणों का उल्लेख किया है।


1. शोध समस्या की पहचान एवं चुनाव,


2. शोध समस्या के लिए सैद्धांतिक संरचना का चुनाव,


3. शोध समस्या का प्रतिपादन.


4. प्रयोग के अन्वेषण का प्रारूप.


5. चरों की परिभाषा एवं मापन,


6. निदर्शन प्रविधियां,


7. तथ्य संकलन के यन्त्र एवं तकनीक,


8. तथ्यों का संकेतन, संपादन एवं क्रियान्वयन,


9. तथ्यों का विश्लेषण,


10. शोध प्रतिवेदन, 


अर्ल बैबी (द प्रेक्टिस ऑफ सोशल रिसर्च) ने शोध प्रस्ताव में निम्नलिखित 6 तत्वों को बताया है।


1. समस्या या उद्देश्य अर्थात यह बताना कि क्या अध्ययन किया जाना है उसकी उपयोगिता एवं व्यावहारिक महत्त्व और सामाजिक सिद्धांतों के निर्माण में इसका योगदान।


2. उपलब्ध साहित्य की समीक्षा अर्थात अन्य लोगों ने इस विषय पर क्या कहा है, कौन से सिद्धांत इसके विषय में विद्यमान है. और वर्तमान शोध में क्या कमियां रह गई हैं जिन्हें सुधारा जा सकता है।


3. अध्ययन के विषय अर्थात किन लोगों से आंकड़ों का संग्रह किया जाना है, अध्ययन के लिए उपलब्ध व्यक्तियों तक कैसे पहुंचा जाए, क्या प्रतिदर्श का चयन उपयुक्त है यदि हाँ तो प्रतिदर्श का चयन कैसे किया जाए और यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि किया जाने वाला शोध प्रत्यार्थियों को हानि नहीं पहुचाएगा।


4. मापन अर्थात अध्ययन के लिए मुख्य चरों का निर्धारण इन चरों को किस प्रकार परिभाषित किया जाएगा और नापा जाएगा, इस विषय पर पूर्व में किए गए अध्ययनों से ये परिभाषा व नाप किस प्रकार भिन्न होंगे।


5. आधार सामग्री संकलन पद्धतियाँ अर्थात आँकड़े एकत्र करने सर्वेक्षण प्रयोग आदि के लिए


पद्धतियों का निर्धारण करना एवं सांख्यकी प्रयोग किया जाना है अथवा नहीं।


6. विश्लेषण अर्थात विश्लेषण के तर्क को स्पष्ट करना कि गुणवत्ता में आने वाली विविधताओं पर ध्यान दिया जाना है या नहीं और संभावित व्याख्यात्मक के चरों का विश्लेषण किया जाना है या

नहीं। 


होर्टन और हण्ट ने वैज्ञानिक शोध या अनुसंधान की वैज्ञानिक पद्धति में 8 चरणों को बताया है। 


1. समस्या जो विज्ञान की पद्धति से अध्ययन के योग्य हो उसको परिभाषित करना।


2. उपलब्ध साहित्य की समीक्षा. ताकि अन्य अनुसंधानकर्ताओं द्वारा की गई त्रुटियों की पुनरावृति न हो।


3. प्रक्कल्पनाओं का निरूपण, अर्थात ऐसी प्रस्थापनाएं जिनका परिक्षण हो सके। 


4. शोध प्रारूप की योजना अर्थात प्रक्रिया की रूपरेखा बनाना कि आधार सामग्री कैसे, कौनसी और कहाँ से एकत्र की जाए व उसकी प्रक्रिया और विश्लेषण कैसे किया जाए।


5. आधार सामग्री संग्रह अर्थात शोध प्रारूप के अनुरूप आधार सामग्री एवं अन्य सूचना का संग्रह करना। कभी-कभी अप्रत्याशित कठिनाइयों के कारण शोध प्रारूप को बदलने की आवश्यकता हो सकती है।


6. आधार सामग्री का विश्लेषण, अर्थात आधार सामग्री का वर्गीकरण, सारणीकरण एवं तुलना करना एवं निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक परिक्षण करना ।


7. निष्कर्ष निकलना अर्थात मूल प्राक्कल्पना सत्य अथवा असत्य पाई गई है और क्या उसकी पुष्टि हो गई है या उसे अस्वीकार के दिया गया है या निष्कर्ष अनिश्चित रहा है? शोध ने हमारे ज्ञान में क्या वृद्धि की है? इसका समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के लिए क्या निहितार्थ है? आगे शोध के लिए कौन-कौन से प्रश्न सामने आए हैं।


8. अध्ययन का पुनरावलोकन यद्यपि उपरोक्त सात चरण एक शोध अध्ययन को पूरा करते हैं किंतु शोध के नतीजे पुनरावलोकन से ही पुष्ट किए जा सकते हैं. कई शोधों के बाद ही शोध निष्कर्ष सामान्य सत्य माने जा सकते हैं।


इस आधार पर विभिन्न विद्वानों ने सामाजिक अनुसंधान के अनेक चरणों को अपने-अपने आधार पर उल्लेख किया हैं। विभिन्न विद्वानों के चरणों के उल्लेख का विश्लेषण करके सामान्य तौर पर मुख्यतः 14 शोध के विभिन्न चरणों का विस्तृत रूप में उल्लेख करेंगे :