वर्ण धर्म या वर्णों के कर्तव्य एवं प्रकार - Varna Dharma or Duties and Types of Varnas
वर्ण धर्म या वर्णों के कर्तव्य एवं प्रकार - Varna Dharma or Duties and Types of Varnas
भारतीय विद्वानों ने वर्ण धर्म या विभिन्न वर्णों के व्यक्तियों के कर्तव्यों की विस्तृत विवेचना की है भारतवर्ष में वर्ण धर्म या विभिन्न वर्णों के कर्तव्यों को प्रमुख रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
(1) सामान्य धर्म:- सामान्य धर्म चारों वर्णों के व्यक्तियों के लिए था इसके अंतर्गत निम्नांकित कर्तव्य बतलाए गए हैं- जैसे- प्राणियों को हानि न पहुंचाना, सत्य की निरंतर खोज करना, अधिकारपूर्वक दूसरे की वस्तु न लेना, चरित्र एवं जीवन की पवित्रता बनाए रखना, इंद्रियों पर नियंत्रण करना और आत्म संयम, क्षमा, ईमानदारी, दान इत्यादि सदुणों का पालन करना इत्यादि।
(2) विशेष धर्म:- सामान्य धर्म सभी वर्ण के लिए सामान्य रूप से होते हैं इन सामान्य धर्मों के अतिरिक्त अलग-अलग वर्ण के के लिए कुछ विशिष्ट धर्मों का निर्धारण किया गया है। इन्हें ही वर्ण धर्म या वर्ण कर्तव्य कहा जाता है।
वर्ण के प्रकार
वर्ण के चार प्रकार है
1. ब्राम्हण
2. क्षत्रिय
3. वैश्य
4. शूद्र
विभिन्न वर्ण के व्यक्तियों के लिए जिस धर्म का निर्धारण किया गया है उसका विवरण निम्नलिखित है -
(1) ब्राह्मण वर्ण या ब्राह्मण धर्म: ब्राह्मणों का सबसे महत्वपूर्ण धर्म या कर्तव्य इंद्रियों पर संयम रखना था इसके अतिरिक्त जैसा की गीता की अंग्रांकित श्लोक से स्पष्ट होता है- अंतःकरण की शुद्धि, इंद्रियों का दमन, पवित्रता धर्म के लिए कष्ट सहना, क्षमावान होना, ज्ञान का संचय करना तथा परम तत्व (सत्य) का अनुभव करना ब्राह्मण का परम कर्तव्य है
अध्ययन मनुस्मृति के एक श्लोक के अनुसार
“क्षमो दमस्तपः शौर्य शांतिरार्जवमेव च।
ज्ञान विज्ञानभासितसयम ब्रम्हाकर्म स्वभावजम।।
गीता (18-42) "
मनुस्मृति में ब्राह्मणों के धर्म संबंधी विवेचना में कुछ विरोधाभास भी पाया जाता है। एक स्थान पर ब्राह्मणों के धर्म में दान लेना वह देना भी है वहीं दूसरे स्थान पर कहा गया है कि ब्राह्मणों के लिए दान लेना वर्जित है क्योंकि इससे ब्राह्मणों के तेज का हास होता है। इसके अतिरिक्त शांत भाव, सरल मन, धर्म के प्रति निष्ठावान होना व पवित्रता का भाव रखना ब्राह्मण धर्म है। ब्राम्हण गुण के अंतर्गत ज्ञान, क्षमा, आस्तिकता, संयम, असंग्रही सदाचारी व न्यायप्रियता इत्यादि। मनु का यह भी कथन है कि यदि इन धर्मों में ब्राह्मण जीविका उपार्जित न कर सके तब आपदा धर्म के रूप में वह क्षत्रिय धर्म से भी जीविका अर्जित कर सकता है क्योंकि यही वर्ण उसके सबसे निकट है।
(2) क्षत्रिय धर्म या कर्तव्य:- मनुस्मृति के अनुसार क्षत्रियों का धर्म प्रजा की रक्षा करना, दान देना भीस्य विषय भोग से दूर रहना, अध्ययन करना तथा अपनी शक्ति का अच्छा उपयोग करना है। जिस्म का कथन है कि जो क्षत्रिय बिना घायल हुए ही अर्थात बिना युद्ध किए युद्धभूमि से लौट आता है उसकी क्षत्रिय धर्म के अनुसार प्रशंसा नहीं की जा सकती। क्षत्रिय अथवा राजा का धर्म प्रजा में भी अपने धर्म के प्रति अनुराग उत्पन्न करना तथा उसे सदकार्यों में लगाना है, गीता में क्षत्रियों के निम्न सात गुणों का उल्लेख मिलता है
"शौर्य तेजो धृतिदार्क्ष्यम युद्धे चाष्यपलायनम।, दानमीश्वरभावश्च क्षात्रम कर्म स्वभावजम।।"
गीता (18/43)
अर्थात शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता, युद्ध से न भागना, दान देना और निस्वार्थ भाव से प्रजा की सेवा व से रक्षा करना क्षत्रियों का प्रभावित धर्म है। इन सभी धर्मों में शूरवीरता सर्वप्रमुख है और इसी आधार पर प्रतीकात्मक रूप से क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं से बताई गई है।
(3) वैश्यों के धर्म या कर्तव्य:- महाभारत में कहा गया है कि दान देना अध्ययन करना, यज्ञ करना तथा पवित्रता पूर्वक धन संग्रह करना वैश्य धर्म है। वैश्य उद्योग में रहकर पिता के समान ही पशुओं का पालन करें क्योंकि प्रजापति ब्रह्मा ने पशुओं का भार वैश्यों को पशु ही सौपा है। मनुस्मृति में वैश्यों के सातकर्तव्य बताए गए है।
"पशुना रक्षणम दानभिज्याध्ययनमेव च ।
वणिक्पय कुसिंद च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥"
गीता (1/90)
अर्थात पशुओं की रक्षा, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन करना, व्यापार करना, ब्याज पर धन देना तथा कृषि करना वैश्य का प्रमुख धर्म है। गीता में कृष्ण गोपाल तथा व्यापार वैश्य धर्म बतलाया गया है।
(4) शूद्र धर्म व कर्तव्य:- मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों का एक मात्र धर्म अपने से उच्च तीनों वर्णों की बिना किसी ईर्ष्या भाव के सेवा करना है। शूद्रों को धन संग्रह या उच्च वर्ण का व्यवसाय नहीं करना चाहिए इनके लिए अध्ययन व अध्यापन यज्ञ करना व करवाना सब वर्जित था।
वार्तालाप में शामिल हों