वर्ण व्यवस्था: भूमिका एवं महत्व - Varna System: Role and Significance
वर्ण व्यवस्था: भूमिका एवं महत्व - Varna System: Role and Significance
उपनिषदों महाभारत एवं इंद्रियों में वर्ण व्यवस्था का जो वर्णन है उसके अनुसार वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत समाज का मनोवैज्ञानिक आधार पर कार्यात्मक विभाजन किया गया था। इस व्यवस्था में सभी वर्णों के लोगों को अपने दायित्वों को निभाने की अपूर्व प्रेरणा प्रदान की है तथा यह विश्वास दिलाया कि जो वर्ण धर्म के अनुरूप कार्य करेगा उसे अगले जन्म में उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त होगी। विभिन्न क्षेत्रों में इस व्यवस्था का समाजशास्त्रीय महत्व इस प्रकार है
(1) कर्तव्य पालन की प्रेरणा: इस व्यवस्था में वर्ण धर्म के पालन पर जोर देकर लोगों को अपने कर्तव्य पर आगे बढ़ते रहने को सदैव प्रेरित किया है। लोगों को एक दूसरे की कार्यों में हस्तक्षेप करने से रोका गया है और बताया गया है कि अपने वर्ण धर्म के अनुसार कार्य करते रहने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है। यह एक अच्छी प्रेरणा थी जिसने प्राचीन समय में व्यक्तियों की सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति में योग देने को प्रोत्साहित किया है।
(2) श्रम विभाजन व विशेषीकरण: इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने पिता के परंपरागत पेसो को अपनाना होता है इसका कारण यह है कि प्रत्येक का एक निश्चित वर्ण धर्म है जिस के अनुरुप कार्य करना होता था। इस व्यवस्था में ना केवल सभी कार्यों को ठीक प्रकार से संपन्न होने की और बल्कि समाज को विशेषीकरण का पूरा लाभ दिलाने की ओर ध्यान भी दिया गया था। जन्म से बालक अपने परिवारिक पर्यावरण में अपने पिता के व्यवसाय को सीखने की ओर प्रवृत्त रहता है। इसके लिए उसे कहीं विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं रहती। पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही प्रकार का कार्य करते रहने से समाज को विशेषीकरण का भी पूरा पूरा लाभ मिला है। यही कारण है कि ज्ञान विज्ञान कला और संस्कृति के क्षेत्र में प्राचीन से काफी आगे रहा है।
(3) लचीली व्यवस्था:- इस व्यवस्था ने नियंत्रित गतिशीलता के आधार पर सामाजिक प्रगति में योग दिया। इस व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति को अपने गुण तथा कर्म के आधार पर एक वर्ण से दूसरे वर्ण में जाने की छूट दी गई है। व्यक्ति निम्न वर्ण में जन्म लेकर भी उच्च वर्ण का सदस्य बन सकता है। कई उदाहरणों से यह वक्त भी है।
(4) सामाजिक संघर्षों से मुक्ति:- इन व्यवस्था में सभी अपने वर्ण धर्म का पालन करते थे तथा प्रत्येक को एक निश्चित सामाजिक स्थिति प्राप्त होती थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत किसी विशेष सामाजिक स्थिति को प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों को एक दूसरे के साथ प्रतियोगिता करने की आवश्यकता नहीं रही। जहां प्रतियोगिता अधिक होती थी वहां इसकी अनियंत्रित हो जाने पर सामाजिक संघर्षों की संभावना भी बढ़ जाती है। वर्ण व्यवस्था ने सामाजिक संरचना में प्रत्येक की सामाजिक स्थिति निर्धारित कर समाज को सामाजिक संघर्षों से बचने में अपूर्व योग दिया है।
(5) समानता की नीति पर आधारित:- इसके अंतर्गत विभिन्न वर्णों के कार्य अलग-अलग होते व्यवस्था में सभी वर्गों को स्थान महत्व था। प्रत्येक वर्ण की सेवाओं को सामाजिक दृष्टि से समान महत्व प्रदान किया गया था। यद्यपि इस व्यवस्था के अंतर्गत विभिन्न वर्गों में रूप में समाज का कार्यात्मक विभाजन तो हुआ है परंतु सभी वर्णों को एक दूसरे के समान माना गया था मात्र चौथा वर्ण शूद्र वर्ण को छोड़कर।
(6) कर्तव्यों के प्रति जागरूकता:- वर्ण व्यवस्था के द्वारा जो व्यक्ति अपने कार्य का संपादन नहीं करते
थे उनका वर्ण परिवर्तित हो जाता था। वर्ण व्यवस्था द्वारा व्यक्ति ने अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूकता पैदा करना है इसका उद्देश्य था।
(7) स्व धर्म का विकास:- डॉ मोटवानी वर्ण व्यवस्था के महत्व का प्रतिपादन करते हुए बताया है कि अध्यापकों योद्धाओं व्यापारियों और सेवक मनुष्यों का यह चार वर्णों में विभाजन मनोविज्ञान नीतिशास्त्र प्राणी शास्त्र और अर्थशास्त्र पर आधारित है। वर्ण व्यवस्था को इस प्रकार से संयोजित किया गया था कि व्यक्ति मूल प्रवृतियों के अनुसार कार्यों का वर्णन करें तथा सामाजिक समायोजन हुआ जागरूकता के माध्यम से अपने धर्म कर्तव्यों का पालन करें।
(8) शक्ति का विकेंद्रीकरण:- जिसके द्वारा सामाजिक स्तरीकरण के पश्चात भी समाज में शक्ति संतुलन को बनाए रखा। यह निश्चित तथ्य है कि ज्ञान प्रशासन व संपत्ति ऐसी तीन महत्वपूर्ण प्रक्रिया है कि एक ही व्यक्ति अथवा वर्ण के पास इनका साथ साथ वंचित होना अन्य वर्णों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। वर्ण विभाजन व वर्ण धर्म के द्वारा इस संभावना को सदैव के लिए समाप्त कर दिया गया। इस रूप में वर्ण व्यवस्था शक्ति के विकेंद्रीकरण का एक सुंदर प्रयास कहा जा सकता है।
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