हीगल के विचार - Views fo Hegal
हीगल के विचार - Views fo Hegal
हीगल एक दार्शनिक विचारक थे। जर्मनी में मार्क्स जब उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. उस समय जर्मनी के बुद्धिजीवियों पर हीगल के दर्शन का विशेष प्रभाव था। उस समय हीगल को एक क्रांतिकारक विचारक के रूप में देखा जाता था। अपने विचारों की लोकप्रियता के काल में ही हीगल ने (Dialetic) विचार प्रस्तुत किए। हीगल ने इंडवाद (बपंसमजपबद्ध शब्द को यूनानी भाषा के शब्द 'डायलिगो ( Dialego) से ग्रहण किया। ईसा से पूर्व यूनानी राज्यों के राजदरबार में किसी भी घटना से संबंधित वास्तविकता को जानने के लिए वाद-विवाद अथवा तर्क-वितर्क का सहारा लिया जाता था। तर्क-वितर्क की इसी प्रणाली को डायलिगो कहा जाता था। संभवतः इसी अर्थ में प्लेटो तथा अनेक दूसरे दार्शनिकों में द्वंद्ववाद शब्द का उपयोग तर्क-वितर्क करने की कला के अर्थ में ही किया।
ढूंढ अथवा डायलेक्ट (Dialect) के अर्थ को स्पष्ट करते हुए हीगल ने यह बतलाया कि विश्व में जड़ और चेतन सभी पदार्थों में कुछ अंतर्विरोध पाया जाता है। प्रत्येक वस्तु की आतंरिक संरचना का निर्माण करने वाले विभिन्न अंगों के बीच जो अंतर्विरोध अथवा द्वंद्व होता है,
उसी के परिणामस्वरूप उस वस्तु के बाहरी स्वरूप में परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। हीगल से पहले के विचार को का मत यह था कि केवल कुछ वाह्य दशाएँ ही जड़ पदार्थों को प्रभावित करती है। इसके विपरीत, हीगल ने जड़ पदार्थों में होने वाले परिवर्तन हो भी उनके अंदर विद्यमान द्वंद्ववादी क्रियाओं का परिणाम विद्यमान रहती है।
हीगल ने जिस समय अनर्युक्त विचार प्रस्तुत किए, उस समय वह अपनी युवावस्था में थे। बाद में हीगल का संपूर्ण चिंतन अराजकतावादी दिशा में आगे बढ़ने लगा। इसके फलस्परूप हीगल ने पदार्थ की अपेक्षा विचारों को महत्त्व देना आरंभ कर दिया। हीगल ने कहा कि जगत में 'विचार' महत्त्वपूर्ण है, पदार्थ नहीं। अपने द्वंद्ववाद को स्पष्ट करते हुए हीगल ने बतलाया कि जब हमारे मस्तिष्क में कोई विचार पैदा होता है, तब उसी समय उसका एक प्रतिवाद अथवा विरोधी विचार हमारे मस्तिष्क में उत्पन्न होने लगता है। इन दोनों तरह के विचारों के बीच द्वंद्व की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। इसका समाधान एक ऐसे विचार के बीच द्वंद्व की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। इसका समाधान एक ऐसे विचार के रूप में होता है जिसे हम संश्लेषण अथवा समन्वय की दशा (Synthesis) कह सकते हैं।
हीगल के इस विचार को सामान्य शब्दों में स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है तो वैचारिक आधार पर व्यक्ति का मस्तिष्क उसे समाज द्वारा स्वीकृत मानदंडों का प्रयोग करने का सुझाव देता है। उसी समय उसके मस्तिष्क में सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन करने के विचार भी उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, जब एक व्यक्ति धन अर्जित करने के लिए कठिन परिश्रम करता है तब उसके मस्तिष्क में गलत तरीकों से धन कमाने की इच्छा पैदा होती है। इन दोनों तरह के विचारों के बीच द्वंद्व अथवा संघर्ष होता है। इस द्वंद्व के फलस्वरूप व्यक्ति अपनी तार्किकता और चेतना के आधार पर जिस निष्कर्ष पर पहुँचता है, उसी को हम संश्लेषण' अथवा समन्वय कहते हैं। इस आधार पर हीगल ने यह बताया कि समाज में जो भी परिवर्तन उत्पन्न होते हैं वे व्यक्तियों के मस्तिष्क में वाद (thesis) और प्रतिवाद (Anti- thesis) के रूप में होने वाले द्वंद्व तथा उसके फलस्परूप जन्म लेने वाले समन्वय के आधार पर होते हैं। हीगल द्वारा प्रस्तुत इस विचार को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है :
क्रम - प्रारंभिक विचार विरोधी विचार परिणाम
स्थिति वाद - प्रतिवाद संश्लेषण अथवा समन्वय
हीगल ने यह स्पष्ट किया कि यद्यपि समन्वय अथवा संश्लेषण में वाद और प्रतिवाद दोनों ही तत्त्वों का समावेश होता है लेकिन समन्वय के यप् में बनने वाली स्थिति भी पूरी तरह स्थाई नहीं होती। कुछ समय बाद समन्वय की दशा का पुनः प्रतिवाद होने लगता है। इस स्थिति में कुछ समय पहले तक हम जिसे समन्वय की दशा' कहते थे, वहीं वर्तमान में वाद (thesis) का रूप ले लेता है। एक स्वाभाविक प्रक्रिया के यप् में इसका पुनः प्रतिवाद सामने आने लगता है और बाद तथा प्रतिवाद के बीच संघर्ष होने से समन्वय की एक नई दशा उत्पन्न होती है जो साधारणतया पहले से अधिक अच्छी होती है। इस प्रकार हीगल ने द्वंद्ववाद की विवेचना में विचारों अथवा मानवीय चेतना को अधिक महत्त्व दिया। इस संदर्भ में इतिहास की विवेचना करते हुए हीगल ने लिखा इतिहास तर्क से लेकर स्वयं अपनी चेतना की ओर होने वाला विकास है तथा वैधानिक राज्य इतिहास का चरम बिंदु है। इसका तात्पर्य है कि द्वंद्ववाद ही वह प्रक्रिया है जिसके आधार पर विचारों में होने वाले परिवर्तन तथा सामाजिक विकास को समझा जा सकता है।
कार्ल मार्क्स ने हीगल के द्वंद्ववादी विचार को स्वीकार किया लेकिन हीगल की इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि द्वंद्ववाद का प्रमुख आधार विचार है। मार्क्स ने कहा है कि हीगल ने द्वंद्ववादी पद्धति का प्रयोग आदर्शवादी अथ में किया है जिसमें उन्होंने मस्तिष्क को आवश्यकता से अधिक प्रधानता दे दी।
मार्क्स ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्होंने हीगल से द्वंद्ववाद के सिद्धांत को अवश्य लिया है लेकिन उनका द्वंद्ववाद भौतिक शक्तियों से संबंधित होने के कारण हीगल के द्वंद्ववाद से भिन्न है। हीगल ने जहाँ 'मस्तिष्क' को सामाजिक घटनाओं के कारण के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार मार्क्स ने सामाजिक तथ्यों का विश्लेषण करने के लिए हीगल द्वारा प्रयुक्त उपागम के तरीके ( (Manner of approach) का ही प्रयोग किया यद्यपि उनके द्वंद्ववाद की विषवस्तु हीगल से बिलकुल भिन्न रही।
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के बारे में मार्क्स का चिंतन फ्यूअरबॉक (Feurback) से भी प्रभावित था। फ्यूअरबॉक मार्क्स ने समकालिन एक भौतिकवादी विचारक थे। उनका एक कथन बहुत प्रचलित है कि आलू द्वारा उत्पन्न रक्त से क्रांति नहीं हो सकती।' फ्यूअरबॉक ने इस कथन से स्पष्ट होता है कि वह पदार्थ को बहुत अधिक महत्त्व देते थे। इस कथन को स्पष्ट करते हुए उन्होने बतलाया कि आलू का प्रभाव ठंडा होता है, अतः आलू खाने से बनने वाला रक्त क्रांतिकारियों के रक्त तरह गहरा नहीं हो सकता। आज के वैज्ञानिक युंग में फ्यूअरबॉक का यह कथन बहुत साधारण अथवा हास्यास्पद प्रतीत हो सकता है किंतु यह केवल पदार्थ अथवा भौतिक शक्ति के महत्त्व को स्पष्ट करने वाला एक सार्थक कथन है। कार्ल मार्क्स फ्यूअरबॉक के भौतिकवादी विचारों से बहुत प्रभावित थे। यही कारण है कि मार्क्स ने जहाँ एक ओर हीगल से इंद्ववादी प्रणाली ग्रहण की. वहीं दूसरी ओर उन्होंने फ्यूअरबॉक से भौतिकता का दर्शन लेकर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
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