मार्क्स के विचार - Views of Marx

मार्क्स के विचार - Views of Marx


कार्ल मार्क्स ने हीगल के द्वंद्ववाद तथा फ्यूअरबॉक के भौतिकवाद को संशोधित रूप में प्रस्तुत उनकी अतिवादिता हो समाप्त किया ता द्वंद्वात्मक भौतिकवाद रूप में एक नए सिद्धांत का करते हुए प्रतिपादन किया। मार्क्स ने कहा कि हीगल के लिए मस्तिष्क की कार्य प्रणाली ही चिंतन की प्रक्रिया है जो विचारों के रूप में कार्य करती है। दूसरे शब्दों में हीगल ने यह मान लिया था कि मनुष्य का बाह्य संसार द्वंद्वात्मक प्रणाली से विकसित होने वाले विचारों का ही परिणाम होता है। इसके विपरीत, मार्क्स के लिए यह आदर्श भौतिक जगत के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मार्क्स का कथन है कि यह भौतिक जगत ही मनुष्य के मस्तिष्क में पैदा होता है और विचारों के रूप में हमारे सामने आता है। इसका तात्पर्य है कि विचार कभी निर्पेक्ष (non-relative) नहीं होते बल्कि वे स्वयं भौतिक दशाओं से प्रभावित होते हैं। इस प्रकार मार्क्स के अनुसार विचारों से भौतिक जगत का निर्माण नहीं होता बल्कि भौतिक जगत ही मनुष्य के विचारों को प्रभावित करता है। इस प्रकार मार्क्स द्वारा द्वंद्वात्मक प्रणाली को भौतिक आधार पर स्पष्ट करने के कारण ही इसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद' का नाम दिया गया।


द्वंद्वात्मक प्रणाली को भौतिक आधार स्पष्ट करने के लिए मार्क्स ने यह तर्क दिया कि संसार में पदार्थ (Matter) ही एक एसी वास्तविकता है जिसका एक वस्तुनिष्ठ रूप होता है। पदार्थ ही हमारी चेतना और विचारों का स्रोत है। इस प्रकार परस्पर विरोधी शक्तियों के प्रभाव को पदार्थ के आधार पर समझा जाना चाहिए, विचारों के आधार पर नहीं मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की प्रमुख मान्यता यह है कि विश्व का आधर अनेक भौतक पदार्थ ही है जो अपने छिपे हुए अनेक आतंरिक विरोधों के कारण होता है। इस परिवर्तन में बाद, प्रतिवाद तथा समन्वय जैसी तीनों अवस्थाओं का समावेश रहता है। इसके बाद भी वाद, प्रतिवाद तथा समन्वय या संश्लेषण के रूप में चलने वाली विकास की यह प्रक्रिया सरल नहीं होती बल्कि एक बिंदु पर पहुँचकर इसमें तेजी से परिवर्तन होने लगता है। इसी को हम 'क्रांति' की दशा कहते हैं। मार्क्स ने स्पष्ट किया कि संपूर्ण भौतिक जगत में कुछ प्रतिवादी दशाएँ सदैव उत्पन्न होती रहती है जिनके फलस्वरूप एक नई दशा का जन्म होता है। अधिक स्पष्ट रूप में, प्रत्येक समाज में बाद और प्रतिवाद के रूप में दो विराधी शक्तियाँ दो वर्गों के रूप में देखने की मिलती है जिनके बीच सदैव संघर्ष उत्पादन के तरीके में परिवर्तन हाता है. वैसे ही संश्लेषण के रूप में एक नया वर्ग पैदा हो जाता है। संघर्ष की निरंतर चलती रहने वाली यह प्रक्रिया ही सामाजिक विकास का वास्तविक आधार है। लॉरसन (Larson) ने अपनी पुस्तक मेजर थीम्स इन सोशियोलॉजिकल थॉट' में मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को बहुत सरल ढंग से समझाने का प्रयत्न किया है। लारसन के अनुसार मार्क्स की द्वंद्ववादी पद्धति को चार प्रमुख तत्त्वों के आधार पर समझा जा सकता है जो इस प्रकार है:


• प्रकृति के सभी तत्त्व सुसंबद्ध समग्रता के अंग है। (All the phenomena of nature are part of an integrated whole.)


• प्रकृति में सदैव गतिशीलता तथा परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है। (Nature ns in a continuous state of movement and change.)


• विकास की प्रक्रिया संख्यात्मक वृद्धि की व्युत्पत्ति है जिसका चरम बिंदु गुणात्मक परिवर्तन में स्पष्ट होता है। (The developmental process is a product of quantitative advances which culminate in a abrupt qualitative change.)


• प्रकृति तथा मुख्यत: मानव समाज के प्रत्येक भाग में अंतर्विरोध निहित होते हैं।

(Contradictions are inherent in all realms of nature but partiicularly in human society.)


लॉरसन ने इन विशेषताओं के आधार पर मार्क्स की द्वंद्वात्मक प्रणाली से संबंधित प्रमुख मान्यताओं पर प्रकाश डाला है। इसके बाद भी यह विशेषताएँ उस भौतिकवादी आधार को स्पष्ट नहीं करतीं जिसे मार्क्स ने द्वंद्वात्मक प्रणाली के संदर्भ में प्रस्तुत किया। इस दृष्टिकोण से कार्ल मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतकरवाद को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम मार्क्स द्वारा प्रस्तुत भौतिकवाद के ऐतिहासिक स्परूप को समझने का प्रयत्न करें।