वाइनर का सफलता/असफलता का गुणारोपण सिद्धांत - Wiener's Attribution Theory of Success/Failure
वाइनर का सफलता/असफलता का गुणारोपण सिद्धांत - Wiener's Attribution Theory of Success/Failure
इस सिद्धांत का प्रतिपादन वाइनर (1974) ने किया प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न अवसरों पर किसी कार्य के पश्चात विभिन्न मात्रा में सफलता अथवा असफलता प्राप्त करता है। साथ ही प्रत्येक बार वह अपनी सफलता अथवा असफलता के कारणों का अनुमान लगाता है। उदाहरण किसी साक्षात्कार का परिणाम प्रकाशित होने के पश्चात आप सभी ने प्रायः अनेक अभ्यर्थियों को यह कहते सुना होगा कि साक्षात्कार में अनुत्तीर्ण होने अथवा प्रतीक्षा सूची में आने का कारण यह है कि साक्षात्कार लेने वाले ने न्याय नहीं किया। उन्होंने साक्षात्कार के दौरान विषय से बाहर भी प्रश्नों का चयन किया. जो कि गलत है। कुछ अभ्यर्थियों ने इसका कारण अपने दुर्भाग्य को बताया। परंतु इन्हीं अभ्यर्थियों के माता-पिता साक्षात्कार में असफल होने का कारण अभ्यर्थियों के परिश्रम को जिम्मेदार माना कि उन्होंने उचित परिश्रम नहीं किया। दूसरी तरफ जिन अभ्यर्थियों ने साक्षात्कार में सफलता प्राप्त की, उन्होंने अपनी सफलता का कारण अपनी योग्यता अथवा अपने द्वारा किए गए परिश्रम को माना। किसी व्यक्ति को उसकी सफलता/असफलता का कारण/ कारणों का संज्ञान विभिन्न प्रकार की सूचनाओं के उपयोग से हो सकता है। इनमें से कुछ सूचनाएं तो तात्कालिक घटना से संबंधित होती है और कुछ पुरानी घटनाओं की स्मृतियों से। इन सभी सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति अपनी सफलता अथवा असफलता को चार संभावित कारकों में से किसी एक कारक अथवा एक से अधिक कारकों पर आरोपित करता है। इसके चार कारक निम्न है
1. योग्यता
2. कार्य की कठिनाई
3. प्रयत्न
4. भाग्य
इन चारों कारकों में से योग्यता तथा प्रयत्न. व्यक्ति के आंतरिक कारक हैं। तो कार्य की कठिनाई और भाग्य, व्यक्ति की बाह्य कारक से संबंधित होती हैं। इसके अतिरिक्त योग्यता तथा कार्य की कठिनाई, स्थिर कारक के रूप में है और प्रयत्न तथा भाग्य अस्थिर कारक है। इन चारों कारकों के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है, जो इस प्रकार है- योग्यता किसी प्रेक्षक को किसी अन्य व्यक्ति की अथवा स्वयं की बार-बार कि सफलता अथवा असफलता से योग्यता की उपस्थिति का संज्ञान सहज रूप से हो जाता है।
सफलता का गुणारोपण योग्यता पर उस समय भी होता है, जब प्रेक्षक को व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के निष्पादन की भी सूचना प्राप्त हो। यदि किसी संस्कृत में अनेक व्यक्ति असफल हो जाएं और एक व्यक्ति सफल हो जाए तो उसकी सफलता उसकी योग्यता के कारण मानी जाएगी। इसी प्रकार यदि अनेक व्यक्ति सफल हो जाए और एक व्यक्ति असफल हो जाए तो उसकी असफलता का गुणारोपण योग्यता की कमी पर भी होगा। किन्ही दो व्यक्तियों का औसत निष्पादन बराबर होने पर भी जो व्यक्ति प्रारंभिक चरण में अधिक सफलता प्राप्त करता है, वह अधिक योग्य समझा जाता है। इसी प्रकार यदि दो व्यक्तियों का औसत निष्पादन बराबर हो तो किसी भी प्रयास पर निष्पादन जिस व्यक्ति का होता है, उसे अधिक योग्य समझा जाता है। स्थिर कारक होने के कारण प्रेक्षक जब किसी संकेत के आधार पर किसी व्यक्ति में योग्यता अथवा अयोग्यता का गुणारोपण कर लेता है, तो विपरीत प्रकार के संकेत प्राप्त होने पर भी पहले के गुणारोपड़ में परिवर्तन ना करने की प्रवृत्ति व्यक्ति में पाई गई है। प्रयत्न किसी भी संस्कृत का निष्पादन करने में किए गए शारीरिक अथवा मानसिक प्रयत्न की मात्रा के अनेक संकेत प्राप्त होते हैं और उनके परीक्षण से प्रयत्न की मात्रा का सही अनुमान लगाया जा सकता है। अधिक प्रयत्न करने के बावजूद यदि असफलता मिले तो इसका कारण प्रयत्न की कमी को मान लिया जाता है और यदि सफलता प्राप्त हो जाती है तो साधारण सा प्रयत्न किए जाने की स्थिति में भी सफलता का गुणारोपण प्रयत्न पर किया जाता है। एक अध्ययन से यह प्रमाणित हुआ है कि एक के बाद एक करके अनेक संकृत्यों का निष्पादन करते समय जिस व्यक्ति की सफलता प्राप्त करने की आवृत्ति धीरे धीरे बढ़ती जाती है, वह अपने को दूसरों की अपेक्षा अधिक प्रयत्न करता हुआ मान लिया जाता है।
जबकि औसत सफलता सभी व्यक्तियों की समान रहती है। कार्य की कठिनाई जिस कार्य को सभी अथवा अधिकांश व्यक्ति सफलतापूर्वक संपादित कर लेते हैं, वह कार्य अपेक्षाकृत आसान समझा जाता है। अतः किसी कार्य की कठिनाई का अनुमान बहुत से लोगों द्वारा उस कार्य पर संपादित निष्पादन के आंकड़ों से भी किया जा सकता है। परंतु वास्तविक सामाजिक जीवन के निष्पादनों का गुणारोपण करते समय किसी कार्य की कठिनाई के मानदंड का ध्यान प्रायः व्यक्ति नहीं रखते। उदाहरण कोई व्यक्ति किसी कार्य में असफल हो जाता है तो कोई प्रेक्षक उसकी इस असफलता का कारण कार्य की कठिनाई पर आरोपित करता है। जबकि बहुत सारे व्यक्ति कई प्रयासों के बाद भी उस कार्य को कर पाने में असफल होते हैं। किंतु कुछ ही व्यक्ति उस कार्य में सफल हो पाते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि वह कार्य अत्यंत ही कठिन है, जिसको कर पाना आसान नहीं है। परंतु प्रेक्षक अथवा असफल हो जाने वाला व्यक्ति, हो सकता है कि अपनी असफलता या व्यक्ति की असफलता का कारण योग्यता को समझें। क्योंकि निष्पादन की तुलना सामान्य जनसंख्या से नहीं बल्कि उन व्यक्तियों के माध्यम से करता है जो कुछ ही व्यक्ति उस कार्य को कर पाते हैं।
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