वन्य जीवन - the wild life

वन्य जीवन - the wild life


इस अवस्था में मनुष्य मुख्य तौर पर कंद, मूल, फल और शिकार पर निर्भर था। इसलिए इसे शिकार संग्रह अवस्था कहा गया। इस अवस्था के बारे में आपने ऊपर पढ़ा भी है। खुदाई में पुरातत्वविदों को मिले पत्थर के अनगढ़ और खुरदरे औजार इसी अवस्था के माने जाते हैं। इसलिए इसे पुरापाषाण अवस्था भी कहा गया है। मॉर्गन ने इस अवस्था को निम्न, मध्यम और उन्नत इन तीन चरणों में बाटा है।


1. निम्न चरण : यह मानव जाति का शैशव काल रहा है। इस चरण में मनुष्य आंशिक रूप से पेड़ों पर भी रहता था। इसी कारण वह जंगली जानवरों से खुद को बचा पाया। कंदमूल और फल उसके भोजन थे। शिकार-संग्रह अवस्था वाले ज्ञात समाजों में से कोई भी इस चरण में नहीं पाया गया, लेकिन एंगेल्स का तर्क है कि यदि हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि मानव का उद्भव पशु-लोक से हुआ है तो हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि वह इस तरह के संक्रमणकालीन चरण से गुजरा ही होगा।


2. मध्यम चरण : भोजन के रूप में मछली का उपयोग करने और आग का इस्तेमाल करना सीखने के साथ मानव वन्य-जीवन के मध्यम चरण में पहुँचा। इस नए आहार ने उसे जलवायु और स्थान के बंधनों से मुक्त कर दिया। नदियों और समुद्रों के तटों के साथ चलता हुआ वह धरती के अधिकांश हिस्से में फैल गया। आग उत्पन्न करने की कला में निपुण हो जाने के कारण वह अब ऐसे कंद और मूल भी खाने लगा जो पका कर ही खाए जा सकते थे। गदा और भाले के उपयोग से यदा-कदा शिकार किए पशुओं का मांस भी उसके आहार का हिस्सा हो गया।


3. उन्नत चरण : यह चरण धनुष-बाण के आविष्कार से शुरू हुआ। इसके कारण जंगली पशुओं का शिकार अपेक्षाकृत आसानी से संभव हो पाया। नतीजतन, मांस अब मानव के भोजन का नियमित अंग हो गया। इस चरण में मनुष्य ने गांवों में बसना शुरू कर दिया था और जीवन निर्वाह के साधनों के उत्पादन पर काबू पा लिया था। वह लकड़ी के बर्तन भी बनाने लगा था।