स्त्री इतिहास वाया स्त्री लेखन: छठा चरण - Women's History via Women's Writing: The Sixth Stage

स्त्री इतिहास वाया स्त्री लेखन: छठा चरण - Women's History via Women's Writing: The Sixth Stage


परंपरागत स्रोत/ अभिलेख स्रोत कई बार स्त्री अनुभवों और उनकी आवाजों पर रोशनी डालने में असफल रहते हैं। स्रोतों का अभाव एक बड़ी चुनौती है, जिसका सामना स्त्री इतिहास क्षेत्र में काम करने वाले अध्येता करते हैं। स्त्री इतिहास अतीत में स्त्रियों का रिकार्ड मात्र नहीं, बल्कि खुद स्त्रियों द्वारा अनुभूत अतीत की पुनर्व्याख्या है। यह आवश्यकता स्त्रियों द्वारा निर्मित किए गए स्रोतों, जैसे साहित्य, लोक साहित्य, मौखिक इतिहास, डायरी, नृवृतांत, लोक कथाएं, मुहावरे आदि की तलाश करती है।


अभिलेख स्रोतों की तुलना में साहित्य को आजकल इतिहास लेखन में समान रूप से एक महत्वपूर्ण, मौलिक एवं विश्वसनीय स्रोत माना जाता है। इतिहास की तरफ साहित्य भी समय, काल, व्यक्ति और समाज का मापक है। इतिहास और साहित्य के बीच सीधा निष्कर्ष नहीं निकाल सकते हैं।

एक इतिहासकार किसी दिए हुए समय की सामाजिक प्रकृति (लोकाचार - सोशल इथोस) को समझने का उद्देश्य रखता है। साहित्य ऐसा माध्यम है जिसमें न केवल किसी समय की सामाजिक प्रकृति, लोकाचार उपस्थित होता है, बल्कि वह नए लोकाचार को फैलाने एवं सृजित करने का समान रूप से सशक्त यंत्र भी है।


स्त्रीवादी आलोचकों द्वारा प्रस्तुत एक तथ्य है कि पुरुषों के लेखन को सामान्यत: कायदे' (द नॉर्म) की तरह बुलाया जाता है जैसे कि यह सभी महान रचनाओं का प्रतिनिधित्व करता हो। साहित्य धारा में महान रचनाओं को शामिल करने हेतु चुनने की प्रक्रिया में यह शामिल है कि कुछ पूर्व धारणाओं का समुच्चय होता है जो निर्धारित करता है कि किसी भी रचना को क्या महान बनाता है।


साहित्य सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों (दृश्य कलाएँ, चित्र, विज्ञापन, फिल्म, टी.वी. की तरह) के अनेक रूपों में से एक रूप है, जिनमें जेंडर रिश्तों का सामान्यत चित्रण किया जाता है। साहित्यिक पाठ एक ओर जेंडर रूढ़ छवियों को मज़बूत बना सकते है। वहीं दूसरी ओर जेंडर मुक्ति की अभिव्यक्ति भी बन सकते हैं। साहित्य निर्माण में नस्ल, वर्ग, आयु, राष्ट्रीयता, यौनिकता, नृजातीयता और भाषा सभी तत्व प्रभाव डालते हैं। साहित्य सामाजिक प्रकृति, लोकाचार की अभिव्यक्ति होता है। टेरी ईगलटन के अनुसार साहित्य सामाजिक उत्पादन के साथ साथ सामाजिक ताकत भी है।


स्त्रीवादी आलोचकों की अन्य खोज यह भी है कि लेखन का एक ऐसा महत्वपूर्ण हिस्सा भी है, जो अधिकांशतः स्त्रियों द्वारा लिखा गया है परंतु पीढ़ियों द्वारा या तो उसकी उपेक्षा कर दी गई या उस पर चुप्पी साध ली गई। ये स्त्री लेखिकाएँ या तो गलत व्याख्यायित की गई या उनका चित्रण इस तरह किया गया कि उनके कार्य की महत्ता समाप्त हो जाए। अतः यह सबसे महत्वपूर्ण काम हो गया कि ऐसा अज्ञात स्त्री लेखिकाओं का पता लगाया जाए और उन्हें इतिहास के पन्नों पर दृश्यमान किया जाए। मीरा कौसानी ने अपनी रचनाओं 'क्रॉसिंग थ्रेशोल्ड फेमिनिस्ट ऐसेज इन सोशल हिस्ट्री' (2007) और फेमिनिस्ट और ट्रीजन अगेस्ट मैन?

काशीबाई कानिटकर एण्ड द इनजेंडरिंग ऑफ मराठी लिट्रेचर' (2008) में महाराष्ट्र के जेंडर इतिहास की अज्ञात रूपरेखा की खोज की है। विद्युत भागवत, तारा भावलकर एवं विनया खादपेकर जैसी विदूषियों ने ताराबाई शिंदे, गीतासाने, शकुंतला परांजपे, कमला देसाई, गौरी देशपांडे जैसी मराठी स्त्री लेखिकाओं को सामने लाने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। `स्त्री साहित्याचा मागोवा' तीन खंडों का एक वृहद विश्वकोश है जो मध्ययुग से बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक मराठी स्त्री लेखिकाओं के व्यवस्थित इतिहास को प्रस्तुत करता है। अनेक विद्वानों/विदूषियों ने स्त्री लेखन का विद्वतापूर्ण उपयोग अतीत में स्त्रियों के पुननिर्माण पर किया है। रोमिला थापर का शकुंतला टेक्स्ट, रीडिंग, हिस्ट्रीज' (1999) इसका एक उदाहरण है। यह पुस्तक शकुंतला के वर्णन के विभिन्न संस्करणों के अध्ययन के आधार पर साहित्य और इतिहास व संस्कृति, इतिहास और जेंडर के बीच रिश्ते खोजने का प्रयास करती है। इसमें महाभारत की कथा, कालीदास रचित नाटक, बृज में अठ्ठारहवीं सदी की कथा, प्राच्यवादियों एवं राष्ट्रवादियों का शकुंतलना पर लेखन शामिल है। जहाँ तक आधुनिक बंगाल के इतिहास का सवाल है मालविका कार्लेकर और तनिका सरकार जैसी इतिहासकारों ने बंगाल में जेंडर संरचना के निर्माण और उभरते हुए हिंदू राष्ट्रवाद के साथ इसके रिश्ते पर केंद्रित काफी महत्वपूर्ण काम प्रस्तुत किया है।


यहाँ कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची है जो अतीत में स्त्रियों की छवि विषय पर केंद्रित है- 


• कुमकुम संगारी, सुदेश वेद (सं.) : वूमन एंड कल्चर (1985)


• विजया रामास्वामी : डिवीनिटी एंड डेविएंस: वूमन एंड वीराशैविज्म (1996)


• विजया रामास्वामी वॉकिंग नेकेड वूमन, सोसायटी, स्प्रिचुअलिटी इन साउथ इंडिया (1997)


• विजया रामास्वामी और कुमकुम रॉय (सं.) इमेजेज एण्ड सेल्फ इमेज इंडियन वूमन इन हिस्ट्री, मिथ एण्ड फिक्शन (1998)


• एलिस थोर्नर और मैत्रेयी कृष्णराज (सं.) आईडिएल्स, इमेजेज एंड रीयल लाईफ वूमन इन लिट्रेचर एंड हिस्ट्री (2000)


• मंदाक्रांता बोस (सं.) फेसेज ऑफ द फेमिनाइन इन एशियंट, मिडाइवल एंड मॉडन इंडिया (2000)


• सुप्रिया चौधरी और सजनी मुखर्जी (सं.) : लिट्रेचर एंड जेंडर: ऐसेज फॉर जसोधरा बागची (2002)


• जूडिथ ई वाल्श : डोमिस्टिीसिटी इन कॉलोनियल इंडिया: व्हाट वूमन लर्नड वेन मैनगेव देम एडवाइज (2004)


कुछ नए अध्ययन राष्ट्र निर्माण की राजनीति तथा सांप्रदायिक राजनीति में जेंडर के आयाम पर भी केंद्रित रहे हैं। उदाहरण के लिए पार्था चटर्जी और प्रदीप जगन्नाथ की कम्युनिटी जेंडर एंड वायलेंस सब्लटर्न स्टडीज' (2000) तथा तनिका सरकार की 'हिंदू वाईफ, हिंदू नेशन: कम्युनिटी एंड कल्चरल नेशनलिज्म' (2001) है।


पूर्णिमा मानकेकर की पुस्तक 'स्क्रीनिंग कल्चर, विव्यूइंग पॉलिटिक्स : टेलीविजन, वूमनहुड एण्ड नेशन इन मॉडन इंडिया' (2000) ने बताया कि आधुनिक भारत में भारतीय स्त्रीत्व को चित्रित करने एवं 80 के दशक के बाद की राजनीति के साथ इसके रिश्ते बनाने में टेलीविजन कैसे एक साथ महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली माध्यम के रूप में उभरा।


भारतीय स्त्री पर प्रारंभिक कार्यों में अधिकांश रचनाएं ऊँची जाति की स्त्रियों पर केंद्रित थे। 1990 के बाद के दशक में वर्ग, जाति, क्षेत्र के संदर्भ में हाशिए की स्त्रियों पर काम सामने आए। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं।


• चतुर्भुज साहू :- द संथाल वूमन ए सोशल प्रोफाइल (1996)


• मीना आनंद (सं.) : दलित वूमन : फिअर एण्ड डिसक्रिमिनेशन (2005)


• बद्रीनारायण : वूमन हीरोज एण्ड दलित एसर्सन इन नार्थ इंडिया : कल्चर आईडेंटिटी एंड पॉलिटिक्स (कल्चरल सबओर्डिनेशन एंड सोशल चेंज) 2006


 • नारायण भोंसले : भटक्यांची पितृसत्ताक जात पंचायत आणि संघर्ष (मराठी) (2008)


• शर्मिला रेगे : राईटिंग कास्ट, राईटिंग जेंडर: नरेटिंग दलित वूमन्स टेस्टीमोनिज (2008)


• सामंथा बनर्जी : द डेंजरस आउटकास्ट: द प्रोस्टीट्यूट इन नाइनटीज सेंचुरी बंगाल (2000) फ्रॉम सेक्रेड सर्वेंट टू प्रोफेन प्रोस्टीट्यूट ए हिस्ट्री


• के के जार्डन : ऑफ द चेंजिंग लीगल स्टेटस ऑफ द देवदासी इन इंडिया (2003)


• आर. के. गुप्ता : चेंजिंग स्टेटस ऑफ देवदासीज इन इंडिया (2007)


पिछले कुछ वर्षों से अनेक क्षेत्रीय अध्ययन सामने आए हैं जो पंजाब, ओडिशा, बंगाल और महाराष्ट्र में जाति, वर्ग जेंडर निर्माण के मुद्दे पर व्यापक अध्ययन प्रस्तुत करते हैं। इन अध्ययनों से भारत में कई क्षेत्रों के तुलनात्मक अध्ययन के आयाम खुले हैं


• ए. मल्होत्रा जेंडर, कास्टएण्ड रीलिजियस आईडेंटिटी रीस्ट्रकचरिंग क्लास इन कोलोनियल पंजाब (2002)


• सच्चिदानंद मोहंती अर्ली वूमन्स राईटिंग इन उड़ीसा (1898-1950) ए लॉस्ट ट्रेडीशन (2005) कुछ विद्वतापूर्ण अध्ययन विभाजन और नजरिए से विभाजन के इतिहास पर सामने आए है।

विभाजन के स्त्री अनुभव बहुतेरे बलात्कार, अपहरण और जबरन शादी के आधार पर बने हैं। इतिहासकारों ने जेंडर और पितृसत्ता के संदर्भ में विभाजन के स्त्री अनुभवों को समझने का प्रयास किया है। इनमें से अधिकांश काम स्त्रियों के वृतांत, साक्षात्कार और रचनाओं पर आधारित है। इस प्रकार मौखिक इतिहास स्त्री की आवाज को संगठित करने और स्त्री इतिहास के पुनर्लेखन का महत्वपूर्ण औजार है। स्त्री इतिहास अतीत का स्मृतिधन है। इस संबंध में महत्वपूर्ण काम है :


• गार्गी चक्रवर्ती कमिंग ऑफ पार्टीशन रिफ्यूजी वूमन ऑफ बंगाल (2005)


• उर्वशी बुटालिया : द अदर साइड ऑफ साइलेंस (2007) अनेक विद्वानों/विदूषियों ने चित्रों और पोस्टरों जैसे नए स्रोतों का उपयोग करते हुए कुछ काम प्रस्तुत किए हैं:


• गीति सेन : फेमिनाइल फेबल्स : इमेजिंग द इंडियन वूमन इन पेंटिंग, फोटोग्राफी एंड सिनेमा (2002)


• मालविका कार्लेकर: री- विजलिंग द पास्ट अर्ली फोटोग्राफी इन बंगाल 1875-1915 (2005)


मालविका कार्लेकर: विजुअलाईजिंग इंडियन वूमन ए डाक्यूमेंट्री 1847-1947 (2005)


• मालविका कार्लेकर पोस्टर वूमन ए विजुअल हिस्ट्री ऑफ द वूमन्स मूवमेंट इन इंडिया (2006)


साउंड एण्ड पिक्चर आर्काइवज फॉर रिसर्च ऑन वूमन (स्पेरो) यह मुंबई स्थिति संगठन है। यहाँ स्त्री इतिहास लेखन पर महत्वपूर्ण काम हुए हैं। इनमें कुछ प्रमुख निम्नलिखित है:


• नीरा देसाई: फेमिनिज्म एज एक्सपिरीयन्स थॉट एण्ड नेरेटिव्स


• माया कामत: द वर्ल्ड ऑफ माया


• रोशन जी शाहनी: एलन, हर इनफिनिट वेरायटी


• वीना पूनांचा : फ्राम द लैंड ऑफ ए थाउजेंड हिल्स


• रोहिनी गावांकर पानीवाली बाई


• शांतु गुरनानी: द वर्ल्ड एज माई लेबेरेट्री विथ साइंज


• कला शाहनी : स्टेडिंग ऑन हर ओन फीट


• प्रमिला इस्थर विक्टोरिया अब्राहम


• कनक: स्टोन एण्ड गोल्ड


• उर्मिला पंवार द मेकिंग ऑफ हिस्ट्री


• दमयंती जोशी : मनेकाज डॉटर


• सखुबाई: व्हे मी सावित्री बाई


• जमीला निशत: ए पोएम स्लमबर्स इन माई हार्ट


• माया : विषमाया


• नीला : कलर्स ऑफ ट्रेडीशन


• स्पीकिंग फ्रॉम द गट्स : मेमोरीज् ऑफ कम्युनल राइट्स