वर्धा शिक्षा योजना (बुनियादी शिक्षा) (1937) - Wardha Education Scheme (Basic Education) (1937)

वर्धा शिक्षा योजना (बुनियादी शिक्षा) (1937) - Wardha Education Scheme (Basic Education) (1937)


परिचय:- जिस समय कांग्रेस मंत्रिमंडल का गठन हुआ, शिक्षा की दशा अत्यंत सोचनीय थी। सभी को एक सुसंगठित जीवनोपयोगी और निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के साथ साथ समाज के उपेक्षित वर्ग को भी शिक्षा की आवश्यकता थी।


2 अक्तूबर 1937 को महात्मा गाँधी ने 'हरिजन' नामक पत्रिका में शिक्षा संबंधी कुछ बिंदुओं पर विशेष रूप से विचार किया।


1) प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम ७ वर्षों का हो तथा इसका स्तर मैट्रीकुलेशन के समान हो और इसमें एक उद्योग भी पढ़ाया जाए।


2) शिक्षा में दस्तकारी कार्य को सिखाया जाय। 


3) इस शिक्षा से वह स्वावलंबी बने।


4) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो


(5) प्राथमिक शिक्षा से छात्रों का केवल बौद्धिक विकास न हो बल्कि शिक्षा छात्र-छात्राओं को रोटी के उपार्जन में भी सहायक हो इसके लिए राज्य सरकार उन्हें जीविका प्रदान करने की गारंटी है।


गांधीजी के इन विचारों से शिक्षा जगत में काफी खलबली मची। इस योजना को सुनिश्चित रूप देने के लिए एक सभा बुलाई गई, जिसकी बैठक वर्धा में 22 और 23 अक्तुबर 1937 को हुई, इसमें निम्मिलिखित चार प्रस्ताव पास किये गए।


1) राष्ट्रीय स्तर पर सभी छात्रों को ७ वर्षों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा दी जाए।


2) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो


3) शिक्षा का केंद्र बिंदु कोई उत्पादन उद्योग हो। बालकों को जो भी दक्षता एवं ज्ञान तथा शिक्षण देना हो वह किसी उद्योग के माध्यम से दिया जाए।


4) यह शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे अपना खर्च स्वयं वहन कर सकेंगी।


डॉ. जाकिर हुसैन कमिटी रिपोर्ट


डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति की स्थापना की गई। जिसका काम बुनियादी तालीम का पाठ्कम बनाकर देना था। इस समिति द्वारा निम्नलिखित बाते कही गई।



1) विद्यालयों में उद्योग:- आधुनिक युग में सभी का यही कहना है कि शिक्षा उत्पादक कार्यों से दी जानी चाहिए। उद्योग बालकों को विभिन्न प्रकार के अनुभव देकर एक संतुलित व्यक्ति का विकास करता है यह मनोवैज्ञानिकों का कहना है। उद्योग श्रमजीवी और बुद्धिजीवि वर्गों के बीच की खाई कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उद्योगों का संबंध जीवन की आधारभूत कियाओं से है इसलिये विद्यालयों में उद्योग की शिक्षा देना बेहद महत्त्वपूर्ण है।


2) उद्योग के शैक्षिकपक्ष:- उद्योग का चुनाव करते समय उन उद्योगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जिनमें अधिकतम शैक्षिक संभावनाएँ हो। ज्ञान और कर्म का संबंध स्वाभाविक है। शिक्षा में इस स्वाभाविकता की रक्षा होनी चाहिए। बुनियादी तालीम का उद्देश्य केवल उत्पादन ही नहीं है बल्कि उद्योग का शैक्षिक व्यवहार भी है।


बुनियादी शिक्षा की विशेषताएँ


1) सभी 7-14 आयु वर्ग के बालक-बालिका को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा दी जाए।


2) शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से दी जाए तथा इस दौरान अंग्रेजी की शिक्षा न दी जाए।


3) सभी शिक्षा किसी न किसी उद्योग पर केन्द्रित हो, और इस उद्योग का चुनाव बच्चों की क्षमता और उस क्षेत्र में उद्योग की आवश्यकता को देख कर तय हो। गत्ता- कार्य, काष्ठकार्य, रसोई, बागवानी, कताई बुनाई, कृषि, चर्म उद्योग इत्यादि उद्योगों को समिति ने सर्वोपरि स्थान दिया।


4) चुने हुए उद्योगों की शिक्षा इस प्रकार दी जाए ताकि छात्र कुशल कारीगर बने उनका सामान बिके और उसकी सहायता से छात्र विद्यालय का खर्च उठा पाए।


(5) उद्योगों को सिर्फ यात्रिक दक्षता के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक, वैज्ञानिक इत्यादि पक्षों पर भी ध्यान दिया जाए। 6) सभी विषयों को उद्योग से सहसम्बंधित कर पढ़ाया जाए और उद्योगों से विषय-वस्तु को अधिक से अधिक जोड़कर कर बच्चों के सामने रखा जाए और इसमें बच्चों की रूचि का खयाल रखा जाए।


इस तरह नई तालीम ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नया कदम बढ़ाया। इसमें शिक्षा की समस्याओं के समाधान के लिए एक नई दिशा दिखलाई गई। बुनियादी पाठशाला केवल कुछ बड़े लोगों को नौकरी के लिये तैयार करने की जगह नहीं है, बल्कि श्रम करने वाले भारतीयों के व्यावहारिक एवं सामाजिक प्रशिक्षण का केंद्र बिंदु है। महात्मा गांधी के विचार में बुनियादी शिक्षा एक शिक्षण-विधि नहीं है, अपितु एक जीवन शैली है।


बुनियादी शिक्षा के गुण


1) उत्पादन कार्य द्वारा शिक्षा देने की व्यवस्था आधुनिकतम मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है।


2) बुनियादी शिक्षा उपयोगी सामाजिक कियाकलापों के माध्यम से एक उच्च कोटि की संस्कृति का निर्माण करती है।


3) भारत जैसे गरीब देश में बुनियादी शिक्षा निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का एक विकल्प है।


(4) मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा यह बुनियादी शिक्षा की विशेष देन है।


5) बुनियादी शिक्षा शैक्षिक दृष्टि से एक ऊंचे स्तर की मांग करती है। 6) बुनियादी शिक्षा एक ईमानदार सहयोगी नैतिक शोषणाविहिन और अहिंसावादी समाज की परिकल्पना करती है।


दोष:


1) यह शिक्षा केवल ग्रामीण क्षेत्रों के लिये है ऐसा प्रतीत होता है।


2) रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार बुनियादी शिक्षा का उद्देश्य आर्थिक उत्पादन है, व्यक्तित्व का संतुलित विकास नहीं। इससे धनी और गरीब के बीच की खाई बढ़ने का भव है।


3) किसी भी उद्योग के माध्यम से सभी विषयों का शिक्षण और मनुष्य का समग्र विकास संभव नहीं है।


4) उद्योग केंद्रित शिक्षा होने के कारण अस्वाभाविक की संभावनाएँ बहुत है।