राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 - National Policy on Education, 1986

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 - National Policy on Education, 1986


1986 में घोषित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महिलाओं की शिक्षा में व्यापक परिवर्तन लाने की संकल्पना की गई है। शिक्षा को स्त्रियों के स्तर में मूलभूत परिवर्तन लाने के साधन के रूप में प्रयोग करने को कहा गया है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा कार्यान्वयन कार्यक्रम 1992 में स्त्री शिक्षा से संबंधित निम्न बातें सम्मिलित की गई हैं-


1. पुनर्रचित पाठ्यक्रमों व पाठ्यपुस्तकों, नीति निर्धारकों व प्रशासकों के प्रशिक्षण व पुनश्चर्या कार्यक्रमों तथा शिक्षा संस्थानों की सक्रिय सहभागिता के द्वारा नए मूल्यों के विकास को बढ़ावा दिया जाएगा।


2. विभिन्न पाठ्यक्रमों के अंग के रूप में स्त्री अध्ययन को बढ़ावा दिया जाएगा।


3. शिक्षा संस्थाओं को स्त्री विकास के कार्यक्रमों को संचालित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। 


4. स्त्री निरक्षरता तथा प्राथमिक शिक्षा तक उनकी पहुँच तथा उसमें बने रहने के मार्ग की बाधाओं के निराकरण संबंधित प्रयासों को प्राथमिकता दी जाएगी।


5. विभिन्न स्तरों की व्यावसायिक, तकनीकी तथा वृत्तिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष बल दिया जाएगा।


6. यौन विभेद न करने की नीति को बढ़ावा दिया जाएगा जिससे व्यावसायिक व वृत्तिक पाठ्यक्रमों से यौन प्रधानता को समाप्त किया जा सके तथा गैर-परंपरागत रोजगारों के साथ-साथ वर्तमान में विकसित हो रही तकनीकी में स्त्रियों को बढ़ावा दिया जा सके।


नई शिक्षा नीति 1986 तथा 1992 की कार्य योजना के परिणामस्वरूप महिलाओं की साक्षरता दर में निरंतर वृद्धि हुई। 1951 में जहाँ इनकी साक्षरता 7.3% थी, वहीं 1991 में 39.29% हो गई। वर्ष 1981 से 1991 के मध्य महिलाओं की साक्षरता में 9.6% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि 1991 से 1997 के मध्य इसमें तीव्र वृद्धि (11% की ) हुई । वर्ष 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की साक्षरता दर का प्रतिशत 54.16 हो गया। साक्षरता की यह दर सात वर्ष और उससे ऊपर आयु वाली बालिकाओं की जनसंख्या से संबंधित है। तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा की बात करें तो 1950-51 में जहाँ 6000 महिलाओं की इस क्षेत्र में भागीदारी थी वहीं 1986-87 में इनकी संख्या 1.46 लाख हो गई जो कि 23 गुणा वृद्धि को प्रदर्शित करती है।


स्पष्टतः प्राथमिक स्तर पर वर्ष 1950-51 में बालिकाओं का नामांकन प्रतिशत 28.1 से बढ़कर वर्ष 1999-2000 में 43.6 प्रतिशत हो गया और उच्च प्राथमिक स्तर पर इसी अवधि में यह प्रतिशत 16.1 से 40.4 हो गया।

सारणी से स्पष्ट है कि 1950-51 से 1999-2000 के दौरान तीनों स्तरों पर बालिकाओं की नामांकन दर तेज़ हो रही है। 1950-51 में प्राथमिक स्तर पर 5.4 करोड़ बालिकाएं नामांकित थीं और 1999-2000 में इनकी संख्या 49.5 करोड़ हो गई जो कि 8 गुणा से अधिक वृद्धि को प्रदर्शित करती है। इसी प्रकार उच्च प्राथमिक स्तर पर इसी अवधि में 33.8 गुणा और उच्चतर माध्यमिक बस्तर पर 54.5 गुणा वृद्धि परिलक्षित होती है। इसी अवधि में बालकों का नामांकन दर बालिकाओं का नामांकन दर की तुलना में तीनों स्तरों पर कम पाई गई। इस प्रकार इसमें कोई संदेह नहीं है कि बालिकाओं में शिक्षा का प्रसार तीव्र गति से हुआ है। एक मात्र निराशाजनक पक्ष यह हो सकता है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की साक्षरता अभी भी बहुत कम है। वर्ष 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण पुरुषों की साक्षरता का प्रतिशत (71.40), ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता के प्रतिशत (46.70) से बहुत अधिक है। जबकि इसके विपरीत शहरी पुरुषों की साक्षरता (86.70% ) एवं शहरी महिलाओं की साक्षरता (73.20%) के मध्य अंतर कम है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्री शिक्षा के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है।


फिर भी समग्र रूप से कहा जा सकता है कि स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों का असर हुआ है, परंतु संपूर्ण जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए यदि इसे अपर्याप्त कहा जाए तो यह अनुपयुक्त नहीं होगा। स्त्रियों की शिक्षा में भागीदारी सुनिश्चित करने और उसमें सुधार करने केलिए निम्नलिखित विशिष्ट कदम उठाए गए हैं


1. श्यामपट्ट अभियान/ ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड के अंतर्गत सरकार ने 1987-88 से एक लाख प्राथमिक स्कूल अध्यापकों के पद सृजन के लिए सहायता प्रदान की है जो स्त्रियों द्वारा ही भरे जाने थे। पाँच वर्षों में, (अर्थात 1992 तक) लगभग 75% पद भरे गए जिनमें से 60% महिला शिक्षिकाएँ थीं। 


2. लड़कियों के लिए एन.एफ.ई. केंद्रों की संख्या 1991 तक 81000 हो गई थी जिनको 90% सरकारी सहायता मिलती थी।


3. 'महिला समाख्या' (स्त्रियों की समानता के लिए शिक्षा) परियोजना अप्रैल 1989 में प्रारंभ की गई जिसका उद्देश्य था प्रत्येक संबंधित गाँव में महिला संघ के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने के लिए महिलाओं को तैयार करना। यह केंद्र सरकार की योजना है जिसमें उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में महिला समाख्या समितियों को पूर्णरूपेण वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इंडो डच योजना होने के कारण इसको नीदरलैंड सरकार से शत-प्रतिशत सहायता प्राप्त होती है। इस योजना का उद्देश्य शिक्षा की मांग पैदा करना और पूर्वस्कूली, अनौपचारिक, प्रौढ़ तथा अविराम शिक्षा के लिए नवीन शैक्षणिक प्रविष्टियाँ प्रारंभ करना है। 


4. सजग कार्यवाही द्वारा नवोदय विद्यालयों में लड़कियों का प्रवेश 28% तक सुनिश्चित किया गया है। 


5. प्रौढ शिक्षा केंद्रों में स्त्रियों के प्रवेश पर विशेष ध्यान दिया गया है।


6. ग्रामीण प्रकार्यात्मकता साक्षरता कार्यक्रम के अंतर्गत 1995 तक प्रौढ़ शिक्षा में कुछ नामांकित लोगों में से लगभग 55% तो स्त्रियाँ हीं थीं।


स्त्रियों की शिक्षा, सामाजिक कल्याण, स्वास्थ्य एवं अन्य क्षेत्रों में बहुमुखी विकास करने के लिए स्त्रियों हेतु राष्ट्रीय समिति का गठन 31 जनवरी, 1992 को किया गया। 30 मार्च, 1993 को राष्ट्रीय महिला कोष की स्थापना की गई। इसी क्रम में इंदिरा महिला योजना की शुरुआत 20 अगस्त, 1995 को की गई और बालिका समृद्धि योजना 20 अक्टूबर 1997 को प्रारंभ की गई। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए ग्रामीण महिला सशक्तीकरण एवं विकास परियोजना (स्वशक्ति योजना) के नाम से 16 अक्टूबर, 1998 को प्रारंभ की गई योजना कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी गई है। इसी क्रम में स्कूल जाने वाली बालिकाओं हेतु निःशुल्क पुस्तकें देने के लिए भाग्यश्री योजना को प्रारंभ किया गया। स्वतंत्रता के उपरांत भारतीय समाज में कन्या शिक्षा को एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है

एवं इस दिशा में केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा प्रयास निरंतर जारी हैं। छह से चौदह आयु वर्ग के सभी बालक-बालिकाओं को निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का राष्ट्रीय संकल्प तो दिसम्बर 2002 में हुए 86वें संविधान संशोधन के उपरांत भारत के प्रत्येक बालक-बालिका का एक मूल अधिकार बन गया है। सर्व शिक्षा अभियान / सबके लिए शिक्षा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सभी को शिक्षित करने के सरकारी प्रयासों का एक केंद्रीय तत्व स्कूल न जाने वाली या स्कूल छोड़ देने वाली लड़कियों तक शिक्षा की पहुँच को बढ़ाना है। यह कार्यक्रम कन्या शिक्षा हेतु न केवल शिक्षा प्रणाली में वरन सामाजिक मान्यताओं व दृष्टिकोणों में व्यापक परिवर्तन लाने के महत्व व आवश्यकता को भली भाँति स्वीकारता है। यही कारण है कि अब भारतवर्ष के सभी राज्यों में कन्या शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए द्वि-बिंदु प्रयास किए जा रहे हैं। प्रथम, लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच व ठहराव को विभिन्न प्रकार के उपाय करके बढ़ाया जा रहा है एवं द्वितीय, प्रशिक्षण व अभिप्रेरण के द्वारा समाज में लड़कियों की शिक्षा की माँग को सृजित किया जा रहा है।

कन्या शिक्षा के प्रचार-प्रसार एवं 6-14 आयु वर्ग में सभी बालक-बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करने के संवैधानिक संकल्प का पूरा करने के निमित्त चनाए जा रहे सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत अनेक योजनाओं का नियोजन व कार्यान्वयन किया जा रहा है। इनमें से कुछ प्रमुख योजनाएँ निम्नवत हैं


1. कक्षा 8 तक के सभी लड़कियों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें देना।


2. विद्यालयों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनवाना।


3. स्कूल छोड़ चुकी लड़कियों के लिए 'स्कूल की ओर' अभियान चलाना ।


4. अधिक उम्र वाली लड़कियों के लिए ब्रिज पाठ्यक्रम चलाना


5. विद्यालयों में न्यूनतम पचास प्रतिशत महिला अध्यापकों को नियुक्त करना


6. लड़कियों के लिए समरूप अधिगम अवसर बढ़ाने के लिए अध्यापकों को संवेदनशील बनाना।


7. पाठ्यपुस्तकों सहित सभी शिक्षण-अधिगम सामग्री को यौन-संवेदनशील बनाना। 


8. जन समर्थन व सहयोग प्राप्त करने के लिए सघन अभियान चलाना


9. विद्यालयों में लड़कियों की उपस्थिति व ठहराव को सुनिश्चित करने के लिए नवाचारी उपाय करना ।


सर्व शिक्षा अभियान के साथ-साथ प्रारंभिक स्तर पर कन्या शिक्षा का राष्ट्रीय कार्यक्रम, महिला समाख्या, पूर्व-बाल्यकाल परिचर्या व शिक्षा तथा एकीकृत बाल विकास सेवा जैसे विभिन्न पाठ्यक्रमों के द्वारा कन्या शिक्षा के विविध पक्षों को सुदृढ़ करके लड़कियों तक शिक्षा के प्रकाश को पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस सारी कवायद का केंद्रीय पक्ष वस्तुतः समाज में कन्या शिक्षा की माँग को सृजित करना, कन्या शिक्षा में जन समुदाय विशेषकर महिलाओं की सहभागिता को बढ़ाने वाली परिस्थितियों का निर्माण करना तथा कन्या शिक्षा को सुनिश्चित करने वाले दबाव कारकों को उत्पन्न करना है। इस कार्यक्रम में निस्संदेह समाज व माता-पिता की अभिप्रेरणा व सजगता, स्कूली क्रियाकलापों व समितियों में महिलाओं व माताओं की बढ़ती भूमिका एवं स्कूल, अध्यापक व समुदाय के परस्पर संबंध का सुदृढ़ीकरण जैसे उपाय परम आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हैं। पूर्व बाल्यकाल परिचर्या व शिक्षा जहाँ लड़कियों को अपने छोटे भाई-बहन की देखभाल से विमुक्त करके उनके स्कूल जाने व वहाँ रुकने का मार्ग प्रशस्त करता है, वहीं एकीकृत बाल विकास सेवा के द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्तायों, प्राथमिक स्कूल अध्यापकों व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करके पूर्व विद्यालय शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता है। प्रारंभिक स्तर पर कन्या शिक्षा के राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत अनेक कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों की स्थापना की गई है जिनका उद्देश्य दुर्गम क्षेत्रों में मुख्यतः अनुसूचित जाति व जनजाति, अन्य पिछड़ा में वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों की लड़कियों की शिक्षा हेतु गुणवत्तापरक आवासीय शिक्षा सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। केंद्र व राज्य सरकारों के इन प्रयासों से निःसंदेह हमारे देश में कन्या शिक्षा का तीव्र गति से प्रसार हुआ है एवं आशा की जा सकती है कि शीघ्र ही शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त यौन असंतुलन समाप्त हो जाएगा।