आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री की स्थिति के संकेतक (2) - Indicators of the status of tribal and nomadic women

आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री की स्थिति के संकेतक (2) - Indicators of the status of tribal and nomadic women

जेंडर के आधार पर श्रम का बँटवारा


जेंडर के आधार पर श्रम के बँटवारे का अर्थ है स्त्री एवं पुरुष के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक आदर्शों अनुसार उन्हें क्या करना चाहिए या वे क्या कर सकते हैं, के आधार पर, निर्धारित विभिन्न भूमिकाओं, के कार्यों और ज़िम्मेदारियों का बँटवारा। स्त्री और पुरुष को उनकी जेंडर-भूमिकाओं के आधार पर विभिन्न कार्य और जिम्मेदारियाँ सौपीं जाती हैं, न कि उनकी निजी प्राथमिकता या क्षमता के आधार पर। जैसे कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में आमतौर पर पुरुष का कार्य धन उपार्जन है और स्त्री का कार्य घर और बच्चों की देख-रेख करना।


जेंडर के आधार पर श्रम का बँटवारा किसी समाज में असमानता और शोषण का कारण भी हो सकता है, क्योंकि प्रत्येक समाज में स्त्री और पुरुष के कार्य को समान रूप से आँका नहीं जाता और न ही सराहा जाता है। यहाँ तक कि आधुनिक समाजों में भी स्त्री द्वारा किए गए गृहकार्य का समुचित मूल्यांकन नहीं होता।


स्त्रीवादी इतिहासकार जॉन केली (Joan Kelly, 1984) के अनुसार जितना ही घरेलू और सार्वजनिक काम में अंतर किया जाता है, उतना ही काम बढ़ता है और संपत्ति दो अलग-अलग प्रकार की हो जाती है। तब उत्पादन भी दो प्रकार का हो जाता है। जीविका चलाने के लिए उत्पादन और विनिमय के लिए उत्पादन। यहीं से जेंडर असमानता की शुरुआत हो जाती है।


जनजातियों में अब भी उत्पादन बड़े पैमाने पर जीविका चलाने से संबंधित होता है। उनकी अर्थव्यवस्था अभी भी मुख्य रूप से जीवन निर्वाह की अर्थव्यवस्था है (subsistence economy)| स्त्री और पुरुष घरेलू क्रिया-कलापों का साझा करते हैं और यहाँ सार्वजनिक और निजी का भेद तुलनात्मक रूप से कम होता है। आदिवासी समुदाय की स्त्रियाँ ईंधन के लिए लकड़ी, शहद, फल-फूल, लाख, जड़ी-बूटी आदि जंगली उत्पाद इकठ्ठा करने में अपना बहुत समय खर्च करती हैं।

अगर वे इन्हें आवश्यकता से अधिक इकट्ठा कर पाती हैं तो इन्हें बेच भी देतीं हैं। इस प्रकार यहाँ घरेलू कार्य और व्यापारिक कार्य-कलापों में स्पष्ट अंतर नहीं होता है।


दूसरे वर्गों और गैर- जनजातीय समुदायों की तुलना में जनजातीय समुदायों में स्त्री और पुरुष के बीच असमानता कम होती है। आदिवासी समुदाय बहुत तरह के पेशे में लगे रहते हैं; जैसे- शिकार, जंगली उत्पादों का संग्रहण, झूम खेती, दस्तकारी और कारीगरी आदि बहुत कम आदिवासी समुदाय ऐसे हैं जो गैर-कृषि कार्यों जैसे भिक्षुक, भाट, पशुपालक जो घुमंतू से अर्ध-घुमंतू जीवन व्यतीत करते हैं। इन समुदायों की स्त्रियाँ रोजाना के घरेलू कार्यों के अलावा कई-कई घंटे खेतों में या जंगलों में कार्य करती हैं। काम की यह लंबी अवधि गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद भी ऐसी ही बनी रहती है।


जेंडर भूमिका और जेंडर संबंधों की तरह ही जेंडर के आधार पर श्रम का बँटवारा भी प्रत्येक समाज में एक समान नहीं होता है। उदाहरणार्थ, दक्षिण भारत के नीलगिरी-निवासी पशुपालक टोडा जनजाति के आर्थिक और सामाजिक जीवन का मुख्य आधार भैंस पालना है।

कुछ भैसें इतनी पवित्र समझीं जाती हैं कि जहाँ उनका दूध निकाला जाता है और दही मथी जाती है वह स्थान इनका मंदिर होता है। स्त्रियों को मासिक धर्म, प्रसूत आदि के कारण अपवित्र तथा अयोग्य समझा जाता है। इसलिए भैंसो से संबंधित समस्त कार्य उनके लिए वर्जित होते हैं, यहाँ तक कि उन्हें इन भैसशालाओं के पास तक जाने की अनुमति नहीं होती है। उन्हें इनके दूध से बनने वाले व्यजंन भी बनाने की अनुमति नहीं होती।


हिमाचल प्रदेश के गद्दी और सिक्किम के भोटिया आदिवासी समुदायों में पुरुष पशु चराते हैं और स्त्रियाँ भोजन के लिए खेती करती हैं। ऐसे ही राजस्थान के भील और लद्दाख के बोद आदिवासी समुदायों में भी पुरुष विभिन्न कार्यों से घर से दूर रहते हैं और खियाँ खेती करती हैं। इन समुदायों में खेती का ज्यादातर कार्य स्त्रियों द्वारा किया जाता है। वे बुवाई से लेकर निराई, गुड़ाई एवं कटाई तक का कार्य करती हैं, पर वे खेत जोतने का कार्य नहीं करती, यह पुरुषों का ही कार्य होता है (भसीन,2007)। पशुपालक घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समाजों पर किए गए कई अध्ययन बताते हैं

कि स्त्रियों की स्थिति इन समाजों में बहुत अच्छी नहीं होती, क्योंकि पशुओं की वास्तविक देख-भाल और उनसे संबंधित आर्थिक गतिविधियाँ पूरी तरह से पुरुषों के हाथ में होती हैं।


त्रिपुरा के आदिवासी समुदायों में, जो पारंपरिक झूम खेती करते हैं, स्त्रियाँ साधारणतया सभी आर्थिक क्रिया-कलापों में भाग लेती हैं। यद्यपि लिंग और उम्र के आधार पर उनमें भी श्रम का बँटवारा होता है (चक्रवर्ती, 1993:13)। गांगुली (1993) के अनुसार झूमिया समाजों में स्त्री हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर चाहे न भी हों, लेकिन वे आर्थिक रूप से उन पर कम आश्रित होती हैं। इसकी वजह से वो शोषण और प्रताड़ना से भी कम दो-चार होती हैं। यह भी तर्क दिया जाता है कि आदिवासी लड़कियों की कार्य में यह भागीदारी उनकी शादी के समय उनका वधु-मूल्य तय करने में भी खास भूमिका निभाता है (दासगुप्ता, 1993)।

राजनैतिक भागीदारी


अब तक अध्ययन किए गए सभी आदिवासी एवं खानाबदोश समुदायों में स्त्रियाँ समाज के स्तर पर राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय नहीं पाई गई हैं। घरेलू स्तर पर स्त्री की आर्थिक समृद्धि समुदाय के स्तर पर राजनैतिक शक्ति के रूप में परिवर्तित नहीं हुई है। यद्यपि पारिवारिक स्तर पर उनकी सत्ता की अनदेखी नहीं की जाती है, पर महत्वपूर्ण सामुदायिक कार्यभार उन्हें नहीं सौपा जाता है। लोकतंत्र की पहली सीढ़ी पंचायत है। पंचायत की बात प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सदियों से होती रही है। वर्ष 1955 में पंचायती राज व्यवस्था तो की गई पर आदिवासी स्त्रियों के लिहाज से यह कई कारणों से असफल सिद्ध हुई है। एक बड़े अंतराल के बाद वर्ष 1993 में 73वें एवं 74वें संशोधन में अभी तक हाशिए पर रही स्त्रियों को पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। भसीन (2007) ने गद्दी, भोटिया, भील और बोद समुदायों पर अपने अध्ययन में पाया है कि नियमानुसार प्रत्येक गाँव की पंचायत में एक महिला सदस्य होती है, लेकिन वह कभी भी बैठकों में उपस्थित होने का कष्ट नहीं करती और न ही पंचायत के काम-काज में कोई रुचि रखती है।


मातृवंशीय आदिवासी समुदायों में भी मुखिया पुरुष ही होते हैं। उदाहरण के लिए उत्तर-पूर्व निवासी खासी समुदाय में मुखिया का उत्तराधिकारी सबसे बड़ी बहन का सबसे बड़ा पुत्र होता है

और उसकी मृत्यु के बाद उसका सबसे बड़ा भाई या फिर उसका भांजा (बहन का बड़ा पुत्र) होता है। यदि पुरुष उत्तराधिकारी नहीं हैं, तब सबसे बड़ी बहन (या उसकी सबसे बड़ी पुत्री) को उत्तराधिकार का अधिकार होता है। खासी मुखिया का भूमि या जंगल पर कोई विशेष अधिकार नहीं होता है। कोई भी निर्णय एक बैठक में लिया जाता है, जिसमें समुदाय के सभी वयस्क पुरुष भाग लेते हैं। ऐसी बैठकों में सभी वयस्क पुरुष की उपरिस्थिति अनिवार्य होती के है।


स्त्री की जगह


केवल गुण और विशेषता का ही जेंडरीकरण नहीं होता, बल्कि जगहों का भी जेंडरीकरण होता है। जगह के जेंडरीकरण से तात्पर्य उन जगहों से हैं, जो आमतौर पर पुरुष या स्त्री के लिए विशेषकृत अथवा वर्जित होती हैं। स्त्री की जगह से अर्थ है, वो जगहें जहाँ केवल स्त्रियाँ स्वतंत्रतापूर्वक किसी भी समय प्रवेश कर सकें, बैठ कर बातें कर सके और कार्य कर सके। सामान्यतः ये जगहें जेंडर के आधार पर श्रम के बँटवारे के परिणाम स्वरूप बनती हैं।


जैसे कि आधुनिक समाजों में आमतौर पर पब, गली के नुक्कड़, पान की दुकान, चाय की दुकान, छोटे शहरों और कस्बों में सिनेमा हॉल आदि पुरुषों की जगहें होती हैं। स्त्रियाँ सामान्यतः किसी पुरुष के साथ ही इन जगहों पर जाती हैं। यदि वे कभी अकेले जाती हैं तो कोशिश करती है कि जितनी जल्दी हो सके वहाँ से हट जाए। किसी भी स्थिति में उनका इन जगहों पर पुरुषों की तरह खड़े रहना या घूमते रहना अच्छा नहीं माना जाता।


इसी तरह गैर-आदिवासी समाजों में खास कर ग्रामीण इलाकों में घर भी पुरुष और स्त्री क्षेत्रों में बँटे होते हैं। जैसे बैठक और घर के बाहरी हिस्से पुरुष क्षेत्र बनाते हैं, केवल छोटी लड़कियों और बूढ़ी स्त्रियों को वहाँ जाने की अनुमति होती है। युवा स्त्रियाँ वहाँ केवल सफाई या अन्य जरूरी कार्यवश ही जाती हैं, जबकि घर के भीतरी हिस्से और रसोईघर आदि स्त्रियों के क्षेत्र होते हैं। सार्वजनिक नलकूपों और कुओं को छोड़ कर कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ महिलाएँ सार्वजनिक रूप से एकत्र होकर समय व्यतीत कर सकें।


आदिवासी समुदायों में भी स्त्रियों के लिए प्रायः नलकूप, कुआ या फिर पानी के झरने आदि ऐसी जगह हैं जहाँ वे सामूहिक रूप से समय व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुषों के लिए हर गाँव में किसी पेड़ के नीचे या कोई निश्चित स्थान होता है जहाँ वे सार्वजनिक मामलों पर बैठक आदि करते हैं। इसी तरह घर का आँगन मुख्य रूप से स्त्रियों की जगह होती है। केवल दांवनी (threshing) के समय ही स्त्री-पुरुष एक साथ मिलकर यहाँ कार्य करते हैं। गद्दी और भोटिया जैसे पशुपालक समाजों में चारागाह पुरुषों की जगह होती है, जबकि खेत आमतौर पर स्त्रियों के क्षेत्र में आते हैं।


इस प्रकार से हम देख सकते हैं कि गैर-जनजातीय समाजों की तरह ही जनजातीय समाजों में भी स्त्रियों के लिए कोई विशेष सार्वजनिक जगह नहीं होती है। परंतु, उन्हें किसी जगह जाने की मनाही भी नहीं होती है।