सीखने के प्रमुख व्यवहारवादी सिद्धान्त (2)- Major Behavioral Theories of Learning
सीखने के प्रमुख व्यवहारवादी सिद्धान्त (2)- Major Behavioral Theories of Learning
अधिगम के गौण नियम
थार्नडाइक ने पाँच गौण नियम भी प्रस्तुत किए, जिनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है
[i] बहु प्रतिक्रिया नियम (Law of Multiple Response) - भूखी बिल्ली ने मछली प्राप्त करने के लिऐ अनेक प्रयास किए, अन्त में लीवर दबा कर पिजरे का द्वार खोलना सीख लिया। प्रयत्न तथा भूल का सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।
[ii] मानसिक विन्यास का नियम (Law of Mental Set)- अधिगम मानसिक विन्यास पर भी आधारित होता है। मानसिक विन्यास में सीखना सीखने वाले व्यक्ति की अभिवृति पर भी आधारित होता है। यदि व्यक्ति सीखने के लिए तैयार है तो शीघ्र सीख लेगा, यदि सीखने के लिए तैयार नहीं है तो वह या तो देर से सीखेगा या फिर सीखेगा ही नहीं।
[iii] अपूर्ण क्रिया का नियम (Law of Partial Activity or Law of Prepotency of Elements) - थार्नडाइक का मानना है की कार्य को छोटे-छोटे टुकडों में बाँटकर सीखने से सीखने की गति तीव्र होती है। अंश से पूर्ण की ओर (From Part to Whole) सीखने का नियम इसी पर आधारित है।
[iv] साम्यानुमान का नियम (Law of Analogy)- इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी नई समस्या पर वही प्रतिक्रिया करता है, जो कि उसने पहले भी समस्या को समान परिस्थिति में की होती है। शिक्षण सूत्र 'ज्ञात से अज्ञात की ओर' इस का उदाहरण है।
[v] साहचर्य परिवर्तन का नियम (Law of Association Shifting )- पशुओं के प्रशिक्षण में इस नियम को हम प्राय: देखते रहते है। कुत्ते को कोई खाद्य पदार्थ दिखाकर पीछे के पैरों पर खड़ा होना सिखा देते है।
बाद में पह चुटकी बजने से ही पीछे के पैरों पर खड़ा होना शुरु हो जाता है, ऐसा ही कार्य थार्नडाइक ने मछली दिखाकर बिल्ली को पीछे के पैरों पर खड़ा होना सिखाया था। बाद में वह बिल्ली खड़ी हो कहने पर ही पीछे के पैरों पर खड़ी हो जाया करती है। इसे साहचर्य परिवर्तन कहते है।
3. उद्दीपन - अनुक्रिया सम्बद्ध सिद्धान्त के शैक्षिक निहितार्थ -
इस सिद्धान्त के निम्नलिखित शैक्षिक निहितार्थ हैं
1. सीखने वाले की सक्रियता पर बल, यदि सीखने वाला निष्क्रिय है तो सीखने की क्रिया कम होगी अथवा नहीं हो पायेगी। सक्रियता बनाये रखने के लिए करके सीखने तथा समूह परिचर्चा पर बल देना चाहिए।
2. अध्यापन कार्य करने के पहले छात्र को उत्प्रेरित करना चाहिए ताकि सीखने की क्रिया में वह सक्रिय रह सके।
3. कौशलों के सीखने के लिए अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। सही उच्चारण के लिए, सुलेख के लिए तथा वर्तनियों की शुद्धता पर अभ्यास के माध्यम से दिया जाना उपयोगी रहता है। ध्यान रखना चाहिए कि भाषा व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
4. विषयवस्तु को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करके शिक्षण करना प्रभावी रहता है। अभिक्रमित अधिगम का महत्तवपूर्ण भाग छोटे पदों का सिद्धान्त है।
5. शिक्षण से पूर्व पाठ की महत्वपूर्ण बातें तथा बाद में पुनरावृत्ति अवश्य करनी चाहिए। शिक्षण के बाद गृह-कार्य दिया जाना पुनरावृत्ति को बल प्रदान करता है। थोड़े-थोड़े समय बाद परीक्षा के माध्यम से बच्चों को पुनरावृत्ति करने के लिए अवसर प्रदान करते हैं।
6. अध्यापकों को चाहिए कि वह अधिगमकर्ताओं को एक सुखद अनुभव प्रदान करें। सिखाना, तनावपूर्ण या दु:खद अनुभूति करने वाला नहीं होना चाहिए।
7. बच्चों को प्रोत्साहन देना शिक्षण का एक आवश्यक अंग बनाना चाहिए।
8. कई बार अध्यापक दण्ड के माध्यम से शिक्षण कार्य करते देखे गए हैं। दण्ड देना अध्यापक के मानसिक असन्तुलन, अक्षमता, कुंठाओं से ग्रस्त होने का प्रतीक है। जबकि छात्रों को प्रेमपूर्वक प्रोत्साहन देकर पढ़ाना उसके उच्च चरित्र, शिक्षण अभियोग्यता, उच्च मानसिक रूप से स्वस्थ होने का प्रतीक है।
9. बच्चों की योग्यताओं, अभिक्षमताओं तथा व्यवहार में वैयक्तिक विभेद होते हैं, जिनके कारण बच्चे स्वगति से सीखते हैं। प्रत्येक बच्चे में एक से अधिक विशेषताएँ पाई जाती हैं। अध्यापक को उन विशेषताओं को खोज कर बच्चों के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, नैतिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक विकास में उपयोग करना चाहिए।
10. प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त हमें यह शिक्षा देता है कि प्रयास की संख्याओं में कमी करने के लिए अध्यापक उचित संकेत (Clue) प्रदान करे। संकेत इतने स्पष्ट न हो कि उनका पालन करते ही छात्र को तुरन्त समस्या का समाधान मिल जाए। बल्कि ऐसे होने चाहिए कि अधिगमकर्त्ता को कुछ प्रयास करना आवश्यक हो जाए ताकि उसमें आत्मविश्वास का उदय हो। साथ ही समस्या समाधान के लिए क्रमबद्ध तरीके विकसित करने की योग्यता का विकास करना आवश्यक है।
11. सफलता की अनुभूति कराना बहुत आवश्यक है। अतः कक्षा में छात्रों को प्रेरित करने के लिए पिछड़े बालकों से सरल प्रश्न पूछने चाहिए।
पावलॉव का शास्त्रीय अनुबन्धन का सिद्धान्त (Classical Conditioning Theory of Pavlov)
रूस के शरीर क्रिया विज्ञानी ईवान पी. पावलव (Evan P. Pavlov) ने शास्त्रीय अनुबन्धन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
इनकी रुचि पाचन प्रक्रिया में पेट में होने वाले विभिन्न पाचक स्रावों के अध्ययन में थी। इनके अनुसंधानों की उपयोगिता को देखते हुए इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अधिगम के सम्बन्ध में इनके अध्ययन शास्त्रीय अनुबन्ध या सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त (Conditioned ResponseTheory) परम्परागत अनुबन्धन सिद्धान्त आदि कहते हैं। शास्त्रीय अनुबन्ध सिद्धान्त अधिक उपयुक्त एवं सटीक नाम है।
भोजन खाते समय मुँह में लार आना एक प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex action) या सहज क्रिया है। परन्तु भोजन से सम्बन्धित अन्य घटनाओं से मुँह में लार आना एक अधिगम अनुक्रिया है पावलव ने इस क्रिया को अनुकूलित प्रतिवर्ती क्रिया (Conditioned Reflex Action) नाम दिया।
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