अनुदेशन के माध्यम (2)- through instruction
अनुदेशन के माध्यम (2)- through instruction
चार्ट, पोस्टर, डायग्राम एवं ग्राफ (चित्र)
किसी वस्तु या क्रिया को स्पष्ट करने के लिये चार्ट पेपर पर बनाये गए चित्रों तथा इसके लिखित विवरण को चार्ट कहते हैं। चार्ट या तो हाथ से बनाये जाते हैं अथवा मुद्रित होते हैं। चार्ट का प्रयोग विभिन्न उदृदेश्यों की प्राप्ति के लिये किया जाता है। जैसे-
• प्रकरण की प्रस्तावना में।
• सिद्धांत एवं नियमों की व्याख्या करने हेतु
• पाठ का विकास करने के लिए।
• छात्रों को सक्रिय बनाने के लिए।
• पाठ को रोचक एवं बोधगम्य बनाने के लिए।
• मूल्यांकन करने के लिए।
• आँकड़ों की तुलना करने के लिए।
• विशिष्ट संदेश देने के लिए।
• पाठ्य-वस्तु को स्पष्ट करने के लिए।
चार्ट का प्रयोग लगभग हर विषय में किया जा सकता है। चार्ट के प्रभावशाली उपयोग के लिये उचित विधि से ही चार्ट का प्रयोग करना चाहिए। चार्ट की विषय-वस्तु सुव्यवस्थित स्पष्ट, सुन्दर सुडौल तथा बड़े आकार की होनी चाहिये जो कक्षा में प्रत्येक छात्र आसानी से देख सके ।
पोस्टर - एक विशेष संदेश को जन जन तक पहुँचाने के लिए पोस्टर शक्तिशाली उपकरण है। पोस्टर में आकर्षक ढंग से किसी भी विचार को प्रदर्शित करने की क्षमता होती है। पोस्टर की सामग्री अनायास ही व्यक्ति को बड़ी सफलता के साथ अपनी ओर खींच लेती है। निर्देशन, प्रौढ़ शिक्षा, जनसंख्या शिक्षा आदि के क्षेत्र में पोस्टर बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
डायग्राम तथा स्कैच - शिक्षक की ऐसे समय पर सहायता देते हैं, जब अन्य संप्रेषण की सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे समय या तो शिक्षक स्वयं श्यामपट पर डायग्राम तथा स्कैच खींच लेता है या वह मुद्रित डायग्राम एवं स्कैचों का प्रयोग करता है तथा स्कैच प्रत्येक विषय के लिये उपयोगी प्रविधि है । शिक्षकों को डायग्राम तथा स्कैच खींचने में कौशल विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।
'किसी पदार्थ की आकृति का रेखाओं द्वारा किया गया चित्रण डायग्राम कहलाता है तथा स्कैच डायग्राम का लघु एवं आशुनिर्मित रूप है। जैसे किसी व्यक्ति की नाक का पूरा चित्रण डायग्राम कहा जाता है, परन्तु नाक के किसी भाग-विशेष के बारे में बताने के लिये या उस भाग की क्रिया समझाने के लिये बनाया गया या मुद्रित रेखाचित्र स्कैच कहलाता है।
ग्राफ - ग्राफ का प्रयोग तथ्यों या विचारों को मात्रात्मक रूप से प्रस्तुत करने के उद्देश्य से किया जाता है । आधुनिक युग में समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में विभिन्न ग्राफों का प्रयोग विभिन्न आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करने के लिये बहुत लोकप्रिय हो गया है।
श्रव्य साधन
ये वे साधन हैं, जिनमें श्रवणेन्द्रिय का उपयोग किया जाता है।
जैसे- रेडियो, ट्रांजिस्टर, टेपरिकार्डर, भाषण, वार्ता, ग्रामोफोन तथा लिंग्वाफोन आदि। इनमें आवाज के द्वारा समस्त सूचनायें प्रदान की जाती है, जो सुनने वालों की कल्पना शक्ति को उद्दीप्त करती है। श्रव्य साधन में प्रमुख दो साधनों का विवरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है:
रेडियो - यह उपकरण अनुदेशन को प्रभावी बनाने के लिए उपयोगी है। इसके द्वारा नवीन ध्वनि, शैक्षिक नाटक, कवितायें, महापुरूषों की जीवनियाँ, उनके प्रेरक प्रसंग, नए आविष्कार तथा खोजें, सामान्य ज्ञान, कठिन प्रकरण तथा पाठ योजनाएँ आदि प्रसारित की जाती हैं। आज भारत में कुल जनसंख्या के 95 में • प्रतिशत लोगों तक रेडियो की पहुँच हो गयी है।
रेडियो पर स्कूल-प्रसारण सर्वप्रथम 1973 में कलकत्ता रेडियो स्टेशन से किया गया। रेडियो पर शैक्षिक •प्रसारण की पूरी जानकारी विद्यालयों को पहले ही दे दी जाती है। फलस्वरूप जिस विषय पर प्रसारण होना है शिक्षक अपनी कक्षा को उसके लिये पहले से तैयार करता है। उसकी पृष्ठभूमि तथा भूमिका बनाता है और प्रसारण के पश्चात् छात्रों की समस्याओं एवं शंकाओं का निवारण करता है।
टेप रिकार्डर - आज युग में शिक्षा के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण उपकरण सिद्ध हुआ है। टेप रिकार्डर में विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ जैसे- जानवरों या चिड़ियों की आवाजें, महापुरुषों के प्रवचन, भाषण, प्रसिद्ध कलाकारों तथा बड़े लोगों की कविताएँ, संगीत आदि रिकार्ड करके दूसरे लोगों को सुनाया जा सकता है। बोलने की गति, स्वर के उतार-चढ़ाव, उच्चारण-सुधार आदि के क्षेत्रों में इसका उपयोग किया जाता है। टेप रिकार्डर के माध्यम से किसी प्रकरण की विषय-वस्तु / वार्ता आदि को आवश्यकतानुसार कक्षा में प्रस्तुत किया जा सकता है टेप रिकार्डर का प्रयोग निदानात्मक तथा उपचारात्मक शिक्षण में भी उपयोगी सिद्ध हुआ है।
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