रोकड़ - प्रवाह विवरण- संशोधित लेखांकन प्रमाप-3 - Cash Flow Statement-Revised Accounting Standard-3
रोकड़ - प्रवाह विवरण- संशोधित लेखांकन प्रमाप-3 - Cash Flow Statement-Revised Accounting Standard-3
रोकड़ प्रवाह विवरण के सम्बन्ध में इन्स्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउन्टैन्ट्स ऑफ इण्डिया ने जून 1981 में निर्गत लेखांकन प्रमाप- 3 (AS-3 ) के स्थान पर मार्च 1997 में संशोधित लेखांकन प्रमाप- 3 (Revised AS-3) निर्गमित किया है। 1 अप्रैल 2001 से निम्नलिखित उपक्रमों के लिए संशोधित लेखांकन प्रमाप-3 के अनुसार रोकड प्रवाह विवरण तैयार करना अनिवार्य कर दिया गया है - (अ) ऐसे उपक्रम जिनके समता अश या ॠण-पत्र भारत में किसी मान्यता प्राप्त स्कन्ध विपणि (Stock exchange) पर सूचीबद्ध है।
(ब) ऐसे उपक्रम जो अपने समता अंशों या ऋण-पत्रों को भारत में किसी स्कन्ध विपणि (Stock exchange) पर सूचीबद्ध कराना चाहते हैं या जिनके सूचीबद्ध करने की कार्यवाही चल रही है तथा इस आशय का प्रस्ताव संचालकों द्वारा संचालक मण्डल की बैठक में पारित कर लिया गया है।
(स) वे सभी औद्योगिक उपक्रम जिनकी बिक्री लेखांकन अवधि में 50 करोड़ रूपये से अधिक है।
संशोधित प्रमाप के अनुसार रोकड़ प्रवाहों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है-
(1) परिचालन क्रियाओं से रोकड प्रवाह (Cash flows from operating activities)
(2) विनियोजन क्रियाओं से रोकड़ प्रवाह (Cash flows from investing activities)
(3) वित्तीय क्रियाओसे रोकड प्रवाह (Cash flows from financial activities)
(1) परिचालन क्रियाओं से रोकड़ प्रवाह (Cash flows from operating activities) परिचालन क्रियाएँ उपक्रम की प्रमुख आगम देने वाली क्रियाएँ होती है
एवं ऐसे व्यवहारों एवं घटनाओं से होने वाले रोकड़ प्रवाहों को शामिल करती हैं जिनसे शुद्ध लाभ या हानि का निर्धारण होता है। परिचालन क्रियाओं से रोकड़ प्रवाहों के मुख्य उदाहरण है-
(अ) माल के विक्रय और सेवा प्रदान करने से रोकड प्राप्तियाँ।
(ब) अधिकार शुल्क, फीस कमीशन से रोकड़ प्राप्तियाँ एवं अन्य आगम ।
(स) माल और सेवाओं हेतु आपूर्तिकर्त्ताओं को भुगतान
(ट) कर्मचारियों को अथवा उनकी ओर से रोकड़ भुगतान।
(य) आयकर के लिये रोकड भुगतान और वापसियाँ जब तक कि इन्हें विशिष्ट रूप वित्तीयन से एवं विनियोजन क्रियाओं के रूप में न मान लिया जाये
(र) अनुबन्धों से सम्बन्धित रोकड़ प्राप्तियाँ एवं भुगतान जब व्यापार के उद्देश्य हेतु अनुबन्ध किये गये हों।
परिचालन क्रियाओं से रोकड़ प्रवाह ज्ञात करने की निम्नलिखित दो रीतियाँ हैं-
(1) प्रत्यक्ष रीति (Direct Method)
(2) अप्रत्यक्ष रीति (Indirect Method)
(1) प्रत्यक्ष रीति (Direct Method) – इस विधि के अन्तर्गत परिचालन क्रियाओं से रोकड प्राप्तियों जैसे नकद बिक्री, ग्राहकों एवं देनदारों से वसूल की गई रकम ब्याज अथवा लाभांश से रोकड़ की प्राप्ति आदि एवं परिचालन क्रियाओं के लिये रोकड़ भुगतानों जैसे माल एवं सेवाओं हेतु लेनदारों को भुगतान कर्मचारियों को उनकी सेवाओं हेतु भुगतान, ब्याज का भुगतान एवं सरकार को करों हेतु भुगतान को प्रदर्शित किया जाता है।
रोकड़ प्राप्तियों एवं रोकड़ भुगतानों के मध्य का अन्तर परिचालन क्रियाओं से शुद्ध रोकड प्रवाह कहलाता है।
(2) अप्रत्यक्ष रीति (Indirect Method) - इस विधि के अन्तर्गत गैर रोकड़ प्रकृति के व्यवहारों एवं चालू सम्पत्तियों तथा चालू दायित्वों के प्रभाव हेतु शुद्ध लाभ (हानि) को समायोजित किया जाता है। ऐसी मदें, जिनसे शुद्ध लाभ तो प्रभावित हुआ है परन्तु उनसे रोकड़ प्रवाह नहीं होता है, उनकी रकमों को लाभ-हानि खाते द्वारा प्रदर्शित शुद्ध लाभ में जोड़ा जाता है। ऐसी मदों में ह्रास, अमूर्त सम्पत्तियों का अपलेखन, विनियोग या स्थायी सम्पत्तियों की बिक्री से हानि आदिको सम्मिलित किया जाता है। इसके विपरीत गैर-रोकड़ और गैर-परिचालन आगमों (जैसे ब्याज एवं लाभांश से आय, विनियोगों और स्थायी सम्पत्तियों के विक्रय से लाभ आदि को) घटाया जाता है। इस प्रकार समायोजित लाभ / कार्यशील पूँजी के परिवर्तनों से पूर्व परिचालन लाभ (Operating profit before working capital changes ) कहलाता है। इसके बाद चालू परिचालन सम्पत्तियों (रोकड़ और रोकड़ तुल्यों को छोड़कर सभी चालू सम्पत्तियाँ जैसे देनदार, प्राप्य बिल, स्कन्ध, पूर्वदत्त व्यय आदि) एवं चालू परिचालन दायित्वों (बैंक अधिविकर्ष को छोड़कर सभी चालू दायित्व, जैसे व्यापारिक लेनदार, देय बिल, अदत्त व्यय आदि) में हुई कमी या वृद्धि के लिये समायोजन किये जाते हैं। चालू सम्पत्तियों की कमी तथा चालू दायित्वों की वृद्धि को शुद्ध लाभ से जोड़ा जाता है एवं चालू सम्पत्तियों की वृद्धि तथा चालू दायित्वों की कभी को घटाया जाता है।
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