स्त्री आरक्षण एवं 73वाँ - 74वाँ संविधान संशोधन विधेयक - Women's Reservation and 73rd - 74th Constitution Amendment Bill

स्त्री आरक्षण एवं 73वाँ - 74वाँ संविधान संशोधन विधेयक - Women's Reservation and 73rd - 74th Constitution Amendment Bill


प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के कार्यकाल के दौरान 22 दिसंबर, 1992 को लोकसभा के अंदर 73वाँ व 74वाँ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया, जिसके चलते स्थानीय स्वशासन व राजनीतिक प्रक्रिया में स्त्रीयों की भागीदारी को बढ़ावा मिला। इसका उद्देश्य पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआइ) को संवैधानिक स्थिति प्रदान करना, अधिकारों के विकेंद्रीकरण द्वारा संरचनात्मक परिवर्तन करना और स्वशासन की संस्थाओं में लिंगानुपात के असंतुलन को दूर करना था। यह प्रस्ताव पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) से संबंधित था, बावजूद इसके अनुच्छेद-243 (डी) के अंतर्गत ग्रामीण और शहरी शासन (पंचायतों और नगर पालिकाओं) में स्त्रीयों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए प्रावधान के अनुसार सभी राज्यों में गांव, मध्यवर्ती (ब्लाक / तालुका/मंडल) और जिला स्तरों पर त्रिस्तरीय पंचायती प्रणाली के लिए प्रत्यक्ष चुनाव कराने का प्रावधान किया गया है। पंचायतों की पाँच साल की अवधि, अनुसूचति जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वंचित वर्गों के लिए सीटों का आरक्षण एवं स्त्रीयों के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है।


73 वाँ संशोधन विधेयक पारित हो जाने पर पंचायतीराज संस्थाओं में सदस्यों और अध्यक्ष पद के रूप में आरक्षण प्राप्त है तथा पंचायत के प्रत्येक स्तर पर स्त्रीयों के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित हैं, जिसके लिए प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई जाती है।


इस प्रकार यह विधेयक स्त्रीयों के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है और पंचायत के प्रत्येक स्तर पर अध्यक्षों के कुल पदों का एक-तिहाई पद स्त्रीयों के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह की व्यवस्था शहरी स्वशासन संस्थाओं नगरपालिकाओं आदि में भी किया गया है। इस 73वें संशोधन अधिनियम ने स्त्रीयों की राजनीतिक भागीदारी को काफ़ी हद तक बढ़ाया है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी उल्लेखनीय भूमिका दिख रही है और आज तकरीबन पूरे देश में पंचायतों के पदों पर आठ लाख स्त्रीयाँ पदासीन हैं। यहाँ तक कि कुछ जगहों पर तो बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण या शैक्षणिक योग्यता के अन्यों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन काम करने में स्त्रीयों को पाया गया है। इसके बाद पूरे देश में एक व्यापक सक्रिय स्त्री राजनीतिकों का उभार देखा गया। फिर भी उनकी नेतृत्वकारी योग्यता पर लोगों का संदेह बना हुआ है। इसलिए उनकी योग्यता पर कुछ सवाल भी उठाए जाते रहे हैं।