क्रियाकलाप - activities
क्रियाकलाप - activities
शिक्षा का व्यापक उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना माना जाता है। अर्थात शिक्षा के द्वारा बालक के शरीर, मन तथा आत्मिक सभी पक्षों का अनुकूलम विकास करने का प्रयास किया जाता है। यह कहना तनिक भी अनुचित नहीं होगा कि इन तीन पक्षों में से यदि एक को भी अलग कर दिया जाय तब व्यक्ति अपने जीवन में पूर्णता को कदापि प्राप्त नहीं कर सकता है। यही कारण है कि शिक्षा प्रणाली में क्रियाकलापों का समायोजन होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वस्तुतः स्वस्थ, सुडौल व सक्रिय शरीर के अभाव में व्यक्ति के द्वारा अपनी शारीरिक क्रिया कलापों को सम्पन्न करना सम्भव नहीं हो पाता है।
इतिहास के अवलोकन से ज्ञात होता है कि सभी सभ्य समाजों ने अपने नागरिकों के लिए किसी ना किसी प्रकार से शिक्षण प्रक्रिया में क्रिया कलापों को समाहित करने का प्रयास किया है।
प्राचीन व मध्यकाल में दी जाने वाली शिक्षा में आखेट, युद्ध कला, खेल-कूद इत्याषदि भी सम्मिलित होते थे। यूनान में तो सर्व प्रथीम शारीरिक शिक्षा को समुचित स्थान देकर पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।
क्रिया कलाप की आवश्यकता :- मानव शरीर की प्रमुख पाँच ज्ञानेन्द्रिया होती हैं। कान, नाक, नेत्र जिव्हा व त्वचा । ज्ञानेन्द्रियों को संवेदना ग्राहक या ग्राही भी कहा जाता है। ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त वातावरण की जानकारी का क्रम निरन्तर जीवनपर्यन्त चलता रहता है व व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की सम्भावनाऐं उसकी ज्ञानेन्द्रियों के यथार्थ ढंग से कार्य करने पर निर्भर करती है। यही कारण है कि ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनाओं के विकास के लिए शैक्षिक पाठ्यक्रम में क्रिया कलापों पर अधिकतम ज़ोर दिया जाता है।
आधुनिक मनोविज्ञान बालक के विकास में वंशानुक्रम एवं वातावरण दोनों का योगद्वान मानते हैं। यदि उचित वातावरण विद्यार्थी को मिले तो वह आवश्यक वृद्धि व विकास को पा सकता है। अतः विद्यार्थी के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए क्रिया कलापों का शिक्षण प्रक्रिया में समायोजन आवश्यक है। क्रिया-कलाप के आयाम :
1) भाषा - प्रवीणता - भाषा सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है। भाषा द्वारा परस्पर सूचनाओं, विचार, स्पष्टीकरण व निर्देश आदि का आदान प्रदान किया जाता है। भाषा एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है जिसका स्वरूप मानव के परिपक्वता से निर्धारित होता है। भाषा प्रवीणता वह वाचिक योग्य ता है जिससे बालक अपनी परिपक्वता के अनुपात में अपने भावों तथा विचारों को दूसरों तक पहुँचाने अथवा दूसरों के विचारों तथा भावों को गहण करने में सहायक होता है।
भाषा प्रवीणता के मुख्य चार घटक है- श्रवण, वाचन, पठन व लेखन।
2 ) शारीरिक एवं स्वास्थ विकास - विकास शरीर की अनेक संरचनाओं तथा प्रकार्यो को संगठित करने की एक जटिल प्रक्रिया है। यह वह प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न आन्तरिक शरीर रचना सम्बन्धी परिवर्तन तथा इससे उत्पन्न मनोवैज्ञानिक प्रक्रियायें एकीकृत होकर व्यक्ति को सरलता, सहजता व मित्यव्ययता से कार्य करने योग्य बनाती है। अत: शारीरिक संरचना एवं स्वास्थं विकास के घटक है -
अ) वृद्धि व विकास - शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक तथा नैतिक वृद्धि व विकास
ब) शारीरिक शिक्षा व खेल कूद दौड़ना, उछलना, तैरना, वर्जिश करना, पर्वतारोहण, क्रिकेट, फुटबॉल, बास्केटबाल इत्यादि स) स्वास्थ शिक्षा – शारीरिक स्वच्छता, निद्रा व विश्राम आनन्ददायक वातावरण, मादक पदार्थ से दूरी, प्राथमिक उपचार, रोग संक्रमण जानकारी इत्यादि।
द) आहार व पोषण- खाद्य पदार्थ, पोषक तत्वा, भोजन नियमन व मात्रा इत्यादि ।
इ) शरीर संवर्धन- योग, ध्यान इत्यादि ।
( 3 ) सूचना व संप्रेषण क्रिया- मानव ज्ञान का भण्डार सदा गतिशील प्रकृति का होता है व निरन्तर नवीन ज्ञान का निर्माण होता रहता है। आधुनिक युग संचार माध्यमों से नई तकनीकों के प्रयोग व उपयोग का है। संप्रेषण के माध्यमों में भी निरन्तर बढ़ोत्तरी जारी है। संप्रेषण क्रिया के मुख्य घटक है- लिखित / मुद्रित सामग्री, मौखिक प्रस्तुति, रेडियो प्रसारण, दूरदर्शन प्रसारण, कम्यूटर, मल्टी मीडिया, विश्वि व्यापी संजाल इत्यादि।
4) पाठ्य सहगामी क्रियायें - एक समय था जब पठन-पठन से अन्येत्तर गतिविधियाँ पाठ्येत्तर मानी जाती थी। समय में परिवर्तन आया व शिक्षाविदों ने इसे पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा मानकर पाठ्य सहगामी क्रियाओं की संज्ञा दी। विद्यालयी पाठ्य सहगामी क्रियाओं को निम्नलिखित प्रकारो में बाँटा जा सकता है -
i. शैक्षिक क्रियायें - वाद-विवाद, साहित्य-क्लाब, विज्ञान-क्लब, प्रश्न -मंच तथा तात्कालिक भाषण आदि।
II. शारीरिक क्रियायें - खेल - कूद, व्यायाम, योग, तैराकी, परेड ड्रिल, साईकल चलाना एन.सी.सी इत्यादि।
iii. साहित्यिक क्रियायें - साहित्य सभा, नाटक, कविता पाठ, समाचार पत्र, नोटिस बोर्ड, वाचनालय इत्यादि।
iv. नागरिक क्रियायें – श्रमदान, बाल सभा, एन. एस. एस. मॉक-सांसद, मॉक-अदालत छात्र परिषद इत्यादि।
v. ललित क्रियायें संगीत, गायन, वाद्य, नृत्यह, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि।
vi. सामाजिक क्रियायें - भ्रमण, पिकनिक, ग्राम- पर्यवेक्षण, समाज सेवा, स्काउट एण्डद गाईड, प्रौढ़ शिक्षा, साक्षरता मिशन इत्यादि।
vii. शिल्प क्रियायें सिलाई, कढ़ाई, जिल्दसाजी इत्यादि
viii. अन्य क्रियायें - फोटोग्राफी, टिकीट व सिक्के संग्रह, इत्यादि।
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