समायोजन वस्तुत - adjustment virtually
समायोजन वस्तुत - adjustment virtually
समायोजनात्मक प्रक्रिया के तीन घटकों के मध्य संतुलन स्थापित करने की क्रिया है । जिन व्यवहार प्रणालियों द्वारा समायोजनात्मक संतुलन स्थापित होना संभव होता है उन्हें समायोजनात्मक प्रतिक्रियाएं या समायोजनात्मक व्यवहार कहते हैं। समायोजनात्मक प्रक्रिया का आरम्भ व्यक्ति की आवश्यकताओं के सक्रियकरण के साथ होता है।
समायोजन संबंधी उसकी इन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी व्यक्ति के समायोजन क्षेत्रों को तीन मुख्य भागों व्यक्तिगत, सामाजिक तथा व्यावसायिक में बांटकर समझने का प्रयत्न कर सकते हैं। एक भली भांति समायोजित कहे जाने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व व व्यवहार में निम्न विशेषताएं पायी जाती हैं :-
समायोजित कहे जाने वाले बालक में शारीरिक स्वास्थ्य एवं विकास संबंधी विशेषता पायी जाती है। एक समायोजित व्यक्ति का संवेगात्मक व्यवहार काफी संतुलित होता है वह अपने संवेगों की उचित अभिव्यक्ति को उचित ढंग से सीख लेता है। भली भांति समायोजित व्यक्ति यह जानता है कि उसकी अपनी योग्यताओं तथा क्षमताओं का क्या स्तर है किन बातों में वह आगे है तथा किन में पीछे। भली भांति समायोजित व्यक्ति जो कुछ भी अपने व्यक्तित्व में होता है उससे संतुष्ट रहने का प्रयत्न करता है । तथा अपने आत्म का भी सम्मान करता है। एक भली भांति समायोजित व्यक्ति सामाजिक विकास तथा सामाजिकता की दृष्टि से अपनी आयु के अनुसार ठीक प्रगति करता है। एक समायोजित व्यक्ति इसी प्रकार का संतुलन बनाए रखने का प्रयत्न करता है और इसलिए अनावश्यक, चिंता, परेशानी तथा निराशा के शिकार होने से बच जाता है। एक समायोजित व्यक्ति स्वभाव से दूसरों में उनकी अच्छाइयों के ही दर्शन करता है
उनकी बुराइयों तथा दोषों को ढूंढकर उनका प्रचार नहीं करता। समायोजित व्यक्ति का रूख व्यवहार तथा दृष्टिकोण अड़ियल टट्टू की तरह नहीं होता।
जब समायोजन स्थापित करने के लिए, व्यक्ति की आवश्यकताओं, उसकी क्षमताओं और विशेषताओं एवं परिस्थितियों के मध्य संतुलन स्थापित करने के लिए व्यक्ति के द्वारा किये गये व्यवहार अंततः विफल हो जाते हैं तब कुण्ठा की दशा उत्पन्न होती है। कुण्ठा की उत्पत्ति का कारण समायोजनात्मक प्रक्रिया के तीनों घटकों में से कहीं भी स्थित हो सकता है- आवश्यकताओं की तीव्रता, आवश्यकताओं का द्वन्द्व, या व्यक्ति की क्षमताओं और विशेषताओं में कोई कमियां, जैसे बुद्धि न्यूनता आकर्षक न होना, अपने बारे में और अपनी सार्मथ्यों के बारे में प्रत्यक्षण का उपयुक्त न होना, अभिवृत्तियों का उपयुक्त न होना आदि, अथवा, परिवेश में गंभीर बाधाओं की उपस्थिति, जैसे कानूनी बाधा, व्यक्ति के लिए अस्वीकार्य परम्पराएं, मूल्य या कार्य, दुर्घटना, आपदा आदि ।
प्रत्येक व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से निर्देशन की आवश्यकता होती है। इसके माध्यम से वह अपने विचारों, अपेक्षाओं और समस्याओं से निपटने में समर्थ होता है। व्यक्तिगत निर्देशन व्यक्ति को अपने परिस्थितियों का यथार्थपरक मूल्यांकन करते हुए अपनी सकारात्मक भूमिका सुनिश्चित करने में सहयोग करता है। व्यक्तिगत निर्देशन के माध्यम से व्यक्ति को समायोजनात्मक प्रक्रिया के घटकों को प्रभावित करने की दिशा में सहयोग प्रदान किया जाता है।
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