पर्याप्त नकदी कोषों के लाभ - Advantages of Adequate Cash Funds

पर्याप्त नकदी कोषों के लाभ - Advantages of Adequate Cash Funds


पर्याप्त नकदी का रखना प्रत्येक व्यवसाय में आवश्यक है अन्यथा इसके बिना आपत्ति का आना अवश्यम्भावी है। यद्यपि चालू दायित्वों का भुगतान फर्म की चल सम्पत्तियों द्वारा उत्पन्न धन में से किया जाता हैं परन्तु तब भी कार्यशील पूंजी का अनुपात चालू दायित्वों से पर्याप्त सुरक्षात्मक रूप में बना रहे ताकि कभी उसकी कमी न पड़ने पाये। चाहे किसी भी ओर से कार्यशील पूंजी की आवश्यकता उत्पन्न हो, वह व्यावसायिक संस्था जो पर्याप्त कोष रखती है, अपने भविष्य की उन्नति का मार्ग बन सकती है। कुछ विशेष कारण एवं लाभ जिनके कारण पर्याप्त धन कोषों की आवश्यकता प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को पड़ती है और जिनका लाभ वे उठाती है निम्न प्रकार से है। इनमें से अधिकांश आवश्यकतायें नकदी की ही होती है-


(1) प्राविधिक अकुशलता की क्षतिपूर्ति (Compensation to Technical Efficiency) पर्याप्त कार्यशील पूंजी की आवश्यकता का प्रमुख कारण फर्म की प्राविधिक अकुशलता की क्षतिपूर्ति करना है।

किसी भी व्यापार की साख क्षमता एवं संचालन शक्ति बनाये रखने और उत्पादन तन्त्र को चालू रखने के लिये यह आवश्यक है कि कच्चे माल का मूल्य चुकाने, श्रमिको को समय पर भृत्ति देने, बिक्री लागतों एवं प्रबन्धकीय व्ययों को चुकाने के लिए पर्याप्त धन फर्म के पास हो


(2) साख का बने रहना (Maintenance of Goodwill) कच्चे माल के प्रदाता को त्वरित भुगतान न केवल माल की सतत प्रदाय की गारंटी करता है अपितु व्यापार को आवश्यकता पड़ने पर भविष्य में अधिक साख सुविधायें एवं सामयिक क्रियाओं के सफल संचालन की संभावना में भी तैयार करता है। एक नितांत व्यावहारिक दृष्टिकोण से, किसी भी संस्था की साख इस बात पर निर्भर करती है कि वह व्यावसायिक संस्था कितनी जल्दी एवं क्षमतापूर्वक भुगतान करती है।


(3) नकद कटौती की प्राप्ति (Cash Discount) – एक आवश्यक कार्यशील पूंजी रखने वाली संस्था को नकद कटौती का लाभ भी मिलता है जो उसकी उत्पादन क्षमता एवं लाभों में वृद्धि करता है। साधारणत: व्यवसायी लोग "2 / 10 net 30 शब्दावली प्रयोग करते है। इसका तात्पर्य यह है कि रूपये का भुगतान सुपुर्दगी की तिथि से 30 दिन के अन्दर होना है। परन्तु यदि क्रेता उस भुगतान को सुपुर्दगी के 10 दिन के अन्दर ही कर देता है तो वह बीजक में से अपने आप ही 2 प्रतिशत कटौती काट लेने का अधिकारी है। इस प्रकार से एक क्रेता परिपक्वता दिवस के 20 दिन पहले भुगतान कर देने पर 2 प्रतिशत नकद कटौती पाने का अधिकारी है।


(4) बैंकों से सदसम्बन्धों की स्थापना (Good Bank Relations) – यदि कोई व्यावसायिक संस्था प्रारंभ से ही पर्याप्त पूजी के साथ प्रारम्भ की जाती है और कालान्तर में पर्याप्त साख एवं व्यावसायिक कीर्ति अर्जित करती है

तो ऐसी संस्था से सम्बन्ध बनाने तथा बनाये रखने को बैंक भी उत्सुक रहते हैं। ऐसी संस्थाओं को बैंकों से मौसमी ऋण (Seasonal loans) आवश्यकतानुकूल उचित ब्याज दर पर मिलते हैं। किसी भी संस्था को बैंक ऋण प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि उसकी आर्थिक स्थिति तरल एवं सुदृढ़ हो ।


(5) आपत्तियों का सफल समाधान (Safety during bad days) - आपत्तिकाल में ऐसी संस्थायें बड़ी सरलतापूर्वक अपने अस्तित्व को बचा लेती है। नकद कोष उनकी सुरक्षा का काम करते हैं।


(6) व्यावसायिक अवसरों का उपयोग (Utilisation of Business opportunities) तेजी के समय अथवा समृद्धिकाल में अपने विस्तार करने तथा अधिकाधिक लाभार्जन करने के लिये ऐसी संस्था इन अवसरों का लाभ उठा सकती है।


(7) नये विनियोगों को प्रोत्साहन ( Motivation for New Investments) जब एक व्यक्ति कम्पनी की प्रतिभूतियों में धन विनियोग करता है तो वह अपनी विनियोजित धनराशि पर समुचित पुरस्कार की लालसा भी रखता है। जब व्यापार में समुचित कार्यशील पूंजी उपलब्ध नहीं है तो लाभों का पुनर्विनियोग करना पड़ेगा। यह स्थिति भविष्य में निगमों के सम्बन्ध में धनराशि का संकलन अत्यन्त कठिन कर देती है। व्यक्ति ऐसे औद्योगिक विनियोजन से विमुख हो जायेंगे क्योंकि वह उन्हें वार्षिक लाभांश उपलब्ध नहीं कराता ।


(8) कार्य क्षमता में वृद्धि एवं स्थायित्व (Increase stability in efficiency) पर्याप्त नकदी या कार्यशील पूंजी उत्पादन क्षमता को गिरने से भी बचाती है। निरन्तर उत्पादन का तात्पर्य है श्रमिक वर्ग को निरन्तर कार्य। इससे उनका नैतिक स्तर ऊँचा उठता है, उनकी कार्य क्षमता बढ़ती है, उत्पादन लागत कम होती है, और समाज में फर्म की साख स्थापित होती है।


इस प्रकार उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को दूरदर्शिता के दृष्टिकोण से पर्याप्त कार्यशील पूंजी रखनी चाहिये। अब प्रश्न उठता है कि वह कितनी हो? इसका सीधा-सादा उत्तर है आवश्यकता के अनुसार एडमण्ड लिंकन के शब्दों में, "जिस प्रकार एक मनुष्य को उतनी ही लम्बी टाँगों की आवश्यकता होती है जिससे कि वह जमीन पर चल सके उसी प्रकार से निगम को कार्यशील पूजी एवं स्थायी पूजी को सुखद अनुपात रखना श्रेयस्कर है।"