लागत सिद्धान्त के लाभ - Advantages of Cost Theory
लागत सिद्धान्त के लाभ - Advantages of Cost Theory
1) व्यावसाय / कंपनी को सामान्यतः नये सिरे से स्थापन करते समय यह सिद्धान्त के अनुसार पूजीकरण के राशी का वास्तविक अनुमान प्रवर्तकों को द्वारा लागत के आधार पर लिए जाता है।
2 ) नयी प्रस्तावित परियोजनाओं की दशा में विभिन्न प्रकार की स्थिर एवं चल सम्पत्तियों की पूंजी लागते उनके मुल्य के पूर्वानुमानों के आधार पर आकलित की जाती है, जिससे विनियोजित राशी की मात्रा ज्ञान कर पूजीकरण राशी का निर्धारण किया जाता है।
3) पूंजीकरण की मात्रा प्रस्तावित व्यावसाय के तुलन-पत्र (Balance Sheet) की परिसम्पत्तियों की ओर ( Assets Side) दिखलायी जाने वाली समस्त मदो की धनराशीयों के जोड़ के बराबर होती है। जिसे इस सिद्धान्त के आधार पर आसानी से ज्ञात / समजा जा सकता है।
4) लागत का सिद्धान्त उन्हें व्यवसायों के लिए उपयुक्त है, जिनमें स्थिर पूँजी की मात्रा अधिक होती है और आय नियमित एवं निरन्तर रूप से होती रहती है। जैसे- सामुहिक जनोपयोगी व्यवसाय
पूँजीकरण का आय सिद्धान्त :- किसी भी व्यावसाय का मुख्य उद्देश्य लाभ प्राप्त करना होता है। किसी भी व्यावसाय के लाभ प्राप्त करणे की क्षमता पर ही उस व्यावसाय का वास्तविक मुल्य अवलंबित रहता है। लाभ प्राप्त करने की क्षमता पर ही व्यावसाय की सफलता अथवा असफलता का निर्धारण होता है। अतः व्यावसाय से इतना लाभ अवश्य प्राप्त होना चाहिए जिसमें से परिचालन व्यय आदि घटाने के बाद इतनी राशि अवश्य रह जाए कि जो ऋणों के व्याज एवं अंशधारियों द्वारा विनियोजित पूँजी पर उचित मात्रा में लाभांश दिया जा सके। पूँजीकरण के कुल राशी का निर्धारण उस व्यवसाय के लाभा प्राप्त करने की क्षमता एवं पूँजीकरण का प्रत्याय दर पर अवलंबित रहता है।
पूंजीकरण का आय का सिद्धान्त यह तकनिकी तौर तर उचित एवं तर्कशुद्ध है, क्योंकी इस सिद्धान्त में व्यवसाय की कुल पूंजीकरण की राशि यह उस व्यवसाय की लाभ प्राप्त करणे की क्षमता से सिधे जोडी जाती है, जिससे वास्तविक पूजीकरण की राशी का निर्धारण किया जाता है। अगर कोई व्यवसाय / कंपनी इस मुख्य उद्देश्य की पुर्तता नहीं करता, तो लागत के आधार पर बिनियोजीत पूँजी के मुल्य का अवमुल्यन हो जायेगा। इसका अर्थ यह हुआ की व्यवसाय / कपनी की आय का उसके पूँजीकरण की मात्रा से निकट का सम्बन्ध है तथा किसी भी व्यवसाय / कंपनी का पूँजीकरण उसकी आय उपर्जित करने की योग्यता के क्षमता पर किया जाता है।
इस सिद्धान्त के अनुसार पूँजीकरण सुनिश्चित करने के लिए आय का अनुमान एवं पूँजीकरण दर का स्पष्ट रूप से अनुमान निकालना आवश्यक होता है।
उदाहरण :- उत्पाद की मांग वस्तु का सामान्य मुल्य, श्रमिकों की उत्पादकता व्यवस्थापन की कार्यकुशलता इत्यादी सभी घटक व्यवसाय / कपनी के नियंत्रण के बाहर होते है। इन घटकों में स्थिती के अनुसार नियमित बदलाव भी होते है तथा पूँजीकरण का प्रत्याय दर यह निवेशकों की अपेक्षा पर एव कंपनी के निर्धारित जोखिम की मात्रा पर अवलम्बीत रहता है। जिससे पूँजीकरण के दर का भी निर्धारण करना कठीण होता है। यह कार्य किसी भी नये व्यवसाय / कंपनी के लिए अशक्य है।
इस तरह लागत के सिद्धान्त के अनुसार पूँजीकरण की राशी निर्धारित करना किसी नई कंपनी / व्यवसाय के लिए लाभदायक है तथा चालू व्यवसाय / कंपनी का पूँजीकरण निर्धारण करने के लिए आय का सिद्धान्त उपयोगी होता है।
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