सीमावर्ती लागत पद्धति के लाभ - Advantages of Marginal Costing
सीमावर्ती लागत पद्धति के लाभ - Advantages of Marginal Costing
(i) यह पद्धति लागत लेखांकन प्रक्रिया को सरल व बोधगम्य बना देती है। स्कन्ध-मूल्यांकन सरल हो जाता है और स्थिर व परिवर्तनशील लागत का अलग-अलग बंटवारा करके तैयार किया गया आय विवरण प्रबन्ध के लिए अधिक बोधगम्य होता है।
(ii) इस पद्धति के अन्तर्गत उत्पादन स्तर में परिवर्तन या स्कन्ध- मात्रा में परिवर्तन का लाभ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। लाभ का सीधे बिक्री से सम्बन्ध होता है। इससे प्रबन्ध को यह सहायता मिलती है कि वह बदलती बिक्री मात्रा की दशा में वास्तविक
(iii) लाभ की मात्रा ज्ञात कर सकता है। यह पद्धति अर्थपूर्ण प्रबन्धकीय रिपोर्टिंग का ठोस आधार प्रदान करती है। इस पद्धति के द्वारा बिक्री पर आधारित सूचनाएं दी जाती हैं, जो क्षमता की सही स्थिति को दर्शाती है। अवशोषण लागत पद्धति में प्रारम्भिक व अन्तिम स्कन्ध के कारण लाभ की सही स्थिति ज्ञात नहीं हो पाती है।
(iv) यह पद्धति लाभ नियोजन (विशेषतः अल्पकालीन) में भी सहायता देती है। लाभ नियोजन के लिए विभिन्न संचालनात्मक परिस्थितियों में लागत व्यवहार का ज्ञान आवश्यक होता है। इस पद्धति में स्थिर व परिवर्तनशील लागत का भेद करते हुए लागत व्यवहार का व्यापक अध्ययन किया जाता है और दत्ताश के निर्धारण के माध्यम से लागत - लाभ - मात्रा सम्बन्ध के अध्ययन द्वारा लाभ नियोजन में सहायता ली जा सकती है।
(v) लाभदायकता मूल्यांकन में भी यह पद्धति यन्त्र के रूप में सेवा करती है जब कभी भी विभिन्न उत्पादों, विभागों या विक्रय क्षेत्रों व माध्यमों की लाभदायकता का तुलनात्मक अध्ययन करना हो, तो यह पद्धति अधिक सहायक बन सकती है। (vi) सीमान्त लागत विवरण से उत्पादन मिश्रण में किये गये परिवर्तन का विक्रय मात्रा पर प्रभाव स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है, जो वैकल्पिक कार्यों के लाभ पर पड़ने वाले प्रभाव के निर्धारण से प्रबन्ध को सुविधा प्रदान करता है। (vii) अनुकूलतम उत्पादन मात्रा व उत्पादन मिश्रण एवं विक्रय-मिश्रण के निर्धारण में यह पद्धति अधिक सहायक होती है।
(viii) लागत नियन्त्रण व लागत में कमी के साधन के रूप में भी इस पद्धति का अधिक योगदान होता है। स्थिर व्यय व परिवर्तनशील व्यय में भेद करके यह पद्धति लचीला बजट बनाने में सहायता पहुंचाती है।
चूंकि यह पद्धति उत्पादन लागत के रूप में केवल परिवर्तनशील लागत को ही मान्यता देती है, इन लागतों के लिए दायित्व निर्धारित करना सरल हो जाता है और उन पर नियन्त्रण भी सरल हो जाता है।
(ix) मूल्य नीति व इसके निर्धारण भी यह पद्धति अधिक योगदान प्रदान करती है। जब कभी भी अनुकूलतम मूल्य न्यूनतम मूल्य राशिपातन मूल्य, आदि के निर्धारण की समस्या हो, तो इस पद्धति द्वारा प्रदत्त सूचनाओं के आधार पर ठोस व सही निर्णय लिये जा सकते हैं।
(x) वह प्रारूप, जिसके अनुसार सीमान्त लागत सूचना प्रस्तुत की जाती है, प्रबन्धकीय विचार व दर्शन के अनुरूप है। यह ऐसी सूचना प्रदान करती है जिसके आधार पर प्रबन्ध संचालन परिणाम को और अच्छी तरह से समझा जा सकता है और नीति-निर्णय ले सकता है।
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