शिक्षा के उद्देश्य - aims of education

शिक्षा के उद्देश्य - aims of education


रूसो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक के आंतरिक अंगों और शक्तियों का स्वाभाविक विकास करना है। शिक्षा के द्वारा बालक को जीवित रहने में सहायता दी जानी चाहिए। जीवित रहने का तात्पर्य सॉस लेने से नहीं है बल्कि काम करने से है, जीवन-कार्य करना, शरीर के बिभिन्न अंगो ज्ञानेन्द्रियों तथा विभिन्न शक्तियों का विकास और उनका उचित प्रयोग करना है। अपनी पुस्तक एमिली में रूसो एमिली को जीवनशैली के व्यवसाय की शिक्षा देना चाहते हैं जिससे कि वह सैनिक पादरी, मजिस्ट्रेट आदि न बनकर सबसे पहले मनुष्य बनेगा। इस प्रकार रूसो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक को सही अर्थों में मनुष्य बनाना है।


किंतु फिर भी शिक्षा के उद्देश्य बालक के विकास की भिन्न-भिन्न स्थितियों के साथ-साथ बदलते जाते हैं, क्योंकि विभिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न बातों पर विशेष जोर देने की आवश्यकता होती है। बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:


शैशवावस्था (Infancy):


यह जन्म से पाँच वर्ष की अवस्था है। इसमें शिक्षा का मुख्य उद्देश्य शारीरिक विकास है। शारीरिक स्वास्थ्य ही चालक के मानसिक स्वास्थ्य का आधार होता है। रूसो का कहना था "समस्त दुष्टता निर्बलता से आती है। बालक को सबल बनाया जाना चाहिए, जिससे कि वह ऐसा नहीं करेगा जो कि बुरा हो।" 


बाल्यावस्था (Childhood):


एमिली में यह 5 से 12 वर्ष तक की अवस्था है। इस अवस्था में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक की जानन्द्रियों का विकास करना है।


किशोरावस्था (Adolescence)


एमिली में यह अवस्था 12 से 15 वर्ष तक मानी गई है।

इस आयु में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य किशो व्यक्ति को नाना प्रकार का उपयोगी और आवश्यक ज्ञान दिया जाना चाहिए, जिससे कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।


युवावस्था (Younghood):


यह काल रूसो ने 15 से 20 वर्ष तक माना है। इसमें शिक्षा का मुख्य उद्देश्य भावनाओं का विकास करना है जैसा कि कसो ने लिखा है, हमने उसके शरीर, उसकी इन्द्रियों और उसकी बुद्धि का निर्माण किया है और उसे एक हृदय देना शेष रह जाता है। इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य बालक के शरीर, इन्द्रियों, बुद्धि और सामाजिक, नैतिक और धार्मिक भावनाओं का विकास है।


शिक्षण विधि (Method of Teaching):


शिक्षण विधि में रूसो प्रत्यक्ष अनुभव को अत्यधिक महत्व देता है।

यही कारण है कि इसका सिद्धान्त है "क्रिया के द्वारा जान की प्राप्ति। रूसों का कहना है कि "विदयार्थियों को कोई मौखिक ज्ञान मत दो। क्रिया के द्वारा शिक्षा दो और जब क्रिया का सहारा एकदम काम नहीं करे तब शब्दों का सहारा लो। पुस्तकीय जान जितना कम हो उतना ही अच्छा है। भाषा शिक्षण में भी प्रत्यक्ष विधि (Direct Method of Teaching) से ही काम लिया जाए। बिजान शिक्षण में भी विद्यालय के बाहर प्राकृतिक क्रियाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान तथा प्रयोगशाला का अनुभव अधिक उपयोगी होता है। भूगोल का शिक्षण विद्यालय के कमरों में ग्लोब तथा मानचित्रों के सहारे नहीं होना चहिए। वह तो यात्राओं एवं वास्तविक निरीक्षण में ही सफल है। इस प्रकार रूसो शिक्षण विधि में शिशु को केन्द्र बिंदु मानते हैपुस्तक अथवा शिक्षक को नहीं। 


पाठ्यक्रम (Curriculum):


रूसो ने अपनी पुस्तक एमिली के लिए एक पाठ्यक्रम का निर्माण किया था। यह पाठ्यक्रम निषेधात्मक शिक्षा पर आधारित है।

रूसो के अनुसार, निषेधात्मक शिक्षा वह है, (1) जो ज्ञानन्द्रियों का प्रत्यक्ष जान देने के पूर्व समर्थ एवं सक्षम कर द तथा (2) जो विचार शक्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करने हेतु ज्ञान वस्तुओं का प्रयोग कराए। निषेधात्मक शिक्षा का सिद्धांत शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में बतलाता है कि बच्चों की गति एवं व्यायाम में स्वतंत्रता हो, भोजन सादा हो, ठीले अल्प तथा हल्के कपड़े हों। बौद्धिक शिक्षा के क्षेत्र में निषेधात्मक शिक्षा का कहना है कि मौखिक पाठ, पुस्तक तथा वास्तविक अध्ययन का सर्वथा अभाव हो । यही पाठ्यक्रम का स्वरूप होगा।


स्त्री शिक्षा (Women Education):


रूसो ने अपनी पुस्तक 'एमिली में स्त्री शिक्षा का वर्णन किया है। ग्रीक दर्शन का अनुकरण करके रूसो ने स्त्री-पुरुष की भिन्न-भिन्न शिक्षा का वर्णन किया है। यदि एमिली की शिक्षा प्रकृति के अनुसार है

तो सोफी की शिक्षा परंपरागत तथा की दवादी। यह बात भी रूसों के परस्पर-विरोधी बातें कहने की परिचायक है।


यह शिक्षा की भिन्नता लिंगभेद के कारण है, न कि निहित योग्यता के अनुसार वह स्त्रियों को आज्ञा मानने तथा पुरुष को विद्रोह करने के लिए उत्पन्न मानते थे। लिखने-पढ़ने की शिक्षा स्त्री को केवल आवश्यकता होने पर ही देनी चाहिए। सिलाई, कढ़ाई, वस्तुओं की परख इत्यादि का ज्ञान देना उसे आवश्यक है। स्त्री को धर्म की शिक्षा देनी चाहिए, जब वह समझने लगे। उसे कम आयु में धार्मिक ज्ञान देना बुरा नहीं किंतु उसे पूर्ण ज्ञान देना चाहिए तथा ऐसा कि वह धर्म से प्रेम करने लगे। स्त्रियाँ भी तत्व ज्ञान तथा तर्कशास्त्र पढ़ सकती हैं, पर बह शीघ्र ही भूल जाती है। परंतु वह नैतिक तथा कलात्मक ज्ञान (Aesthetics) की प्राप्ति में अद्भुत होती है। इनके अतिरिक्त भौतिक विज्ञान की केवल सामान्य रूपरेखा भर उनको याद रह जाती है।