वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्य - Aims of Euducation in Mordern India

वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्य - Aims of Euducation in Mordern India


भारतवर्ष हजारों वर्षों तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। इसलिए न हमारी शिक्षा भारतीय संस्कृति पर ही आधारित रही और न ही हमारी शिक्षा का कोई राष्ट्रीय उद्देश्य रह सका। 15 अगस्त 1947 को हमारे यहां विदेशी नियंत्रण समाप्त हुआ। उसी दिन से भारत एक सर्वसत्ता लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। ध्यान देने की बात है कि जनतंत्र की बागडोर उन नागरिकों के हाथ में होती है. जो आज के स्कूलों में मढ़ रहे हैं। दूसरे शब्दों में जनतंत्र की आत्मा शिक्षा होती है। अतः हमारी जनतंत्रीय सरकार शिक्षाशास्त्रियों, दार्शनिक तथा समाज सुधारकों ने शिक्षा को भारतीय संस्कृति पर आधारित करने तथा नये जनतांत्रिक समाज को सफल बनाने के लिए, शिक्षा के उचित उद्देश्यों के निर्माण की आवश्यकता अनुभव की। अतः भारत सरकार ने (1) विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग. (2) माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा (3) कोठारी आयोग की नियुक्ति की। इन आयोगों ने समाज तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय शिक्षा के निम्नलिखित उद्ययों को निर्धारित किया है


(अ) विश्वविद्यालय आयोग के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य ( 1948-49)


विश्वविद्यालय आयोग ने भारतीय शिक्षा के अग्रलिखित उद्देश्य निर्धारित किये हैं-


(1) विवेक का विस्तार करना।


(2) नये ज्ञान के लिए इच्छा जागृति करना।


13) जीवन का अर्थ समझने के लिए प्रयत्न करना।


(4) व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करना।


(ब) माध्यमिक आयोग के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य ( 1952-53)


माध्यमिक शिक्षा आयोग ने व्यक्ति तथा भारतीय समाज की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये है-


(1) जनतांत्रिक नागरिकता का विकास


भारत एक धर्म निरपेक्ष गणराज्य है। इस देश के जनतंत्र को सफल बनाने के लिए प्रत्येक बालक को सच्चा ईमानदार तथा कर्मठ नागरिक बनाना परम आवश्यक है। अतः शिक्षा का परम उद्देश्यबालक को जनतांत्रिक नागरिकता की शिक्षा देना है। इसके लिए नागरिक के रूप में देश की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं पर स्वतंत्रतापूर्वक चिन्तन और मनन करके अपना निजी निर्णय लेते हुए स्पष्ट विचार व्यक्त कर सके। इनसभी शक्तियों का विकास बौद्धिक विकास के द्वारा किया जा सकता है। बौद्धिक विकास होने से व्यक्ति इस योग्य बन जाता है कि वह सत्य और असत्य तथा वास्तविकता और प्रचार के बीच अन्तर समझते हुए अन्धविश्वासो तथा निरर्थक परम्पराओं का उचित विश्लेषण करके अपने जीवन में आनेवाली विभिन्न समस्याओं के विषय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा इस योग्य बनाया जाये कि वे भाषणों तथा लेखों के द्वारा अपने विचारों से जनता को प्रभावित करके अपनी ओर आकर्षित कर सके।


(2) कुशल जीवन-यापन कला की दीक्षा


शिक्षा का दूसरा उद्देश्य बालक को समाज में रहने अथवा जीवनयापन की कला में दीक्षित करना है।

एकात में रहकर न तो व्यक्ति जीवन-यापन कर सकता है और न ही पूर्णतः विकसित हो सकता है। उसके स्वयं के विकास तथा समाज के कल्याण के लिए यह आवश्यक है कि वह सह अस्तित्व की आवश्यकता को समझते हुए व्यावहारिक अनुभवों द्वारा सहयोग के महत्व का मूल्याकना सीखे। इस दृष्टि में सफल सामुदायिक जीवन व्यतीत करने के लिए बालकों में सहयोग सहनशीलता, सामाजिक चेतना तथा अनुशासन एवं देशभक्ति आदि अनेक सामाजिक गुणों का विकास किया जाना चाहिए जिससे प्रत्येक बालक विविधता भरे समाज का आदर करते हुए एक दूसरे के साथ घुलमिल कर रहना सीख जाये। 


(3) व्यावसायिक कुशलता की उन्नति


शिक्षा का तीसरा उद्देश्य बालकों में व्यावसायिक कुशलता की उन्नति करना है। इसे प्राप्त करने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। अतः बालकों के मन में श्रम के प्रति आदर तथा रुचि उत्पन्न करना एवं हस्तकला के कार्य पर बल देना परम आवश्यक है। यही नहीं, पाठ्यक्रम में विभिन्न व्यवसायों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए, जिससे सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उस व्यवसाय को चुन सकें, जिसे वह शिक्षा समाप्त करने के बादअपनाना चाहता हो। इससे हमें जहां एक और बिभिन्न व्यवसायों के लिए कुशल कारीगर प्राप्त हो सकेंगे वहां दूसरी और औद्योगिक प्रगति के कारण देश की आर्थिक दशा में भी निरन्तर सुधार होता रहेगा।

इस दृष्टि से स्कूलों में व्यावसायिक क्षमता की उन्नति की ओर ध्यान देते हुए बालकों को इस बात का ज्ञान कराना आवश्यक है कि आत्म सन्तुष्टि तथा राष्ट्रीय समृद्धि कार्य कुशलता द्वारा ही सम्भव है।


(4) व्यक्तित्व का विकास


शिक्षा का चौथा उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास करना है। व्यक्ति के विकास का तात्पर्य बालक के बौद्धिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक तथा रचनात्मक शक्तियों के विकास से है। इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को क्रियात्मक तथा रचनात्मक कार्यों को करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। जिससे उनमें साहित्यिक कलात्मक एवं सांस्कृतिक आदि नाना प्रकार की रुचियों का विकास हो। इन विभिन्न रुचियों के विकास से उनकी आत्माभिव्यक्ति सांस्कृतिक तथा सामाजिक सम्पति की वृद्धि अवकाशकाल के सदुपयोग की योग्यता, तथा चहु मुखी विकास में सहायता मिलेगी। अतः बालकों के व्यक्तित्व के विकास हेतु उन्हें रचनात्मक कार्यामे भाग लेने के अवसर मिलने चाहिए।


( 5 ) नेतृत्व के लिए शिक्षा


भारत को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है, जो सभी को आदर्श नेतृत्व प्रदान कर सके। अतः नेतृत्व की शिक्षा प्रदान करना शिक्षा का पांचवा मुख्य उद्देश्य है। इस उद्देश्य के अनुसार हमें बालकों में अनुशासन, सहनशीलता, त्याग आदि सामाजिक भावनाओं की समझदारी तथा नागरिक एवं व्यावहारिक कुशलता आदि गुणों को विकसित करना चाहियजिससे वे बड़े होकर जीवन के विविध क्षेत्रों में अपने उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक निभाते हुए नेतृत्व कर सके


(स) कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा केउद्देश्य ( 1964)


कोठारी कमीशन ने भारतीय शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये है।


(1) उत्पादन में वृद्धि


भारत में जनसंख्या की वृद्धि के साथ- साथ उत्पादन नहीं बढ़ रहा है।

हम देखते है की हमारे देश में खाद्य सामग्री, वस्त्र, दबाइयां तथा कल पुर्जे आदि आवश्यक वस्तुओं की अभी भी कमी है। इन सबके लिए हमें दूसरे देशों का मुंह देखना पड़ता है। हमें चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ा इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमें कृषि तथा तकनीकी शिक्षा पर बल देने के साथ- साथ माध्यमिक शिक्षा को भी व्यावसायिक रूप देना होगा। इस संबंध में आयोग ने ऐसे सुझाव भी दिये हैं जिनसे उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।


(2) सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास


राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए राष्ट्रीय एकता आवश्यक है। इस एकता के न होने से सभी नागरिक राष्ट्रहित की परवाह न करते हुए अपने निजी हितों को पूरा करने में ही व्यस्त हो जाते हैं

इससे राष्ट्र निर्बल तथा प्रभावहीन हो जाता है। एकता की इस भावना का विकास करने में शिक्षा का विशेष योगदान है। अतः शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास होना चाहिए। आयोग एक शैक्षिक कार्यक्रम की रुपरेखा प्रस्तुत की है जिसके द्वारा इस उद्देश्य को सफलतापूर्वक पाया जा सकता है।


(3) जनतंत्र को सुदृढ़ बनाना


जनतंत्र को सफल बनाने के लिए शिक्षा परम आवश्यक है। अतः जनतंत्र को सुदृढ़ बनाना शिक्षा का तीसरा उद्देश्य से इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से करनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जनतंत्र के आदर्शों और मूल्यों को प्राप्त कर सके आयोग ने शिक्षा के द्वारा जनतंत्र को सुदृढ़ बनाने तथा राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने के लिए कुछ ठोस सुझाव दिये हैं जो अत्यंत उपयोगी है।


( 4 ) देश का आधुनिकीकरण


शिक्षा का चौथा उद्देश्य है- देश का आधुनिकीकरण करना प्रगतिशीलदेशों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान में विकास होने के कारण दिन प्रतिदिन नये-नये अनुसन्धान हो रहे हैं। इनके परिणामस्वरूप प्राचीन परम्पराओं, मान्यताओं तथा दृष्टिकोण में परिवर्तन आ रहे हैं। इन परिवर्तनों के कारण नये समाज का निर्माण हो रहा है। खेद का विषय है कि भारतीय समाज में अभी तक वही परम्पराये मान्यताएँ तथा दृष्टिकोण प्रचलित है जिन्हें प्राचीन युग में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता था यदि भारत को अब उन्नतिशील राष्ट्रों के साथ- साथ चलना है तो वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान का विकास करके औद्योगिक क्षेत्र में उन्नति करते हुए अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं, मान्यताओं एवं दृष्टिकोण में समयानुकूल परिवर्तन लाते हुए देश का आधुनिकीकरण करना होगा चूंकि ये सभी बातें शिक्षा के ही द्वारा संभव है, इसलिए हमें शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए जिससे यह उद्देश्य सफलतापूर्वक प्राप्त हो सके| 


(5) सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना


शिक्षा का पाचवा उद्देश्य है सामाजिक, नैतिक तथाअध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना देश का आधुनिकीकरण करने के लिए कुशल व्यक्तियों का होना आवश्यक है। अतः हमको पाठ्यक्रम में विज्ञान तथा तकनीकी विषयों के अतिरिक्त चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों के विकास पर ध्यान देना होगा। अतः आयोग ने सुझाब दिया है कि पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों के साथ साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होते रहे और प्रत्येक नागरिक सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सके इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भी आयोग ने अनेक सुझाव प्रस्तुत किये हैं।