वैकल्पिक विकास की रूपरेखा - Alternative Development Framework

वैकल्पिक विकास की रूपरेखा - Alternative Development Framework


लैंगिक विभेद के बारे में सामान्य जान की आवश्यकता प्रत्येक स्त्री को है। यह ज्ञान ही उसे अपने अधिकारों की पहचान और समाज में अपनी यर्थाथ स्थिति से वाकिफ़ कराने में मददगार साबित हो सकता है। स्त्रियाँ लैंगिक विभेद, घरेलू अत्याचार, मानसिक शोषण और अत्याचार, श्रम की दमनकारी एवं भेदभावपूर्ण नीतियों को समझें साथ ही प्रजनन एवं स्वाथ्य से संबंधित समस्याओं पर भी जानकारियों पर भी जानकारियों का आदान-प्रदान करें तभी भविष्य के विकासवादी कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की जा सकती है।


स्त्रियों के प्रति मानसिं हिंसा या आग्रामकता एक ऐसा मुद्दा है। जिसका पालन जितने शातिर ढंग से किया जाता है। उतना ही स्त्रियों को अविकसित रखने या विकास के कार्यक्रमों से दमर रखने में सफलता पाई जा सकती है। इस प्रक्रिया में सम्य एवं अतिसम्य कहे जाने वाले समाज शामिल हैं। महिला संगठन 'हेल्प' से बंबद्ध सुधा अरोड़ाका कहना है कि “महिलाएं सलाहकार केंद्रों में सहायता के लिए तभी आती हैं, जब मानसिक प्रताडूना एक लंबे अरसे के बाद अंततः गाली-गलौच या शारिरिक हिंसा में धीरे-धीरे तब्दील होने लगती है।

घरेलू हिंसा से त्रस्त महिला को रास्ता सुझाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है, मानसिक यातना झेल रही महिलाओं को समझाना, क्योंकि इस स्थिति में पुरुष बहुत समझदार शालीन दिखता है। इस के अंदर बैठे हुए उस व्यथ्कत से साक्षात्कार हो ही नहीं पाता. जिसे वह महिला घर में झेल रही है, जो लगातार उसे बौना बना रहा है और उसके व्यक्तित्व को कुचलकर उसे व्यक्तित्व हीन बना देना चाह रहा है.... आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रताड़ना की स्थिति में कोई बदलाव ला पाने में कारगर नहीं होती, पर इससे जीवन में निर्णय लेने और उन्हें कार्यान्वित करने की क्षमता ज़रूर बढ़ जाती है। बहुत से समीकरण इस आर्थिक आज़ादी के चनते बदल जाते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम होने का एक औरत को जो लाभ मिलता है, वह यही है कि गैर बराबरी और मानसिक यातना से पैदा होती भीषण स्थितियों से जूझना उसके लिए थोड़ा आसान हो जाता है... आर्थिक आज़ादी के बूते पर आत्मनिर्भर स्त्रीके लिए हिंसा या पति के इतर संबंधों से उपजी जटिल स्थितियों के भीषण स्वरूप की तीव्रता कुछ कम हो जाती है और वह अपने जीवन के नक्शे की फिर से उपने सामने फैलाकर सुनियोजित कर सकती है और मानसिक गुलामी से बाहर आना, उसके लिए अपेक्षाकृत आसान होता है। उसके सामने चुनावकी सुविधाएँ और जीने के विकल्प अधिक होते हैं" (आम औरत: जिंदा सवाल- सुधा अरोड़ा, पृ. 163-164, सामयिक प्रकाशन) स्त्रियों को उत्तराधिकार और संपत्ति संबंधी कानूनों की समुचित जानकारी आवश्यक है। भारत में हिंदू उत्तराधिकार, (संशोधन) विधेयक-2004 में लैंगिक विभेद को मिटाने का प्रयास किया गया है, जिसमें


निम्ननिखित मुद्दे प्रमुख हैं


(क) संयुक्त परिवार की संपत्तििा में पुत्र एवं पुत्री का बराबर का हिस्सा मिलेगा। (ख) स्त्रियाँ अपनी सुविधानुसार पैतृक संपत्ति में बंटवारे की माँग कर सकती हैं। (ग) वे संयुक्त परिवार की कर्ता की हैसियत से रह सकती हैं।


स्त्रियों को घरेलू हिंसा से सुरक्षा देने के लिए प्रोटक्शन ऑफ वूमेन म्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005' का प्रावधान भी किया गया हहै, जो अक्टूबर 2006 से प्रचलन में है। इसके सेक्शन 17 में विवाहित स्त्री पति के, साझे के घर में रहने की अधिकारिणी है, भले ही घर उसका कोई कानूनी मालिकाना हक नहो । इस कानून के कारण किसी भी स्त्री को जबरन घर से बाहर नहीं निकाला जा सकता।


इसी कानून के सेक्शन 18 के अंतर्गत स्त्री को तमाम सुरक्षा आदेश मिले हैं, वहीं उसी के तहत प्रतिवादी को अनेक मनाहियाँ भी हैं, जिनमें घरेलू हिंसा करने या हिंसा के लिए उकसाना या पत्नी के कार्यालय स्थल पर आने-जाने या पत्नी के बैंक अकाउंट या लॉकर का इस्तेमाल कानूनन जुर्म है।


सेक्शन- 19 के अंतर्गत पत्नी को आवाससे संबंधित आदेश मिले हैं, जिसमें प्रतिवादी (पति) को ज़रूरत पड़ने पर पत्नी के लिए वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने या उसका किराया देने का आदेश है। इसके साथ ही स्त्री को अपना स्त्रीधन' माँगने का अधिकारा है। सेक्शन-20 के अंतर्गत अपनी तथा बच्चों की देखभाल के लिए स्त्री पति से भत्ता मांग सकती है। सेक्शन- 21 में स्त्री तलाक के बाद अपनी संतान की कस्टडी का अधिकार मांग सकती है। सेक्शन-22 के अंतर्गत स्त्री मानसिक प्रताड़ना और भावात्मक तनाव के लिए क्षतिपूर्ति की माँग कर सकती है। इसके अतिरिक्त नेशनल कमीशन फॉर वुमेन्स एक्ट 1990 में भी स्त्री को अधिकार संपन्न किया गया है।


इसके अतिरिक्त कृषि एवं सार्वजनिक श्रम क्षेत्रों से संबंद्ध स्त्रियोंको मिलने वाले विशेषाधिकारों और सुविधाओं से वाकिफ होनाचाहिए। उदाहरण के लिए सिंचाई के दिए जाने वाले सरकारी ऋण में स्त्रियों को 90 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। इसके अतिरिक्त अधिकांश बैंक ऋण की विशेष सुविधाएं देते हैं। जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन बैंक ने महिला उद्यमियों के लिए विशिष्ट योजनाएँ जैसे- स्त्री शक्ति योजना चलाई हुई है। द स्माल इंडस्ट्रीज़ डेवलेपमेंट बैंक ऑफ इंडिया ने स्त्री उद्यामियों को प्रोत्साहित करने के लिए महिला उद्यम निधि स्कीम' चलाई है। आंध्र बैंककी 'चक्रयोजना' स्त्रियों को दुपहिया वाहन खरीदने में अर्थिक मदद करती है।