वैकल्पिक विकास - मनोवेज्ञानिक आधार - Alternative Development - Psychological Basis

वैकल्पिक विकास - मनोवेज्ञानिक आधार - Alternative Development - Psychological Basis


स्त्री के समुचित विकास को मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी विश्लेषित करके योजनाबद्ध ढंग से उसके विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए जिनमें से सबसे प्रमुख है


(1) उर्जा का पुनर्विस्तार स्त्रियों को सवयं का मने विज्ञान भली-भाँति समझाना चाहिए तथा गति और सृजन के लिए अपनी उर्जा का उपयोग करन चाहिए । इस कार्य में शिक्षण संस्थाएं, एन.जी.ओ. तथा मनोविश्लेषक स्त्रियों की सहायता कर सकते हैं। राज्य का कल्याणकारी स्वरूप स्त्रियों के भीतर की उर्जा के मूल स्रोत को पहचान कर उसके आक्रामक रूप को रचनात्मकता में तब्दील करने में मददगार साबित हो सकता है।


(2) स्त्रियों की दृष्टि में परिवर्तन यह परिवर्तन सकारात्मक दृष्टिकोण का दिशानिर्देशक हो सकता है, जब स्त्रियाँ इतरलिंगियों को शोषक और दब्रेग व्यक्त्विों के रूप में न देखें और न स्वयं शोषित हों और ने शोषण करें। स्त्रियां स्वयं को कामल, सौम्य, प्रभाविष्णु लोगों के बीच संवाद के लायक बनाएँ।


(3) स्त्रियों को मानसिक गुलामी से मुक्ति पानी होगी, तभी वे सव्रसत्तावान प्रशासक की आत्मवंचना का अनुमोदन करने से स्वयं को रोक पाएंगी।


(4) स्त्रियों को आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास करना चाहिए और विशिष्ट निर्भरताओं और उनमाद ग्रस्त व्यवहारों से बचना चाहिए।


(5) स्त्रियों को अपनी जिम्मेदारी स्वयं लना आना चाहिए। अपनी खुद की नैतिक समझदारी का त्याग, परनिर्भरता, मानवता के विरूद्ध अपराधों को झेलना अपने निर्णयों को दूसरों पर छोड़ देना, गैरजिम्मेदारी के लक्षण हैं।


(6) स्त्रियों को एक सार्वभौमिक भगिनी भाव से आपस में संबंद्ध होकर छदम मित्र का वेश धरे शत्रुओं को पहचानना आना चाहिए। सत्ताधारी, मतांध, स्त्री का उपयोग करने वाल उसे उपभोग की 'वस्तु' मात्र समझने वाले लोगों के निहित स्वार्थों को स्पष्ट समझना जरूरी है। यह तभी संभव है जब वह निरंतर शिक्षा और संवाद की दिशा में ग्रसर हो ।


(7) स्त्री को अपने हितों के पज्ञ में अपने भी छीतर जड़े जमाए बैठे पितृसत्ताक पुरुष वर्चस्ववादी मानसिक अनुकूलन से संघर्ष करना चाहिए, लेकिन यह संघर्ष आनंदप्रद होना चाहिए, तभी उसकी सही उपयोगिता है। संघर्ष का आनंद आमोद-प्रमोद और सुखवाद में नहीं बल्कि उद्देश्य, उपलब्धि और सम्मान की भावना में है। यही उपलब्धि का संतोष उसके विकास के मार्ग को प्रशस्त करेगा इस मार्ग में स्त्रियों से गलतियाँ भी होगी, लेकिन उन गलतियों का सुधार कर अपनी उर्जा को सकारात्मक दिशा देना भी संघर्ष का ही एक रूप है।


(8) स्त्री को अपनी मुक्ति का रवाक़ा स्वयं तैयार करना होगा। उससे एक ऐसी प्रति तैयार करने की अपेक्षा की जाती है जो उसकी अपनी स्वतंत्रता और मौलिकता को प्रतिबिंबित करे वह जितनी शिक्षित ओर समझदार होगी, उतना ही वह दूसरों के अनुभवों से सीख लेकर विकास के मार्ग में बाधक, मानसिक शारीरिक, भौतिक, सामाजिक, राजनैतिक दमन के रूपों को ठीक ढंग से समझ ओर विश्लेषित कर पाएंगी।


(9) स्त्रीयों का अवसादग्रस्त, हीनता-ग्रंथि से संत्रस्त होना अर्थतंत्र पर पुरुष वर्चस्व के पक्ष में जाता है। निरंतर संवाद और अपने श्रम की सही मूल्यवत्ता को पहचानना, अपने श्रम कह उचित कीमत न पाने पर श्रम के बाजारीकरण से खुद को अलग कर के, वैकल्पिक रास्तों की खोज का संघर्ष ओर अपनी वास्तविका कार्यक्षमता ओर उपयोगिता से समाज और पूंजीपितयों को परिचित कराने के लिए सही रणनीति और आत्मविश्वास स्त्री के पक्ष में है।


(10) स्त्रियों में सदियों से भर दिए गए दासभाव के कारण अक्सर वैज्ञानिक और तार्किक क्षमताएं कम होती हैं, क्योंकि वे अपी उर्जा को जिज्ञासा शांत करने में न लगाकर अनुशासन बनए रखने जैसे अर्थहीन अध्यवसा यों में नष्ट कर देती है।

जर्मेन ग्रीयर का कहना है कि “विश्वविद्यालय तक पहुँचने वाली मुट्ठी भर लड़कियाँ भी अक्सर बिना उसका असली उद्देश्य जाने स्कूल की अपनी अध्यापिकाओं के मार्गदर्शन और दबाव की प्रगतिक्रिया में वहाँ पहुँची होती हैं। अब भी उनकी रुचि अपनी क्षमताओं को विकसित करने में नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा अंकों और अध्यापन के सिंड्रेला पेशे में जा पाने लायक अर्हता जुटाने की आशा ही रिती हैं। इस प्रतिमान का पालन करके पाया गया संतोष बहुत सीमित होता है। इसलिए यह देखकर हमें आश्ख्य नहीं होता कि कई स्त्रियाँ अपने व्यावसायिक जीवन को भी वक्त गुज़ारने के साधन को विवाह के लिए एक अप्रत्यक्ष अर्हताकेरूप में देखती हैं।" (बधिया स्त्री; जर्मेन ग्रीयर, अनु. मधु बी. जोशी, पू. 65, राजकमल प्रकाशन द्वितीय सं. 2005 )


(11) समाज में उत्पादक कार्यों में स्त्रियों की दोयम दर्जे की भूमिका के पीछे मनोसामाजिक कारणों को देखा जाना चाहिए। जूलिएट मिशेल ने विमेन-द लांगेस्ट रिवॉल्यूशन में इसे विस्तार से व्याख्यायित किया है।


औद्योगिकीकरण में उतपादन कार्य में स्त्रियों को दास और सस्ते श्रम के रूप में देखा जाता है उसे स्त्री प्रजनन की उत्पादन है' ऐसा समझा दिया जाता है। संतान को केवल स्त्री की ज़िम्मेदारी से जोड़कर देखने के कारण भी स्त्री की भूमिका दोयम दर्जे की मानली जाती है।


(12) विकास में स्त्री की भूमिका को पुनर्प्रारिभाषित करना जरूरी है और इसके लिए कुछ बड़े परिवर्तन लाए जाने अनिवार्य हैं। उत्पादन, प्रजनन, लैंगिकता और विकास के ढाँचे की पुनर्रचना ज़रूरी है। 


(13) स्त्रियों से यह अपेक्षा क जाती है कि वे पुरुषों के साथ अपने संबंधों की पुनर्रचना करें। घर के भीतर के असमानतावादी संबंधों से ही सब प्रकार की बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। समाज के सार्वभौमिक विकास के लिए स्त्रियों को अपनी मानसिक गुलामी की प्रवृत्ति से मुक्त होने का प्रयास करना ज़रूरी है। से


(14) स्त्रियों को अपने अनुभव आपस में बाँटने चाहिए। वर्चस्ववादी राजनीति को समझना और बयान करना जाना चाहिए, ताकि नका प्रसार व्यापक तौर पर किया ज सके।


(15) कैरॅल थामस ने अश्वेत स्त्रियों के घोषणा पत्र टुवर्ड्सए विमेन्स लिबरेशन मूक्मेन्ट' में ऐसे समुदायों के मानसिक प्रारूप तैयार करने पर बल दिया, जिनमें स्त्रियाँ अपने बोझों से मुक्त होकर मानवता को अनुभव करने का अंतराल पा सकें। 


(16) भविष्य के विकास के कार्यक्रमों के लिए यह ज़रूरी है कि स्त्रियाँ अपना इजिहास जानें। यह कार्य तभी संभव है, जब स्त्री साहित्य (स्त्रियों द्वारा लिखा गया साहित्य) और स्त्रीवादी साहित्य कि स्त्रियों और पुरुषों द्वारा (स्त्रियों के बारे में लिखा गया बड़े पैमाने पर लिखा जाए और बाज़ार में वह सस्ते दामों में उपलब्ध हो।


(17) समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर टिके रहना और मानसिक यप से उसके लिए संघर्ष के लिए प्रस्तुत रहना स्त्रियों के विकास के लिए ज़रूरी है।


(18) स्त्रियों को श्रम-कानूनों गर्भपात, मातृत्व, विवाह, अत्तराधिकार संबंधी कानूनों का ज्ञान अच्छी तरह होता चाहिए, तभी वे विकास की प्रक्रिया में अपने कर्तव्यों ओर अधिकारों को समझ पा सकती हैं।


(19) स्त्री विकास के में गतिरोधक तत्वों को रेखांकित करते हुए बीवर्ली जोन्स ओर तूडिथ ब्राउन ने टुवर्ड ए फीमेल लिबरेशन मूवमेंट में कहा- “हम एक विजित जाति हैं। हमें एक स्त्री-आंदोलन विकसित करने की ज़रूरत है। इसकी बहुत ही जरूरत इसलिए है, क्योंकि हमें इस सामाजिक व्यवस्था से अपनी तमाम क्षमता के साथ लड़ना है। और हमें मुक्त होना चाहिए, ताकि हम अपने अलग-अलग घरेलू नैराश्य से, आधा की हर किरण के मरने के खिलाफ सामाजिक क्षोभ व्यक्त करने की ओर जा सकें।


(20) स्त्री के विकास और मुक्ति का संबंध अन्योन्याश्रित है। विवाहित स्त्री के लिए आवश्यक है कि वह अने स्वास्थ्य पर ध्यान दे। उसे खरीदारी की अपनी आदतों, रोज़मर्रा के पलायनों और बेईमानियों, अपनी पीड़ाओं, अपने बच्चों के प्रति अपनी वास्तविक भावनाओं, अपनेभूत और भविष्य का विश्लेषण करना चाहिए। संक्षेप में, उसे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर लक्ष्यों की पहचान करना आना चाहिए।


(21) भूमंडलीकृत समाज मे स्त्रियाँ संचार साधनों का उपयोग अपनी ममुक्ति के पक्ष में कर सकती हैं। अनुकूलन से उपजी आवश्यकताओं को समझना और उसका विकल्प खोजने का काम स्त्रियों को ही करना होगा। परंपरागत रूप से स्त्रियों की ज़ुबान ही उनके लिए हथियार रही है, पहले की तरह ही आज भी स्त्रियों को शरीर आकर्षण की रणनीति अपनाने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि ऐसी रणनीतियों को अपनाना गुलामी है। वस्तुतः गुलामी का अपना आनंद है, जो अनुकूलन से पैदा होता है, उस आनंद के पाश से निकलकर स्त्री को स्वतंत्रता के खतरे उठाने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए।