संविलनयन संबंधी भुगतान की विधियाँ - amalgamation payment methods

संविलनयन संबंधी भुगतान की विधियाँ - amalgamation payment methods


कंपनियों में संविलयन संबंधी भुगतान के लिये मुख्यतया निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती है-


1. नकद भुगतान द्वारा


2. ऋण पत्रों द्वारा


3. समता अंशों द्वारा


4. परिवर्तनीय ऋण पत्रों द्वारा


इनका वर्णन अग्रलिखित है-


1. नकद भुगतान द्वारा (Cash Payment) प्राय: कंपनियाँ संविलयन के लिये नकद भुगतान करती हैं। परंतु इस प्रकार का भुगतान अंशधारियों के हित में नहीं होता क्योंकि उनके अंशों की संख्या पूर्ववत ही रहती है।


ऐसे अंशधारी, जिनकी कंपनी को बेचा जा रहा है, की इस प्रकार के भुगतान से यह लाभ होता है कि वे पूँजी लाभ पर कर देने से बच जाता है।


क्रेता कंपनी की दृष्टि से देखा जाये तो नकद भुगतान करने से राशि घट जाती है या उसका प्रबंध करना पड़ता है। इसके कार्यशील पूँजी पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।


2. ऋणपत्रों द्व (Payment by Deventures) - इस प्रकार से ऋणपत्रों द्वारा भुगतान करने पर, विक्रेता कंपनी के अंशधारियों के अंशों के स्थान पर ऋणपत्र दिये जाते हैं जिन पर ब्याज स्थिर दर से ही दिया जाता है। यह अंशधारियों के लिये हितकर तभी होता है जब ब्याज की दर मिलने वाले लाभांश के दर से अधिक हो यह उनके लिये लाभप्रद हो भी सकता है और नहीं भी।


क्रेता कंपनी के अंशधारियों की दृष्टि से यह अपेक्षाकृत अधिक लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। क्योंकि दंतिकरण (gearing) के फलस्वरूप उनको प्राप्त लाभांश की दर में वृद्धि हो सकती है।


3. समता अंशों द्वारा भुगतान ( Payment by Equity Shares) इस प्रकार से भुगतान की पद्धति अधिक प्रचलित है।

इसके अंतर्गत क्रेता कंपनी विक्रेता कंपनी के अंशों के बदले अपने अंशों के द्वारा भुगतान करती है।


इस प्रकार अंशों द्वारा भुगतान से विक्रेता कंपनी अंशधारियों के लिये अधिक लाभप्रद होने की संभावना रहती है। यह इस बात पर निर्भर करती है कि भुगतान की शर्तें क्या है। दुसरी और, क्रेता कंपनी के लिये, यह इसलिये लाभप्रद है कि इससे कंपनी की तरलता (liquidity) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।


4. परिवर्तनीय ऋणपत्रों द्वारा भुगतान (Payment by Convertible Debentures) यह विधि भी काफी प्रचलित है। इस विधि के अंतर्गत विक्रेता कंपनी क्रेता कंपनी के अंशधारियों को परिवर्तनीयः ऋणपत्र देकर भुगतान करती है से इन ऋणपत्रों को बाद में अंशें में परिवर्तित करना होता है।


विक्रेता कंपनी के अंशधारियों की दृष्टि से यह लाभप्रद हो भी सकता है और नहीं भी। यह इस बात पर निर्भर होता है कि भविष्य में अंशों के मूल्य में कितनी वृद्धियां या कमी होती है। यदि उनके मूल्य में वृद्धि होती है तो बाद में अंश लेना ही उचित होगा, अन्यथा उनके हित में नहीं रहेगा कि वे ऋणपत्रों को ही अपने पास रखें।