अम्बेडकर के आर्थिक विचार - Ambedkar's Economic Thoughts
अम्बेडकर के आर्थिक विचार - Ambedkar's Economic Thoughts
1. धन का वितरण- उन्होंने कहा था कि धन का न्याय पूर्ण वितरण अधिक जरूरी है। धन के वितरण का उद्देश्य भी मानव सुख है। सामाजिक उपभोग का स्तर ठीक है। सकता है जब उत्पादन के लाभों का बंटवारा उत्पादन के साधनों के अनुकूल हो । यदि धन का वितरण उत्पादन के साधनों के अनुरूप है, तो सामाजिक उपभोग के स्तर, को स्वयं बढ़ने की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।
2. उत्पादन के साधनों के अधिकार - आर्थिक सहायता, असमानता, उत्पादन के साधनों के वितरण से प्रभावित होती है। उत्पादन की परम्परागत प्रणालियां ही आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं। कृषि और उद्योग के क्षेत्र में तकनीकी जड़ताएं और वितरण की असमानताएं आर्थिक असमानता को उत्पन्न करती हैं।
लघु आकार के उत्पादन संयंत्र और संस्थान उत्पादन का विस्फोट नहीं कर पाते हैं। मूलतः ऐसे उत्पादन साधन केवल प्रकृति की दया पर निर्भर करते हैं। अनिश्चय और संशय के वातावरण में विकास संदिग्ध हो जाता है। जब तक उत्पादन प्रणाली को प्रकृति की निर्भरता से दूर कर यंत्रीकृत स्वरूप पर आधारित नहीं किया जाता तब तक उत्पादन की विपुलता और त्वरित प्राप्त नहीं हो सकती है। धन के समान वितरण के लिए उत्पादन के साधनों की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए। उत्पादन के साधनों पर सामाजिक अधिकार बढ़ते जाते हैं, तो उत्पादन के विस्फोट का लाभ भी सामाजिक क्षेत्र में बढ़ता जाता है। यही कारण है कि अम्बेडकर ने समाजवाद की अनुशंसा की। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत उपक्रम क्षमता के विरूद्ध थे। वे इन्हें जीवित रखना चाहते थे जो व्यक्तिगत लाभों को राष्ट्र को समर्पित करते हैं। व्यक्तिगत क्षमता, दक्षता और ज्ञान भी राष्ट्र की ही धरोहर माना जाना चाहिए।
उत्पादन के साधनों के क्षेत्र में उन्होंने अवसरों की समानता को आवश्य क माना है।
यदि सभी साधनों को अपनी भागीदारी निभाने का पूरा अवसर नही दिया जाता है तो लाभ का विकेन्द्रीकरण ही नहीं होगा। हमारी परम्परागत आर्थिक संस्थाएं अवसरों की समानताओं को समाप्त करती हैं इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने व्यापार, उद्योग, कृषि एवं सेवा क्षेत्रों में विद्यमान साहूकारी प्रणाली, जमींदारी प्रथा, हुण्डी प्रणाली, जातिगत आधार पर उद्योग आदि में सुधार को आवश्यक माना। आर्थिक समानता के लिए यह जरूरी है कि बड़ी-बड़ी संयुक्त पूंजी कम्पनियां स्थापित हों, भूमि का समान वितरण हो, भूमि सुधार कानूनों से भूमिहीनों को भूमि दी जाए। अम्बेडकर का सुझाव था कि देश में विद्यमान लाखों एकड़ जमीन बंजर पड़ी है उसका आवंटन प्राथमिकता से छोटी, पिछड़ी एवं अछूत जातियों को किया जाना चाहिए।
वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक थे, किन्तु चाहते थे कि समता की स्थापना की लक्ष्यपूर्ति के लिए उत्तराधिकार के नियमों में संशोधन किए जाएं, जिससे धन के वितरण को न्यायपूर्ण रूप से प्रोत्साहित किया जा सके। अर्थात उत्तराधिकार को वे कहीं सीमित करना चाहते थे।
बड़ी जमींदारियां जो वंशगत चल रही हैं उनके वास्तविक हक हकदारों को मिल जाना चाहिए। उत्तराधिकार के इन नियमों से न केवल असमान वितरण होता है अपितु स्वतंत्रता में भी बाधा उपस्थित होती है। कुछ शक्तिशाली लोग अधिकारों का केन्द्रीयकरण कर शेष लोगों की स्वतंत्रता प्रतिबंधित कर देते हैं।
अम्बेडकर ने समाज की संरचना का अध्ययन व अवलोकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि यदि असमानता और अन्याय की पोषक जाति व्यवस्था तथा अस्पृश्यता को समाप्त करना है तो उनके औचित्य को सिद्ध करने वाले हिन्दू धर्म शास्त्रों की सार्वभौमिकता को नष्ट कर हिन्दू धर्म की तदनुसार, पुनः व्याख्या करना अनिवार्य है। उन्होंने इस संदर्भ में न केवल हिन्दू धर्म की कमजोरियों पर तार्किक प्रहार •किए, अपितु धर्म के वास्तविक स्वरूप व विशेषताओं की सामाजिक संदर्भ में विवेचना की | हिन्दू धर्म की दुर्बलता की ओर संकेत करते हुए, वास्तविक धर्म के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि ‘वह धर्म जो अपने दो अनुयायियों में भेदभाव उत्पन्न करता हो, वह धर्म जो अपने अनुयायियों को कुत्तों तथा बिल्लियों से बदतर मानता हो, वस्तुतः वह धर्म नहीं है। उपर्युक्त बातों को धर्म का नाम नहीं दिया जा सकता।
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