अरस्तू - ARISTOLE

अरस्तू - ARISTOLE


परिचय:


अरस्तू का जन्म मैं सेडोनिया के नगर स्टेजीरा में हुआ था। उनके पिता यूनानी थे किंतु जीविकोपार्जन हेतु मैसोडोनिया में जाकर बस गये थे तथा वह राजा फिलिप के चिकित्सक थे। अरस्तू को प्रारंभ में ही अन्य शिक्षा के साथ डाक्टरी की शिक्षा भी मिली। अरस्तू 17 वर्ष की अबस्था में एथेन्स पहुंच कर प्लेटो की लेडमी में शिक्षा प्राप्त करने लगे। वहाँ पर उन्होंने 20 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की। अरस्तू प्लेटो के सर्वाधिक मेधावी शिष्य थे। प्लेटो अपने शिष्य अरस्तू को एकेडमी का मस्तिष्क और सर्वोत्तम पाठक कहा करते थे। अरस्तू गुभक्त तो थे किंतु उनका अपना मौलिक चिंतन भी था। वह विद्याव्यसनी थे। उस समय मुद्रण-कला का आविष्कार नहीं हुआ था अतः अरस्तू को जब भी कोई हस्तलिखित लेख मिल जाता तो वह उसे खरीद लेते थे और उसके आधार पर खोज करने लगते थे। 


प्लेटो की मृत्यु के बाद एकेडमी के लिए आचार्य की नियुक्ति का प्रश्न उठा। अरस्तू सर्वाधिक योग्य थे किंतु उन्हें एथेन्स में विदेशी समझा जाता था। अतः प्लेटो के भतीजे स्प्यूसिप्पस को एकडमी का आचार्य नियुक्त किया गया। इस घटना से अरस्तू के हृदय को ठेस लगी और वह एथेन्स छोड़कर अपने पुराने सहपाठी हरमियस के पास लघुएशिया चले गए। वहाँ उन्होंने रमियस की भतीजी के साथ शादी कर ली। कुछ समय पश्चात मैसेडोनिया नरेश फिलिप ने अपने पुत्र सिकंदर को पढ़ाने के लिए अरस्तु को निमंत्रण भेजा। अरस्तू ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और अपनी जन्मभूमि पर फिर पहुंच गए। अरस्तु ने सिकंदर को 4 वर्ष तक पढ़ाया। अध्यापक और छात्र के रूप में अरस्तू तथा सिंकदर का यह संबंध महत्वपूर्ण एवं प्रभावी ऐतिहासिक संयोग था।

अरस्तुकी शिक्षा में सिक्टर बहुत प्रभावित हुआ अरस्तू ने सिक्टर को सद्गुणों की शिक्षा दी और इस तरह सिकंदर के जीवन पर अरस्तू की शिक्षा का बहुत प्रभाव पड़ा।


जब सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा तो अरस्तू 334 ई. पू. में एथेन्स वापस लौट गए। वहाँ उन्होंने एथेन्स के उपनगर अपोलो में अपना एक विद्यालय स्थापित किया, जिसका नाम लिसियम रखा। वह इस विद्यालय के संस्थापक आचार्य थे। एथेन्स के सामान्य नागरिक अरस्तू को विदेशी समझते थे। अतः वे उससे शत्रुता रखते थे। सिकंदर की मृत्यु के पश्चात एथेन्स में अपने विरुद्ध वातावरण को समझ कर अरस्तू ने अपने कुछ शिष्यों के साथ एथेन्स छोड़ दिया। एथेन्स छोड़ने के पश्चात् 322 ई. पू. में अरस्तू का निधन हो गया।