अरस्तू का शिक्षा दर्शन , शिक्षा का उद्देश्य - Aristotle's philosophy of education, the aim of education

अरस्तू का शिक्षा दर्शन , शिक्षा का उद्देश्य - Aristotle's philosophy of education, the aim of education


अरस्तू ने मानव जीवन में राजनीति के महत्व को स्वीकार किया था। उनके अनुसार शिक्षा और नैतिकता राजनीति के ही अंग है। अरस्तू ने राज्य को शिक्षा के लिए उत्तरदायी ठहराया है। अरस्तू की दृष्टि में समाज और राज्य पृथक् न होकर एक ही है। उनके अनुसार शिक्षा एक कला है। इस कला का संबंध व्यावहारिक एवं सामाजिक जीवन से है।


शिक्षा का उद्देश्य (Aim of Education)


अरस्तू के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य आनंद की प्राप्ति है और इसी आनंद को प्राप्त करने के लिए ही सभी व्यक्ति प्रयत्न करते हैं। अरस्तू ने मन के बौद्धिक व क्रियात्मक पक्षों में भेद को देखा। उन्होंने मन का विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सद्गुण का संबंध मन के बौद्धिक पक्ष से इतना नहीं है

जितना कि संकल्प (क्रियात्मक) शक्ति से है। संकल्प मनोदशा के रूप में न होकर क्रियात्मक होता है, अतः अच्छाई भी किया से संबंधित है। शिक्षा द्वारा अच्छाई का विकास करना है ताकि व्यक्ति मुखी हो सके। अरस्तू का मानना है कि राज्य का कर्तव्य है कि वह ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करे जिससे नागरिकों को अच्छाई का अभ्यास करने का अवसर प्राप्त हो सके। 


पाठ्यक्रम (Curriculum):


अरस्तू ने पाठ्यक्रम का निर्धारण करते समय सर्वप्रथम उस समय के प्रचलित पाठ्यक्रम का विश्लेषण किया। उन्होंने देखा कि उस समय का पाठ्यक्रम बड़ा अनिश्चित था। उस समय के पाठ्यक्रम को चार भागों में बाँटा जा सकता था (1) पढ़ना (2) लिखना (3) व्यायाम (4) संगीत तथा चित्रकला। अरस्तू ने इन सभी विषयों को अच्छा बताया। पर उन्होंने इन विषयों के उद्देश्य तथा इनके क्षेत्र को स्पष्ट किया। उनके अनुसार पढ़ने-लिखने की शिक्षा व्यावहारिक उपयोगिता के आधार पर होनी चाहिए। दैनिक जीवन में पढ़ने-लिखने की आवश्यकता है, अतः लिखना पढ़ना जरूरी है। कसरत को उन्होंने शरीर के लिए ही आवश्यक बताया है। उन्होंने कहा कि व्यायाम आत्मा की उन्नति के लिए भी होना चाहिए। संगीत की शिक्षा केवल गाने-बजाने के लिए नहीं है बल्कि संगीत से संवेगों का परिष्कार एवं विकास किया जाना चाहिए। चित्रकला को भी उन्होंने आत्मा के उन्नयन के लिए आवश्यक बताया है।