अरस्तू का दर्शन - Aristotle's Philosophy
अरस्तू का दर्शन - Aristotle's Philosophy
अरस्तू तत्वज्ञान को विज्ञान पर आधारित करना चाहते थे। उन्होंने भौतिक संसार के आभास को नहीं माना तथा उनकी समझ में जगत की यथार्थ सत्ता थी। अरस्तू ने प्लेटो की आलोचना करते हुए कहा था कि मैं प्लेटो के प्रति श्रद्धारखता हूँ किंतु सत्य के प्रति उससे भी अधिक श्रद्धावान हूँ। अरस्तू ने बिज्ञान पर कई लेख लिखे हैं, किंतु उनका महत्व अब ऐतिहासिक ही है।
तत्वज्ञान के क्षेत्र में प्लेटो ने एक तो इसे प्रयासों का शाश्वत संसार माना और दूसरा विशेष पदार्थो का अनित्य जगत अरस्तू ने भी विशेष और सामान्य का अंतर देखा किंतु सामान्य को उन्होंने पदार्थों के सार के रूप में देखा। प्लेटो के तत्व ज्ञान का प्रत्यय विशेष पदार्थों से अलग था, अरस्तू का सामान्य तत्व पदार्थ के अंदर ही मौजूद था। इन दोनों अशों को अरस्तू ने सामग्री और आकृति कहा था। भौतिक पदार्थ, सामग्री और आकृति का संयोग है।
दर्शन के इतिहास में यदि प्लेटो से पूर्व के भौतिकशस्त्रियों में या एक विशेष रूप में प्लेटो में नहीं तो कम से कम अरस्तू में तो यथार्थवादी बिचारधारा पायी ही जातीहै। जिस सीमा तक प्लेटो सार्वभौमिक विचारों को असीमित मस्तिष्क से स्वतंत्र मानते थे उसी सीमा तक इस विशेष अवस्था में वह यथार्थवादी दर्शन का मार्ग तैयार करने वाले माने जा सकते हैं, लेकिन इस संभावित अपवाद के होते हुए भी प्लेटो आदर्शवादी दार्शनिकता के जन्मदाता माने जाते हैं।
यद्यपि अरस्तु, प्लेटो के 20 वर्ष तक शिष्य रहे तथा उनसे काफी प्रभावित हुए थे। तथापि अरस्तू के दर्शन में प्लेटो के विचारों की प्रतिक्रिया के रूप में बहुत कुछ विद्यमान है। प्लेटो ने सामान्य के पक्ष में बिचर किया था जबकि अरस्तू ने विशेष में अभिरुचि ली थी। प्लेटो विचारों में विश्वास करते थे जबकि अरस्तू को वस्तुओं ने आकृष्ट किया था। प्लेटो ने आदर्श में विश्वास किया परंतु अरस्तू ने वर्तमान बास्तविकताओं को परखा। प्लेटो ने वर्तमान समय में विभिन्न विज्ञानों के सम्पूर्ण ज्ञान को एक क्रम में रखा जबकि अरस्तू ने विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया और बर्तमान समय के विभिन्न विज्ञानों के आश्चर्यजनक भेदों का पता लगाया। उसी प्रकार अपनी भौतिकी ' नामक पुस्तक में अरस्तू कहा है कि प्रकृति ही दार्शनिक विचारों का प्रारंभिक बिंदु है तथा इसको अपनेमहत्व को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
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