पिछड़े बच्चों के लिए परामर्श की व्यवस्था - Arrangement of counseling for backward children

पिछड़े बच्चों के लिए परामर्श की व्यवस्था - Arrangement of counseling for backward children


पिछड़े बच्चे वे होते हैं जो अपनी आयु के अन्य बच्चों की तुलना में अत्यधिक शैक्षिक दुर्बलता प्रदर्शित करते हैं। ऐसे बच्चों की रूचि एवं ध्यान थोड़े समय तक ही बनी रहती है तथा इनके सीखने की गति मंद होती है। पिछड़े बच्चों के पिछड़ेपन के विभिन्न कारण हो सकते हैं यथा शारीरिक, मानसिक, वातावरण सम्बन्धी तथा सामाजिक निम्नलिखित प्रबंध पिछड़े बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं


क. व्यक्तिगत ध्यान पिछड़े बच्चों की ओर विशेष एवं व्यक्तिगत ध्यान दिए जाने की आवश्यकता होती है क्योंकि ये बच्चे सामान्य बच्चों से बहुत पीछे रह जाते हैं और अध्यापक द्वारा दिया गया सामूहिक मार्गदर्शन समझ नहीं पाते हैं।


ख. पाठ्यसहगामी क्रियाओं की व्यवस्था- पिछड़े बच्चे शैक्षिक उपलब्धि में पिछड़े होने के बावजूद अन्य क्षेत्रों में काफी सफल हो सकते हैं। इसलिए इनके लिए विद्यालय में विभिन्न पाठ्यसहगामी क्रियाओं की व्यवस्था की जानी आवश्यक है ताकि पिछड़े बच्चे अपनी रूचि के अनुकूल अन्य योग्यताओं का विकास कर सके ।


ग. विशिष्ट पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियाँ- पिछड़े बच्चों के शिक्षण के लिए सामान्य पाठ्यक्रम तथा सामान्य शिक्षण विधि प्रभावी नहीं होती है।

इनके लिए विशिष्ट पाठ्यक्रम तथा विशिष्ट शिक्षण विधियाँ जिनमें व्यावहारिकता की प्रधानता हो, प्रयोग की जानी चाहिएँ तथा विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त किये जाने चाहिएँ। इनके लिए ऐसी शिक्षण विधियों का उपयोग किया जाये जिनमें सीखने की गति धीमी हो तथा जहाँ अभ्यास पर बल दिया जाता हो।


घ. हस्त उद्योग की शिक्षा- पिछड़े बच्चे शैक्षणिक स्तर पर पीछे रह जाते हैं। इस कारण वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते हैं। अतएव उन्हें हस्त उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इससे उनमें आत्मविश्वास उत्पन्न होगा तथा विद्यालय की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे किसी व्यवसाय को शुरू करके अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।