नारी के प्रति दृष्टिकोण - Attitude towards women
नारी के प्रति दृष्टिकोण - Attitude towards women
अम्बेडकर नारी को पुरूषों के समान मानते थे। उनका उदार दृष्टिकोण था। उन्होंने कहा कि नारी-वर्ग का सुधार ही समाज सुधार है और अन्ततः राष्ट्र का सुधार है। इसलिए उन्होंने अपने सम्मेलनों, सभाओं में भाषण उपदेश देकर नारी वर्ग को जागृत करने का प्रयास किया। अम्बेडकर का मानना था कि नारी को पुरूषों के समान ही सभी क्षेत्रों में अधिकार मिलने चाहिए। उनको पुरूषों के समान स्वतंत्रता और सम्मान प्राप्त होने चाहिए। उन्होंने नारी-दास्य का उन्मूलन करने का प्रयत्न किया, जिससे यह सिद्ध होता है अम्बेडकर नारी उद्धारकर्ता थे। परम्पराओं के परिणामस्वरूप महिला पुरूषों के हाथों का खिलौना बनी, वह पुरूष की वासना तृप्ति का साधन रही। इसलिए सदैव पुरूष महिला के स्वतंत्रता में बाधक रहा है। उनका मानना था कि विश्वत के सभी देशों में पुरूषों ने स्त्रियों को अपनी सेवा और भोग विलास की वस्तु बनाया है। उसे भोजन बनाने और बच्चे पैदा करने की मशीन बनाकर उसे सारे मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया।
उनके विचारों हिन्दू संस्कृति में नारी को अपनी अंध दासता में इस कदर जकड़ लिया कि पुरुष की आज्ञा का उल्लंघन करने की शक्ति उनमें नहीं थी। नारी को धर्म ने बताया कि पति के चरणों में तुम्हारा स्वर्ग है, तुम्हारा पति ही तुम्हारा ईश्वर है। तुम उसके लिए अपनी जीवन समर्पण कर दो और पति के न रहने पर तुम्हारे लिए उत्तम है कि तुम भी उसके साथ उसके शव को गोद में रखकर चिता में जल जाओ।
अम्बेडकर स्त्रियों की स्वतंत्र भूमिका पर प्रतिबंध के विरोधी थे। उन्होंने हिन्दू समाज में सम्पत्ति के उत्तराधिकार, निःसंतान होने पर किसी पुत्र या पुत्री के गोद लेने पर पुनः विवाह आदि के संदर्भ में स्त्रियों के साथ भेदभाव करने का विरोध किया। वे स्त्रियों को सभी लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करना चाहते थे। उनका मत था कि नारी को नारी होने के कारण अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। अम्बेडकर ने मनुस्मृति के विधान का विरोध कर मनुस्मृति की होली जलाई। उन्होंने हिन्दू एक्ट बनाकर मनुस्मृति के विधान को निरर्थक सिद्ध किया ।
मनुस्मृति के अनुसार नारी की स्वतंत्र सत्ता या स्वतंत्र स्थिति नहीं है और उसे ज्ञान तथा धन प्राप्ति का अधिकार नहीं है और वह धर्म कार्य करने के योगय नहीं है। यहां तक की उत्तरदायित्व का बोझ उस पर लादा गया। महिला को जन्म से मृत्यु तक पुरूष की सुरक्षा और अधीनता में रहने की अनिवार्य स्थिति बनाई गई। महिला की बाल्यकाल में पिता, युवाकाल में पति, वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है। इस स्थिति में कहीं पर भी नारी को स्वतंत्रता का अधिकार नहीं मिला। सामाजिक और धार्मिक पर्वों पर उसे पुरूषों की तुलना में गौण स्थान दिया गया। अम्बेडकर ने महिला की स्थिति सुधारने के लिए हिन्दू कोड बिल तैयार कर हिन्दू समाज में क्रांति ला दी। अम्बेडकर ने महिला को पति और पिता की सम्पत्ति में हिस्सा दिलाया। बालिग नारी की सहमति के बिना विवाह नहीं हो सकता। वह अपनी सहमति से किसी भी वर्ग एवं जाति के पुरूष के साथ विवाह कर लेती है तो वह विवाह वैध माना जाएगा। पति के अत्याचारों से बचने के लिए विवाह संबंध विच्छेद करने का भी अधिकार होगा। प्राचीन काल में अनेक पत्नियां रखने की परम्परा थी। अम्बेडकर ने भारत में एक पत्नी रखने का कानून स्थापित किया। उन्होंने भारतीय संविधान में नारी मुक्ति के लिए अनुच्छेद 15 (1) द्वारा लिंग के आधार पर किए जाने वाले भेद को समाप्त किया। नारी को पुरूष के समान सारे राजनीतिक अधिकार प्रदान किए गए। अनुच्छेद 14 द्वारा नारी को पुरूष के समान बराबरी का दर्जा दिलाया और एक समान कार्य के लिए समान वेतन दिलाने की व्यवस्था की। अम्बेडकर नारी शिक्षा के हिमायती थे। उनका कहना था कि स्त्रियों की प्रगति जितनी मात्रा में हुई होगी, उसके आधार पर मैं उस समाज की प्रगति नापता हूँ। भारत का पतन और अवनति का एक प्रमुख कारण नारी अशिक्षा रहा है। नारी को पुरूष के समान शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।'
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