आर्थिक चिट्ठा बनाम लाभ-हानि खाता - Balance Sheet Vs. Profit and Loss Account

आर्थिक चिट्ठा बनाम लाभ-हानि खाता - Balance Sheet Vs. Profit and Loss Account


आर्थिक चिट्ठा को महत्त्वपूर्ण पत्र माना जाता है जिससे स्वामियों, लेनदारों, बैंकरों और सरकार, आदि को महत्वपूर्ण सूचनाएं दी जाती हैं। वर्तमान में लाभ-हानि खाता की उपयोगिता महत्व आर्थिक चिट्ठे की तुलना में अधिक हो गया है। प्रबन्धकीय लेखा - विधि का प्रचलन आशिक रूप में इसी परिवर्तन के कारण बढ़ा है। आर्थिक चिट्ठा को पीछे ढकेलते हुए लाभ हानि खाता को प्राथमिकता प्रदान करने सम्बन्धी वित्तीय विवरणों के प्रयोग में यह परिवर्तन आर्थिक चिट्ठा सम्बन्धी आलोचना हेतु दिये गये कथनों से भी स्पष्ट होता है। अब आर्थिक चिट्ठे को केवल एक ऐतिहासिक प्रपत्र माना जाने लगा है जो सम्पत्तियों के प्राप्य मूल्य (Realisable value) को नहीं दर्शाता है। संस्था के जीवनकाल में प्राप्त की गयी मुद्रा व उसके विनियोग का सारक्षित रूप ही यह प्रस्तुत करता है और किसी भी दशा में संस्था के विद्यमान मूल्य का चित्र नहीं प्रस्तुत करता है।


हालांकि लाभ-हानि खाते के प्रति बढ़ता हुआ महत्व और आर्थिक चिट्ठे को उद्देश्यहीन प्रपत्र के रूप में मानना वास्तविकता से परे बल्कि बनावटी है। जहां तक इस आलोचना का प्रश्न है कि आर्थिक चिट्ठा अवास्तविक है और संस्था की सही वित्तीय स्थिति का कभी भी दिग्दर्शन नहीं कराता है, यह कहा जा सकता है कि आर्थिक चिट्ठा संस्था की वित्तीय स्थिति का चित्रण केवल चालू संस्था ( Going concern) के रूप में ही करता है। हां, यह जरूर है कि चालू संस्था' की यह अवधारणा चिट्ठे को अवास्तविक बना देती है क्योंकि चिट्ठे में दर्शाये गये मूल्य वे मूल्य नहीं होते हैं जो संस्था को विघटित करने पर प्राप्त हो सकते हैं। वस्तुतः ये विभिन्न सम्पत्तियों से सम्बन्धित वे मूल्य है जो संस्था के चालू रहने पर सभी सम्पत्तियों से सम्बन्धित होते हैं और इस प्रकार कुछ सीमा है तक ये मूल्य राय (Opinion) और परम्पराओं (conventions) से प्रभावित होते हैं। परन्तु यह भी सत्य है कि यह अवधारणा (चालू सस्था) लाभ-हानि खाते को भी ठीक उसी प्रकार से प्रभावित करती है जैसे कि आर्थिक चिट्ठे को । लाभ-हानि खाते में बहुत से ऐसे मद होते हैं,

जैसे, प्रारम्भिक व अन्तिम स्कन्ध, स्थायी सम्पत्तियों पर ह्वास, सन्देहात्मक ऋणों के लिए सचय, आदि जिनके मूल्यों को अवास्तविक माना जा सकता है क्योंकि ये भी पूर्णतः व्यक्तिगत निर्णय व राय से प्रभावित होते हैं। इन दोनों प्रकार की अवास्तविकताओं में केवल एक अन्तर यही है कि चिट्ठे की दशा में यह सचयी होती है जबकि लाभ-हानि खाते की दशा में अकेले मात्र होती है। इस प्रकार अवास्तविकता सम्बन्धी आलोचना के आधार पर दोनों में से किसी भी प्रपत्र को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए। हकीकत तो यह है कि लाभ-हानि खाता शुद्ध लाभ या हानि के लिए सभी व्याख्याओं व कारणों सहित चिट्ठे के सहायक प्रपत्र के रूप में माना जाना चाहिए। लेकिन लाभ हानि खाता की यह सहायक स्थिति इस प्रपत्र के महत्व को कम नहीं करती है, वास्तव में इसे चिट्ठे का परिपूरक माना जाना चाहिए।


उक्त अवलोकित निष्कर्ष की पुष्टि उन सूचनाओं से भी होती है,

जो इन प्रपत्रों में निहित होती हैं। आर्थिक चिट्ठा केवल सम्पत्तियों एवं दायित्वों के बारे में ही सूचनाएं प्रदान नहीं करता है बल्कि लाभ व व्यवसाय में उसकी विद्यमानता के रूप में विषय में भी सूचनाएं देता है। सम्पत्तियों एवं दायित्वों में कुल मूल्यों (रकमों) में हुआ शुद्ध परिवर्तन कमाये गये लाभ या उठायी गयी हानि को दर्शाया है। इसके अलावा, लाभ किस रूप में सम्पत्तियों में वृद्धि और / या दायित्वों में कमी लाया है या हानि किस रूप में सम्पत्तियों में कमी और / या दायित्वों में वृद्धि लायी है इनके विषय में पूर्व विवरण चिट्टे से प्राप्त हो सकता है। यह सत्य है कि ये विवरण चिट्ठे में सारांश रूप में होते हैं, व्यापक रूप में नहीं । इतनी महत्वपूर्ण सूचना के बावजूद भी यदि चिट्ठे को विद्यमान मूल्य का चित्र नही कहा जा सकता है, केवल चालू संस्था' की अवधारणा के कारण तो लाभ-हानि खाता को भी व्यवसाय के लाभप्रद संचालन का सही चित्रण नहीं माना जा सकता। लाभ-हानि खाता सही रूप में एक ऐसा प्रपत्र तो हो सकता हैं जो व्यवसाय के संचालन को व्यापक और रूचिकर ढंग से चित्रित करता हैं,

परन्तु केवल इसी तथ्य के आधार पर यह दूसरे प्रपत्र ( अर्थात् चिट्ठा) को लांघ नहीं सकता जिसमें लाभ या हानि के सारांश के साथ-साथ कुछ अन्य सूचनाएं भी दी गयी होती हैं।


इन दोनों प्रपत्रों के सापेक्षित महत्व का विश्लेषण उन पक्षों के दृष्टिकोण से भी किया जा सकता है, जो एक व्यावसायिक संस्था की वित्तीय स्थिति व संचालन परिणाम में रूचि रखते हैं। प्रबन्ध के लिये लाभ-हानि खाते के बढ़ते हुए महत्व के बावजूद भी आर्थिक चिट्ठा अंशधारियों, ऋणपत्रधारियों, बैंकर, लेनदारों आपूर्तिकर्ताओं और यहां तक कि उच्च प्रबन्ध के लिये अब भी महत्वपूर्ण प्रपत्र है। इन पक्षों में से अधिकांश बिना लाभ-हानि खाते के ही संस्था की वित्तीय स्थिति व लाभदायकता के विषय में मूल्यांकन कर सकेंगे, आर्थिक चिट्ठा एक संस्था का वित्तीय स्वास्थ्य, लाभदायक तरलता के सामयिक मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसका तात्पर्य लाभ-हानि खाते की भूमिका को कम करना नहीं है, जो यह व्ययों के नियन्त्रण व संस्था के विभागों की क्षमता के मूल्याकन में अदा करता है। संक्षेप में, आर्थिक चिट्ठा व लाभ-हानि खाता दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण वित्तीय विवरण हैं और सर्वाधिक तौर पर एक-दूसरे के पूरक हैं।