आर्थिक चिट्ठा - Balance Sheet
आर्थिक चिट्ठा - Balance Sheet
साधारण भाषा में, आर्थिक चिट्ठा को एक तुलन-पत्र कहा जा सकता है जिसके अन्तर्गत एक तरफ सम्पत्तियों के मूल्यों और दूसरी तरफ दायित्वों व स्वामी- फण्ड (Owner's fund) के मूल्यों को प्रदर्शित करके सन्तुलन (Equality) लाया जाता है। हॉवर्ड (Howard) और अप्टन (Upton) के अनुसार, “The balance Sheet is a statement which reports the property's value owned by the enterprise and the claims of the creditors and owners against these properties."
आर्थिक चिट्ठा के दोनों पक्षों के योग के सन्तुलन को एक अन्य दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है। वास्तव में एक ही तथ्य के दो भिन्न पहलुओं के प्रदर्शन का परिणाम ही आर्थिक चिट्ठे के दोनों तरफ के योग का सन्तुलन होता है। सम्पत्ति की तरफ उस प्रारूप को दर्शाता है,
जिसमें व्यवसाय के फण्ड के प्रयोग किया गया है और दायित्व की तरफ से यह पता चलता है कि उस फण्ड को प्राप्त करने के लिए किन-किन विधियों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार आर्थिक चिट्ठा एक ऐसा विवरण है, जो एक तरफ उन साधनों पर प्रकाश डालता है जिनसे व्यवसाय में फण्ड का आगमन हुआ है, और दूसरी तरफ, उस फण्ड के प्रयोग के विभिन्न रूपों का चित्रण करता है। इस अर्थ में दोनों तरफ के मध्य स्थिति-सम्बन्ध को समानता (Identity) कह सकते हैं न कि सन्तुलन (Equality) इस दृष्टिकोण को अपनाते हुए आर्थिक चिट्ठा को व्यावसायिक संस्था की वित्तीय स्थिति का विवरण कह सकते हैं ( A Balance Sheet is a snapshot of financial position of a
company at a given date.) (1) शीर्षक (Title) – व्यवहार में आर्थिक चिट्ठे को अनेक नामों से जाना जाता है, जिसका मुख्य कारण लेखाकन पद्धति में एकरूपता का अभाव है। सामान्यतः आर्थिक चिट्ठे के सम्बन्ध में
निम्न शीर्षकों का प्रयोग किया जाता है :
(i) आर्थिक चिट्ठा या सामान्य आर्थिक चिट्ठा । (ii) वित्तीय स्थिति या दशा का विवरण। (iii) सम्पत्तियों एवं दायित्वों का विवरण |
(iv) साधनों एवं दायित्वों का विवरण।
(v) सम्पत्तियों, दायित्वों एवं स्वामी-फण्ड का विवरण, आदि । • जिनमे आर्थिक चिट्ठा शीर्षक का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है। 'आर्थिक चिट्ठा' शीर्षक के प्रयोग का यह मन्तव्य होता है कि इसमें प्रदर्शित अंकों को खातों की बाकियों से लिया गया है। अन्य शीर्षकों के सम्बन्ध में भी यही बात सत्य हो सकती है,
बशर्ते कि उनका प्रयोग बडी संस्थाओं के सन्दर्भ में किया गया हो। छोटी संस्थाओं के सन्दर्भ में, जिनके यहां खाते अपूर्ण व अवैज्ञानिक ढंग से रखे जाते हैं, इन अंकों को कुछ दशाओं में अनुमान के आधार पर भी लिखा जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में आर्थिक चिट्ठा की जगह वित्तीय स्थिति का विवरण शीर्षक का प्रयोग करना चाहिए।
(2) प्रारूप (Form) – परम्परागत आर्थिक चिट्ठे को दो भागों में बाँटा जाता है। दायीं तरफ सम्पत्तियों और बायीं तरफ दायित्वों व स्वामी-फण्ड को दिखाया जाता है। अमरीका में ठीक इसके विपरीत होता है। आर्थिक चिट्ठा' के इस प्रारूप को खाता रूप (Account Type) या “T" आकार वाला चिट्ठा कहते हैं। आर्थिक चिट्ठा का यह प्रारूप भारत में कानून द्वारा भी प्रमाणित किया गया है।
परन्तु हाल ही में कुछ लेखापालक विश्लेषण सुविधा के लिए आर्थिक चिट्ठा को “T" आकार में नहीं बल्कि विवरण रूप में (इसे इकहरा खाता प्रणाली आर्थिक चिट्ठा भी कहते हैं) प्रस्तुत करने पर जोर देते हैं। यद्यपि भारत में इस प्रारूप को कानूनी मान्यता नहीं मिली है, फिर भी केन्द्रीय सरकार की अनुमति लेकर इसे अपनाया जा सकता है। इस प्रारूप के विषय-सूची व प्रदर्शन - विधि के सम्बन्ध में लेखापालकों ने कोई विशेष कदम नहीं उठाये है।
(3) आर्थिक चिट्ठा के आधार रूप भाग ( Basic Divisions of Balance Sheet) - उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया है कि अधिनियम में निर्धारित प्रारूप विश्लेषण के दृष्टिकोण से उपयोगी नहीं है। निर्वचन के दृष्टिकोण से आर्थिक चिट्ठा की मदों को निम्न वर्गीकरण में रख सकते हैं:
सम्पत्तिया दायित्व
(अ) चालू सम्पत्तिया (र) चालू दायित्व
(ब) स्थायी सम्पत्तिया (ल) गैर चालू दायित्व
(स) अमूर्त सम्पत्तियां (व) शुद्ध मूल्य (Net Worth)
(द) अन्य सम्पत्तियां
(य) स्थगित व्यय
(अ) चालू सम्पत्तियां (Current Assets) एक सामान्य व्यावसायिक संस्था में चालू सम्पत्तियां वे सम्पत्तिया होती हैं,
जो व्यवसाय में कार्यशील रूप में प्रयोग की जाती है और जिन्हें अल्पकाल में संचालन के दौरान नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, नकद धन से प्राप्त की गयी वे सम्पत्तिया, जिन्हें पुनः नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है, चालू सम्पत्तिया कहलाती है। साधारणतया यह चक्र (नकद धन-सम्पत्ति - नकद धन) पूरा होने में एक वर्ष से अधिक समय नहीं लगता है। कुछ दशाओं में इससे अधिक समय भी लग सकता है। इस चक्र में चाहे कितना भी समय क्यों न लगे, हमेशा सम्पत्ति के प्रयोग के आधार पर ही चालू सम्पत्तियों के रूप में वर्गीकरण करना चाहिए, न कि समय के आधार पर साधारणतया निम्न को चालू सम्पत्तियों में शामिल किया जाता है
(i) रोकड़ हाथ में व बैंक में
(ii) पुस्तकीय ऋण (Book Debts)
(iii) प्राप्य बिल (Bills Receivable)
(iv) स्कन्ध
(iv) सरकारी प्रतिभूतियों में विनियोग
(vi) अग्रिम भुगतान (Advance Payment )
(ब) स्थायी सम्पत्तियां (Fixed Assets) स्थायी सम्पत्तियों से आशय उन सम्पत्तियों से होता है जिनका क्रय व्यवसाय संचालन में प्रयोग के लिए किया जाता है, न कि पुनर्विक्रय करके नकद धन प्राप्त करने के लिए इस प्रकार की सम्पत्तियों का प्रयोग करके ही आय हेतु उत्पादन या वितरण का कार्य किया जाता है। स्थायी सम्पत्तियों में शामिल होने वाली कुछ प्रमुख सम्पत्तिया निम्न प्रकार हैं :
(i) भूमि
(ii) भवन
(iii) यन्त्र व मशीन
(iv) फर्नीचर व फिक्सचर्स
(स) अमूर्त सम्पत्तियां ( Intangible Assets) ये सम्पत्तियां अमूर्त व अदृश्य होती है। इनको न देखा जा सकता है और न स्पर्श किया जा सकता है।
इस प्रकार की सम्पत्तियों का वास्तविक मूल्य • व्यवसाय की लाभार्जन क्षमता पर निर्भर होता है। इस प्रकार सम्पत्तियों के मूल्यांकन के सम्बन्ध में लेखापालक, वकील और प्रबन्धक मतभेद रखते हैं और विश्लेषक के ऊपर एक भारी बोझ पड़ता है।
अमूर्त सम्पत्तियों में निम्न को शामिल करते हैं:
(i) पेटेण्ट्स तथा ट्रेड मार्क्स (Patents and Trade marks)
(ii) मुद्रण- अधिकार, सूत्र व लाइसेंस (Copyright, Formula and License)
(iii) ख्याति (Goodwill )
(द) अन्य सम्पत्तियां (Other Assets) जिन सम्पत्तियों को उक्त तीनों वर्गों में से किसी में भी शामिल नहीं करते हैं, उन्हें इस वर्ग में शामिल करते हैं। वस्तुतः इस प्रकार की सम्पत्तियों का व्यापार के संचालन में प्रत्यक्ष प्रयोग नहीं किया जाता है, परन्तु इनका मूर्त रूप होता है। अतः संस्था के कुल साधनों का विश्लेषण करते समय इन्हें अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। अन्य सम्पत्तियों में निम्न को शामिल कर सकते हैं-
(i) विनियोग (सरकारी प्रतिभूतियों को छोड़कर)
(ii) गैर-व्यापारिक ऋण (Non-trade Debtors)
(iii) सम्पत्ति - संवर्द्धन, ऋणपत्र शोधन या सायोगिक ऋण - शोधन के लिए अलग रखी गयी रकम।
(य) स्थगित व्यय ( Deferred Expenditure ) चे खर्चे जो बार-बार नहीं किये जाते हैं और जो वर्तमान सचालन से उत्पन्न या उद्रित नहीं होते हैं, स्थगित खर्चे कहलाते हैं। इस प्रकार के खर्चों का लाभ आने वाले वर्षों में भी उठाया जाता है। अतः इन्हें भावी संचालन लाभ का प्रभार माना जाता है। अन्य शब्दों में, इन खर्चों को कई वर्षों में धीरे-धीरे अपलिखित किया जाता है। अपलिखित न किये गये मूल्य को सम्पत्ति के रूप में आर्थिक चिट्ठे में दिखाया जाता है। चूंकि विघटन की दशा में इन खर्चों का मूल्यांकन ( प्राप्य मूल्य) या संचालन पर इनके प्रभाव का मापन एक जटिल कार्य है, इसलिए विश्लेषक इनके सम्बन्ध में बहुत ही उदार नीति अपनाता है।
(र) चालू दायित्व (Current Liabilities) - चालू दायित्वों के अन्तर्गत ऐसे ऋणों एवं भारों को शामिल करते हैं, जो मांग पर या आर्थिक चिट्ठा की तिथि से एक वर्ष के भीतर देय होते हैं। साथ ही, यदि किसी दायित्व का भुगतान चालू फण्ड में से करना पड़ता है, तो उसे भी चालू दायित्व की श्रेणी में रखेंगे। चालू दायित्व के वर्ग में निम्नलिखित को शामिल करते हैं :
(i) व्यापारिक ऋणदाता (Trade Creditors )
(ii) देय बिल (Bills Payables )
(iii) अल्पकालीन जन-निक्षेप ( Short term public deposits )
(iv) अदत्त लाभाश (प्रस्तावित लाभाश नहीं ) (Outstanding Dividend)
(v) अदत्त खर्चे (Outstanding Expenses)
(vi) बैंक अधिविकर्ष (बैंक ऋण नहीं ) ( Bank Overdraft)
(vii) सहायक कम्पनी को देय रकम
(viii) देय कर या कर के लिए प्रावधान
(ix ) दीर्घकालीन ऋण जो चालू वर्ष में देय हो
(ल) गैर-चालू दायित्व (Non-current Liabilities) इन्हें कभी-कभी दीर्घकालीन ऋण या दायित्व भी कहते हैं। अन्य शब्दों में, वे दायित्व जिनका भुगतान दीर्घकाल में (साधारणतया एक वर्ष के बाद) करना होता है, गैर- चालू दायित्व के रूप में माने जाते हैं। इस प्रकार के दायित्वो के उदाहरण निम्न हैं:
(i) बन्धक पर ऋण ( Loan on Mortgage )
(ii) ऋणपत्र या बॉण्ड्स (Debentures or Bonds)
(iii) दीर्घकालीन बैंक ऋण
(iv) वित्तीय संस्थाओं से ऋण (व) शुद्ध मूल्य (Net Worth) इसे कभी-कभी शुद्ध सम्पत्ति (Net Assets), अंशधारियों का फण्ड (Shareholders Fund) या स्वामियों का इक्विटी (Owners' Equity) भी कहते हैं।
सामान्यतया कुल सम्पत्तियों में से ऋणों एवं दायित्वों (अल्पकालीन व दीर्घकालीन दोनों) को घटाने पर जो शेष बचता है, उसे शुद्ध मूल्य या अंशधारियों का फण्ड कहते हैं। चूंकि कम्पनी संगठन स्वरूप के प्रयोग में अनेक प्रकार की जटिलताएं व विभिन्नताएं पायी जाती हैं, अतः कम्पनी की शुद्ध सम्पत्ति या शुद्ध मूल्य को आर्थिक चिट्ठे में दिखाने की विधि में एकरूपता का अभाव पाया जाता है। कुछ कम्पनियों के आर्थिक चिट्ठों में इसे स्पष्ट रूप से नहीं दिखाया गया होता है तथा कुछ के आर्थिक चिट्ठों में कुल सम्पत्तियों में से कुल दायित्वों को घटाकर शेष शुद्ध मूल्य के रूप में दिखाया गया होता है। इस विभिन्नता के बावजूद भी एक विश्लेषक इस मद का विश्लेषण करते समय निम्न को ध्यान में रख सकता है :
(i) अधिमान अंश- पूंजी
(ii) सम-अश पूजी
(iii) सामान्य संचिति
(iv) पूंजीगत संचिति
(v) अन्य संचिति या अवितरित लाभ जिन्हें अंशधारी लाभांश के रूप में पाने का अधिकार रखते हो।
विश्लेषण में प्रयुक्त व आर्थिक चिट्ठा के भाग पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण शब्द (Some Important Terms Used in the Analysis and Based on Divisions of Balance Sheet)
(अ) तरल सम्पत्तियां - तरल सम्पत्तियों से आशय उन सम्पत्तियों से होता है, जिन्हें इच्छानुसार अथवा आवश्यकता पड़ने पर तत्काल नकद धन में बिना किसी पूंजीगत हानि के परिवर्तित किया जा सकता है। यह परिवर्तन विक्रय या विनिमय के रूप में हो सकता है। जैसा कि पूर्व में बताया गया है, सभी चालू सम्पत्तियां व्यवसाय के सामान्य संचालन अवधि में नकद धन में परिवर्तित की जा सकती हैं। चालू सम्पत्तियों में से स्कन्ध को छोड़कर शेष सभी को जब चाहे तब बिना किसी पूंजी-हानि के नकद धन में परिवर्तित कर सकते हैं।
स्कन्ध को इच्छानुसार जब चाहे तब परिवर्तित नहीं कर सकते और यदि ऐसा करने का प्रयत्न किया जाता है, तो वह इस प्रकार की जबरदस्ती (Forced) बिक्री होगी जिसका कीमत पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है और बिक्री पर हानि की सम्भावना भी बनी रहती है। इस प्रकार स्कन्ध को छोड़कर शेष सभी चल सम्पत्तियों में तरलता का तत्व विद्यमान होता है और इसलिए इन्हें तरल सम्पत्ति' कहते हैं।
सूत्र के रूप में:
तरल सम्पत्तियां = चल सम्पत्तियां स्कन्ध (कच्चा माल, अर्धनिर्मित एवं निर्मित माल)
इसी प्रकार कुछ विद्वानों का मत है कि पूर्वदत्त व्यय को भी तरल सम्पत्ति से अलग रखना चाहिए। वस्तुतः पूर्वदत्त व्ययों से रोकड़ परिवर्तन की सम्भावना नहीं होती है। अतः इन्हें पूर्वदत्त व्ययो को शामिल नहीं किया गया है।
(ब) कार्यशील पूंजी - विश्लेषण के उद्देश्य से यह बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है। इसे कभी-कभी शुद्ध कार्यशील पूंजी भी कहते हैं। लेखांकन दृष्टिकोण से कार्यशील पूंजी चल सम्पत्तियों का चल दायित्व पर आधिक्य को दर्शाता है। चूंकि व्यवसाय में लगायी गयी पूजी स्थायी पूजी और कार्यशील पूंजी दोनों के बराबर होती है, और लगायी गयी पूंजी स्थायी सम्पत्तियों चल सम्पत्तियों - चल दायित्वों के बराबर होती है, अतः कार्यशील पूजी (लगायी गयी पूंजी स्थायी सम्पत्तियों) के बराबर भी होगी। सूत्र के रूप में :
(i) कार्यशील पूंजी = चल सम्पत्तियां चल दायित्व
(ii) कार्यशील पूंजी = लगायी गयी पूंजी स्थायी सम्पत्तियां
(स) लगायी गयी पूंजी ( Capital Employed) लगायी गयी पूजी शब्द का कई अर्थों में प्रयोग किया जाता है और प्रत्येक अर्थ में प्रयोग का उद्देश्य भी भिन्न-भिन्न होता है। इसका विस्तृत वर्णन अध्याय विनियोजित पूंजी पर प्रत्याय में किया गया है। वर्तमान उद्देश्य के लिए इस शब्द का निम्न में से कोई रूप हो सकता है:
(i) कुल पूजी (Total Capital) इसे कुल संसाधन (Total resources) या सकल लगायी गयी पूजी ( Gross Capital Employed ) भी कहते हैं और यह संस्था की कुल सम्पत्तियों (Total Assets) के बराबर होती है।
(ii) लगायी गयी पूंजी ( Capital Employed) - इसे कभी-कभी प्रबन्ध नियन्त्रण व नियोजन के लिए लगायी गयी पूजी' या शुद्ध लगायी गयी पूंजी भी कहते हैं। यह कुल सम्पत्तियों में से चल दायित्वों को घटाने के बाद शेष रकम के बराबर होती है। विकल्प रूप में यह स्थायी सम्पत्तियों एवं
कार्यशील पूंजी के बराबर होती है। सूत्र के रूप में, (a) लगायी गयी पूजी कुल सम्पत्तियां चल दायित्व =
चूंकि कुल सम्पत्तियां स्थायी सम्पत्तियां + चल सम्पत्तियां, अतः
(b) लगायी गयी पूंजी स्थायी सम्पत्तियां चल सम्पत्तियां चल दायित्व
=
चूंकि चल सम्पत्तियां - चल दायित्व बराबर कार्यशील पूंजी के होता है, अतः
(c) लगायी गयी पूंजी स्थायी सम्पत्तियां कार्यशील पूंजी
=
(iii) मालिकों की लगायी गयी शुद्ध पूंजी (Proprietor's Net Capital Employed ) इसे कभी-कभी शुद्ध मूल्य (Net Worth) स्वामी इक्विटी (Owner's Equity) अंशधारियों का फण्ड (Shareholders' Fund) भी कहते हैं। जैसा कि पहले बतलाया गया है, यह कुल सम्पत्तियों में से कुल दायित्वों को घटाने के बाद शेष रकम के बराबर होती है।
(द) औसत स्कन्ध (Average Stock or Inventory ) विभिन्न प्रकार के स्कन्ध जैसे, कच्चे माल का स्कन्ध, चालू कार्य का स्कन्ध तैयार माल का स्कन्ध आदि में पूरे वर्ष के दौरान औसतन विनियोजित रकम को ही औसत स्कन्ध कहते है। सैद्धान्तिक रूप में, इसकी गणना व्यवसाय में रखे गये प्रतिदिन, साप्ताहिक व मासिक स्कन्ध के सन्दर्भ में होनी चाहिए। परन्तु बाह्य विश्लेषक को इतनी सूक्ष्म व व्यापक सूचना नहीं मिल पाती है। इस प्रकार औसत स्कन्ध की गणना प्रारम्भिक स्कन्ध व अन्तिम स्कन्ध के सन्दर्भ में की जाती है। प्रारम्भिक व अन्तिम स्कन्ध के योग को दो से विभाजित करने पर आने वाला भजनफल ही औसत स्कन्ध कहलाता है। यदि प्रारम्भिक स्कन्ध का भी मूल्य ज्ञात नहीं है, तो अन्तिम स्कन्ध को ही औसत स्कन्ध मान लिया जाता है।
सूत्र के रूप में,
औसत स्कन्ध = प्रारम्भिक स्कन्ध + अन्तिम स्कन्ध / 2
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