बैन्डयूरा का सामाजिक अधिगम सिद्धांत - Bandura's Social Learning Theory /Observational Learning

बैन्डयूरा का सामाजिक अधिगम सिद्धांत - Bandura's Social Learning Theory /Observational Learning


बन्डयूरा के सामाजिक अधिगम सिद्धांत को व्यवहार से संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक परिपेक्ष्य की ओर बढ़ती कड़ी के रूप में देखा जाता है। इसे अवलोकनात्मक अधिगम की संज्ञा भी दी जाती है। क्योंकि यहां व्यक्तिदूसरे के व्याहार को देखकर सीखता है। जैसे पहली बार मैट्रो रेल में यात्रा करने वाला व्यक्ति दूसरे को देखकर काउंटर से टोकन या पास खरीदना एवं प्रवेश एवं निकासी के लिए मशीन पर उसका प्रयोग सीखता है। यह एक सामाजिक अधिगम है जो किसी व्यक्तिके वातावरण, संज्ञान एवं समाकलन पर निर्भर करता है। इसमें किसी पुर्नबलन या उद्दीपन की आवश्यकता नहीं होती है। अपितु बच्चे अपने परिवेश में उपस्थित किसी सामाजिक मॉडल जैसे माता-पिता, भाई बहन, दोस्त, अध्यापक, मीडिया, हस्तियों आदि के व्यवहार या गतिविधियों को देखकर बांछनीय तथा अवांछनीय व्यवहार सीखते है। संस्कृति से संबंधित रीति रीबाजों एवं परम्पराओं की जटिलताओं को सीखने में इसका विशेष महत्व है।

बैन्डयूरा पारस्परिक नियतवाद में विश्वास रखते थे। जिसमें पर्यावारण और व्यक्ति दोनो एक दूसरे को प्रभावित करते है बड्यूस के सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत के अनुसार अवलोकनात्मक अधिगम में चार निम्नलिखित चरण होते हैं।


1 ध्यान (Attention) पर्यवेक्षक तब तक नहीं सीखता है जब तक कि वह अपने आस पास की गतिविधियों, वस्तुओं पर ध्यान नही देता है। हालांकि यह प्रक्रिया मॉडल की विशेषताओं पर्यवेक्षक की पसंद नापसंद, उम्मीदों एवं भावनात्मक उत्तेजनाओं पर भी निर्भर करती है।


2 स्मरण / धारण (Retention) :- अवलोकन मात्र से पर्यवेक्षक कुछ नहीं सीखता है। अतः मॉडल के व्यवहार को स्मरण करना तथा प्राप्त जानकारी ज्ञान को सरल संकेतों में मानस पटल पर संग्रह करना भी अतिआवश्यक है।


3 प्रस्तुति / प्रर्दशन (Production):- तीसरे चरण में स्मृतिके आधार पर गतिबिधि व्यवहार को शारीरिक अथवा मानसिक स्तर पर प्रस्तुत करना शामिल होता है। यहां यह आवश्यक नहीं है कि पर्यवेक्षक/ अधिगमकर्ता में गतिविधि को क्रियान्वित करने के सभी कौशल मौजूद हो परन्तु अभ्यास द्वारा यह कुशलता अर्जित की जा सकती है।


4 अभिप्रेरणा (Motivation)- किसी व्यवहार की पुनरावृत्ति या अभ्यस प्रदेशन के उपरांत दी गई प्रेरणा से प्रभावित होती है। यह प्रेरणा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो सकती है। जैसे- प्रर्दशन के पश्चात प्रशंसा या ईनाम व्यवहार को सुदृढ़ करने में बाह्य अभिप्रेरक का कार्य करता है। साथ ही यदि मॉडल को किसी विशिष्ट कार्य / व्यवहार के लिए पुरस्कृत या सम्मानित किया जाता है। तो यह भी उस व्यवहार को सुदृद्ध करता है। इसे अप्रत्यक्ष अभिप्रेरक की संज्ञा दी जाती है। सामाजिक अधिगम सिद्धांत के संदर्भ में बन्हयूरा का बोबो गुडिया (Bobo Doll ) का प्रयोग बहुत चर्चित है।


प्रयोग :


इस प्रयोग में बैन्ड्यूरा ने बच्चों को दो समूह में बाट दिया। उनमें से एक समूह को एक हिंसात्मक चलचित्र दिखाया गया जिसमें मॉडल, अभिनेता बोबो गुडिया को बहुत मारता पीटता है एवं गाली देता है यह समूह प्रयोगात्मक समूह कहलाया। दूसरे समूह को जो चलचित्र दिखाया गया उसमें मॉडल, अभिनेता शांतचित्त था तथा उसने कुछ भी हिंसात्मक नहीं किया। यह नियोजित समूह या तत्पश्चाल दोनो बच्चों के समूह को एक ऐसे कमरे में ले जाया गया जहां कई खिलौनों के साथ बोबो गुडिया भी रखी हुईथी। पहले समूह के बच्चों ने गुडिया को मॉडल की नकल करते हुए ठीक उसी तरह से मारा पीटा जबकि दूसरे समूह ने ऐसा कुछ नहीं किया। इससॉन्डयूरा द्वारा किए गए अवलोकनात्मक अधिगम सिद्धात की पुष्टि होती है। तथा यह निष्कर्ष निकलता है कि बच्चे अपने परिवेश में एक सक्रिय सहभागी के रूप में कार्य करते हुए नए व्याहारों एवं मीडीया धनात्मक एवं ऋणात्मक पक्ष पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है।