आकलन व मूल्यांकन का व्यवहारवादी प्रारूप - Behavioral Format of Assessment and Evaluation
आकलन व मूल्यांकन का व्यवहारवादी प्रारूप - Behavioral Format of Assessment and Evaluation
आकलन व मूल्यांकन का व्यवहारवादी प्रारूप आकलन व मूल्यांकन के तंत्र को व्यवहारवादी अधिगम के परिप्रेक्ष्य में संगठित करता है। आकलन व मूल्यांकन की प्रक्रिया व्यवहारवादी अधिगम के संप्रत्ययों को केंद्र में रखकर विद्यार्थियों के अधिगम उपलब्धि का परीक्षण करती है। यह अधिगम गतिविधि/प्रक्रिया के समाप्त होने पर यह निर्धारित करती है कि विद्यार्थियों की उपलब्धि या निष्पत्ति पूर्व निर्धारित अधिगम उद्देश्यों के अनुरूप हुई है या नहीं तथा यदि हुई है तो किस सीमा तक इन उद्देश्यों की पूर्ति हुई है। यह पूर्व निर्धारित अधिगम उद्देश्यों तथा अधिगम परिणामों को विद्यार्थियों के अधिगम तथा विकास का आधार मानती है न कि अधिगम प्रक्रिया को। यदि विद्यार्थी अधिगम उद्देश्यों की पूर्ति के आकलन के लिए निर्मित प्रश्नों का सटीक यानी शिक्षकों के अनुदेशन या व्याख्या के अनुरूप उत्तर देता है तो विद्यार्थियों के उत्तर सही माने जाते हैं तथा यह समझा जाता है कि विद्यार्थियों ने वांछनीय अधिगम व्यवहार अर्जित कर लिया है।
यहाँ कोई भी आकलन प्रश्न/गतिविधि एक उद्दीपन के रूप में होती है जिसकी एक निश्चित अनुक्रिया होती है एवं जिसके लिए शिक्षक उपयुक्त अनुदेशन या व्याख्या पाठ के दौरान प्रस्तुत कर चुका होता है तथा विद्यार्थी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षक के अनुदेशन के अनुरूप ही अनुक्रिया करे। यदि वह उपयुक्त उत्तर, अनुक्रिया या व्यवहार प्रस्तुत करता है तो यह तय हो जाता है कि विद्यार्थी की अधिगम निष्पति 100 प्रतिशत है।
आकलन व मूल्यांकन के व्यवहारवादी प्रारूप में अधिगम उद्देश्य व्यवहारवादी रूप में लिखे जाते हैं तथा इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपेक्षित परिणाम या व्यवहार तय किए जाते हैं। यदि विद्यार्थी अधिगम गतिविधि के पश्चात् आकलन की प्रक्रिया के दौरान अपेक्षित परिणाम या व्यवहार प्रस्तुत करता है तो यह इस बात का सूचक है कि उसने पाठ या व्यवहार सीख लिया है या अधिगम उद्देश्य की पूर्ति हो गई है।
आकलन व मूल्यांकन की प्रक्रिया परंपरागत उपकरणों एवं युक्तियों मुख्यतः लिखित या मौखिक परीक्षा के रूप में संचालित की जाती है जहाँ प्रश्नों के उत्तर निश्चित होते हैं एवं शिक्षकों द्वारा कक्षा के दौरान दिए गए अनुदेशन पर आधारित होते हैं। विद्यार्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शिक्षकों के व्याख्यान, प्रस्तुतीकरण या उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों को ही संबंधित प्रश्नों के उत्तर के रूप में प्रस्तुत करें। यदि वे ऐसा करने में सफल होते हैं तो उनका अधिगम भी सफल माना जाता है। उन्हें अपेक्षित उत्तरों के लिए सकारात्मक पुनर्बलन सही (V), अंक या टिप्पणी (बिलकुल सही, बहुत अच्छा आदि) के रूप में दिया जाता है। वहीं गलत या आंशिक रूप से सही उत्तर या व्यवहार के लिए नकारात्मक पुनर्बलन दिया जाता है ताकी वे अगली बार अपेक्षित उत्तर या व्यवहार ही प्रस्तुत करें।
आकलन के व्यवहारवादी प्रारूप में आकलन व मूल्यांकन लिखित या मौखिक परीक्षा द्वारा सम्पूर्ण अकादमिक सत्र के दौरान दो से चार बार संचालित की जाती है
जहाँ किसी विषय के सम्पूर्ण पाठ्यक्रम से या कई इकाईयों को मिलाकर प्रश्न पूछे जाते हैं। इन्हीं परीक्षाओं के आधार पर विद्यार्थियों के अधिगम संबंधी रिपोर्ट तैयार किए जाते हैं जिससे यह निर्धारित हो जाता है कि विद्यार्थी ने औसत, औसत से कम या औसत से अधिक उपलब्धि प्राप्त की है। विद्यार्थियों द्वारा विभिन्न विषयों में प्राप्त अंक उनके अधिगम उपलब्धि का सूचक माना जाता है।
व्यवहारवादी आकलन विद्यार्थियों में रटने की प्रवृति तथा परीक्षा के प्रति भय का भाव विकसित करता है तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को अवरोधित करता है। उन्हें अपनी विशिष्ट क्षमता के अनुभव तथा विकास का समुचित अवसर प्राप्त नहीं होता। यह परीक्षा उन्मुखी आकलन व मूल्यांकन की व्यवस्था है जहाँ अंक अर्जित करना ही विद्यार्थियों के अधिगम का द्योतक माना जाता है।
वार्तालाप में शामिल हों