अश्वेत नारीवाद आंदोलन - black feminism movement

अश्वेत नारीवाद आंदोलन - black feminism movement


अश्वेत नारीवाद का अपना एक अलग इतिहास रहा है, जिनमें अश्वेत स्त्रियों के जीवनानुभव से जुड़े अनेक मुद्दे शामिल हैं। अश्वेत नारीवादी आंदोलन को बेहतर रूप से जानने और समझने के लिए इसे दो चरणों में बाँट कर देखा जा सकता है


• पहले चरण के तहत हम उन्मूलनवादी आंदोलनों को रख सकते हैं।


• द्वितीय चरण के तहत हम नागरिक अधिकार आंदोलनों को रख सकते हैं।


उन्मूलनवादी आंदोलन के तहत अश्वेत स्त्रियों से जुड़े हुए विभिन्न पूर्वाग्रहों, मिथकीय चेतनाओं और दास अथवा सेवक के रूप में उन पर होने संस्थागत (दास प्रथा) शोषण के उन्मूलन की बात की गई है। दास प्रथा के अंतर्गत अश्वेत व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) केवल दास के रूप में ही कार्य कर सकता था। अमेरीका में अश्वेत स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रहों और मिथकों के तहत अफ्रीकी अमेरीका स्त्रियों की 'चरित्रहीन' एवं सेवा करने वाली आया' तथा 'समलैंगिक' वाली रूढ़ ( स्टीरियोटाइप) छवि गढ़ी गई थी,

जो लंबे समय से समाज में चली आ रही थी। इन परिस्थितियों के मद्देनज़र ऐसे आंदोलनों का विकास होना लाजिमी था। इस नारीवादी आंदोलन की कड़ी में 1851 ई. में सोजोनर ट्रुथ द्वारा ओहियो में हो रहे श्वेत स्त्रियों के अधिवेशन में दिया गया जोरदार भाषण काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस भाषण को "क्या मैं औरत नहीं हूँ?” (Ain't I a Woman? ) के नाम से जाना जाता है। न्यूयॉर्क में जन्मी सोजोनर ट्रुथ ने इस मंच से अश्वेत स्त्रियों के जीवन के विभिन्न कष्टकारी और शोषणयुक्त पहलुओं और उनके प्रति होने वाले भेदभाव को सबके सामने रखा। उन्होंने अश्वेतों को अमेरीका से अलग देश ('दासों के देश') का निवासी बताते हुए उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की पुरजोर वकालत की और मानवता के पहरूओं के सामने अश्वेत स्त्रियों की सच्ची तस्वीर पेश की। उन्होंने अश्वेत स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर छायी चुप्पी को प्रश्नांकित किया और बताया कि अश्वेत स्त्रियों को मिलने वाले अधिकार ही पितृसत्ता से संघर्ष के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अश्वेत स्त्री कार्यकर्ताओं में अन्ना जूलिया कॉपर का नाम विशेष महत्व रखता है। इन्होंने 1894 ई. में वाशिंगटन डी.सी में "कलर्ड वुमेन्स लीग" (सी.डबल्यू.एल) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा वुमन्स क्रिश्चियन टेम्पेरेन्स यूनियन' (डब्ल्यू.सी.टी.यू) के संस्थापक सदस्यों में से एक रहीं।

इन्हें सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, व्याख्याता, शिक्षाविद एवं अश्वेत नारीवाद के आरंभिक सिद्धांतकारों के रूप में जाना जाता है। अश्वेत नारीवादी आंदोलनकारियों में मैरी मेक्लेओड बेथुने का नाम काफी महत्वपूर्ण है। इन्होंने अश्वेत स्त्रियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास किया, अश्वेत स्त्रियों में शिक्षा के प्रसार हेतु सर्वप्रथम उन्होंने नीग्रो लड़कियों के लिए "लिटरेरी एंड इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग स्कूल खोला और बाद में इसे विस्तार देकर बेथुने कुकमेन कॉलेज का नाम दिया गया। 1935 में इन्होंने 'नेशनल काउंसिल ऑफ नीग्रो वुमन' की स्थापना की। एक संघीय संस्था के माध्यम से नीग्रो समुदाय के जीवन से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण मामलों जैसे उनकी घरेलू सेवा, शिशु कल्याण, पत्रकारिता, शिक्षा, गैरकानूनी प्राणदंड और उनके वोट के अधिकार के मामले को उठाने वाली वह पहली स्त्री थीं। अश्वेत स्त्रीवादियों के क्रम में मैरी एन्न वेदर्स' का नाम भी हमारे सामने आता है। मैरी एन्न वेदर्स ने अश्वेत नारीवादी चिंतन को एक यथार्थवादी स्वरूप प्रदान किया। ये 1960 के दशक के नागरिक अधिकारों में शामिल रही थीं और बाद में अश्वेत नारीवादी आंदोलन से जुड़ी। इन्होंने अश्वेत स्त्रियों को संबोधित करते हुए कहा था कि – “आपकी लड़ाई के लिए कोई दूसरा लड़ने नहीं आएगा, बल्कि अपनी लड़ाई आपको स्वयं लड़नी होगी।” उन्होंने अश्वेत समुदाय के भीतर मौजूद पितृसत्ता को भी प्रश्नांकित किया। 1913 ई. में केन्याई महिला, ‘मैकतीलिली वा मेंजा' के नेतृत्व में गिरियामा समुदाय के लोगों द्वारा ब्रिटिश उपनिवेशवादी प्रशासन के खिलाफ किया गया संघर्ष अश्वेत नारीवादी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह आंदोलन मुख्यतः ब्रिटिश द्वारा लगाए जाने वाले करों के खिलाफ था। इस सशस्त्र विद्रोह और प्रतिरोध के फलस्वरूप स्त्रियों ने उपनिवेशवादी ताकतों के खिलाफ 1920 के दशक में अपना संगठन भी बनाया, जिनमें *लागोस मार्केट वुमन एसोशिएशन' (एल.एम.डब्ल्यू.ए), 'नाइजीरियन वुमन्स पार्टी' (1944) आदि शामिल थे। अश्वेत स्त्रियों द्वारा किए गए इन सशक्त संघर्षों ने अश्वेत नारीवादी आंदोलन के उभार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


अश्वेत नारीवादी आंदोलन का व्यवस्थित रूप, जिसमें उसके सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और जीवन से जुड़े विविध पहलुओं का समावेश था, 1970 के दशक में हमारे सामने आया। इसी समय अश्वेत नारीवाद की एक व्यवस्थित सैद्धांतिकी के साथ-साथ सक्रिय अश्वेत नारीवादी संगठनों का उदय हुआ। अश्वेत नारीवादी आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख घटनाक्रम को ऐतिहासिक क्रमानुसार यहाँ देखा जा सकता है-


• 1973 में न्यूयॉर्क में नेशनल ब्लैक फेमिनिस्ट ओर्गेनाइजेशन' की स्थापना 1973 में सैन फ्रांसिस्को में ‘ब्लैक वुमन ओर्गेनाइज्ड फॉर एक्शन' की स्थापना


• 1974 में बोस्टन में द कॉमबाही रिवर कलेक्टिव की स्थापना।


• 1977 में तीसरी दुनिया के लेस्बियनों के लिए एक साहित्यिक पत्रिका आजेलिया का पहली बार प्रकाशन।


• 1978 में 'वैरिड वायसेस ऑफ ब्लैक वुमन कन्सर्ट टूर


• 1979 में कॉमबाही रिवर कलेक्टिव ने 12 अश्वेत स्त्रियों के मारे जाने के खिलाफ बोस्टन में प्रदर्शन किया।


• 1980 में वाशिंगटन डीसी में थर्ड वर्ल्ड वुमन एंड वोयलेंस' विषय पर पहला राष्ट्रीय सम्मेलन ।


• 1980 में ओटारा न्यूजीलैंड में 'अश्वेत स्त्री हेतु' प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन ।


• 1981 में बर्कले में थर्ड वर्ल्ड विमेन्स क्लीनिक की स्थापना ।


• 1981 में किचन टेबल वुमन ऑफ कलर प्रेस की स्थापना ।


• 1981 में वाशिंगटन डीसी में 'ब्लैक विमेन्स सेल्फ हेल्प कलेक्टिव' की स्थापना। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न संगठनों और नागरिक अधिकार आंदोलनों में अश्वेत स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी ने संगठित होकर अश्वेत स्त्रियों के जीवन से जुड़े मुद्दों को उठाया, जिससे इस संबंध में चिंतन प्रक्रिया को बल मिला और इससे अश्वेत नारीवादी आंदोलन का सैद्धांतिक और व्यावहारिक विकास हुआ।