अश्वेत नारीवाद की समीक्षा - Black Feminism Review
अश्वेत नारीवाद की समीक्षा - Black Feminism Review
मुख्यधारा के नारीवादी आंदोलनों और अश्वेतों द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न आंदोलनों से अलग राह बनाते हुए अश्वेत नारीवाद' ने अपनी एक अलग सैद्धांतिकी तैयार की है। अपनी चिंतन परंपरा की स्वीकार्यता और उसे स्थापित करने के क्रम में अश्वेत नारीवादी सिद्धांत को तीन स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है-
• सर्वप्रथम इसे साधारण अश्वेत स्त्रियों के बीच अपने सिद्धांतों के प्रति विश्वास का भाव जगाना पड़ता है।
• दूसरा अश्वेत मध्यमवर्गीय और शिक्षित स्त्रियाँ जो सामान्यतः नारीवादी नहीं है, उनके बीच इस सैद्धांतिकी की स्वीकृति और
• तीसरा, जो सबसे अहम है कि 'यूरोसेण्ट्रिक' (यूरोकेंद्रित) और पुरुषवादी विचारधाराओं से अकादमिक जगत में ज्ञान मीमांसात्मक मुठभेड़ करना।
इसे देखते हुए कुछ आलोचकों का कहना है कि अश्वेत स्त्री द्वारा स्वयं को सिर्फ अश्वेत समूह के रुप में देखने की प्रवृत्ति के कारण यह नस्लीय पूर्वाग्रहों का शिकार हो गया है, जिससे इसके तार्किक आयाम कमजोर हुए हैं। वहीं नस्लीय भेदभाव के विरोधियों का मानना है कि अश्वेत स्त्री सिर्फ अश्वेत होने के कारण शोषित नहीं है, बल्कि स्त्री होने के साथ-साथ वह अश्वेत भी है, यह उसके दोहरे शोषण का प्रमुख कारण है। वास्तव में अश्वेत नारीवाद जिन परिस्थितियों की उपज है, उसमें नस्ल और लिंग के मुद्दे को प्रमुखता देना इसकी विशेषता है, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ अश्वेत नारीवाद की अवधारणा और समावेशी हो गई है, जिसे अश्वेत नारीवाद का तीसरा चरण कहा जा सकता है। इसमें अश्वेत स्त्रियों के विधिक मामले, उनके स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे एवं रोज़गार के अवसरों की उपलब्धता के संबंध में चिंतन और संघर्ष दोनों के स्तर पर कार्य किए जा रहे हैं।
अश्वेत नारीवादी आंदोलन का प्रभाव श्वेत स्त्रीवादियों और अश्वेत समुदाय के मध्य अलग-अलग है। नारीवादी आंदोलनों से जुड़ी अनेक श्वेत स्त्रीवादियों ने इस आंदोलन की जरूरत को स्वीकार करते हुए स्त्री जीवन में नस्ल, वर्ग और लैंगिक आधार पर शोषण की बात को भी स्वीकारा है।
इसी का परिणाम है कि अमेरीका एवं अन्य देशों के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के जेंडर स्टडीज़ केंद्रों में अश्वेत स्त्रियों के लेखन, उनके इतिहास और उनके संघर्ष को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। वहीं अश्वेत समुदाय बीच यह आंदोलन उतना प्रभावी नहीं है। अश्वेत समुदाय द्वारा चलाए जा रहे मुक्तिकामी आंदोलनों में अभी भी अश्वेत स्त्री से जुड़े मुद्दों को प्रभावी तरीके से नहीं उठाया गया है। अश्वेत अकादमिक समुदाय में 'जेंडर' के • प्रति संवेदनशीलता में तो बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन लोकप्रिय संस्कृति, विशेषकर रैप म्यूजिक इंडस्ट्री', जिसमें अनेक अश्वेत पुरुष लगे हुए हैं, वह स्त्री विरोधी होने के साथ-साथ लैंगिकता से प्रभावित भी है। अश्वेत स्त्रियों पर होने वाले किसी भी प्रकार के शोषण के खिलाफ संघर्ष और उससे मुक्ति की प्रतिबद्धता अश्वेत नारीवादी आंदोलन का मुख्य लक्ष्य है। अश्वेत महिलाएं एक विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को प्रश्रय देती हैं, जो उन्हें रोज-रोज के नस्लीय भेदभाव के खिलाफ प्रतिरोध और संघर्ष की प्रेरणा देता है। इस आंदोलन ने नारीवाद की एक अलग ज्ञान मीमांसा / चिंतन प्रणाली तैयार की है, जो अपने आप में बेहद समावेशी एवं शोषण के विविध रूपों को उजागर करने वाली है। इस आंदोलन को और व्यापक बनाने के लिए इसे अश्वेत समुदाय और तीसरी दुनिया के स्त्रियों से जुड़ाव को और बेहतर बनाना होगा एवं साथ ही इस आंदोलन को मुख्यधारा के नारीवादी आंदोलनों से संवाद की स्थिति भी बनानी होगी, ताकि यह अपने व्यापक सरोकारों की पूर्ति कर सके।
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