सामाजिक निर्माणवाद , सामाजिक निर्माणवाद की मुख्य विशेषताएँ
सामाजिक निर्माणवाद , सामाजिक निर्माणवाद की मुख्य विशेषताएँ
सामाजिक निर्माणवादी ज्ञान के निर्माण की उत्पत्ति सामाजिक अंतः क्रिया को मानते हैं, जहाँ वे अपने विचारों तथा अनुभवों को साझा करते हैं, तुलना करते है तथा वाद-विवाद करते हैं। इस सामाजिक अंतःक्रिया में प्रशिक्षु (सीखनेवाला) एवं परामर्शदाता (शिक्षक) के मार्गदर्शन में उत्तरोत्तर अधिक जटिल समझ एवं कौशल तथा अंततः स्वतंत्र क्षमता का निर्माण करता है। इस प्रक्रिया में सीखनेवाला अपने अर्थ को परिष्कृत करता है तथा दूसरों को भी उनके अर्थ को ढूँढने में सहायता करता है। सामाजिक निर्माणवाद व्यगोत्सकी के सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्त को प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित करता है। उनका माना था कि मानवीय गतिविधियाँ सांस्कृतिक परिवेश में घटित होती है तथा इन्हें इस परिवेश के बिना नहीं समझा जा सकता है। किसी व्यक्ति का विकास उसके सामाजिक साझा गतिविधियों (Socially Shared Activities) का आत्मसात्करण (Internalisation) प्रक्रिया में रूपांतरण है।
बच्चा समुदाय के व्यस्क या अधिक अनुभवी व सक्षम सदस्यों के साथ सहभागी संभाषण (co-operative dialogue) द्वारा समुदाय की संस्कृति (सोचने तथा व्यवहार करने के तरीके) को सीखता है। बच्चे के सांस्कृतिक विकास में कोई भी क्रिया दो बार उपस्थित होती है। पहले सामाजिक स्तर पर तथा बाद में वैक्तिक स्तर पर। साझा गतिविधियों में उच्च मानसिक क्रियाओं का सह-निर्माण होता है जिसे बाद में बच्चे द्वारा आत्मसात किया जाता है।
सामाजिक निर्माणवाद की मुख्य विशेषताएँ
1. सामाजिक निर्माणवाद की आधारभूत प्रकृति सामाजिक अंतः क्रिया है। संज्ञानात्मक निर्माणवाद के वैयक्तिक अन्वेषण की तुलना में सामाजिक निर्माणवाद में सामाजिक अंतःक्रिया द्वारा लोग अपने ज्ञान तथा अनुभवों को साझा करते हैं तथा उन पर विचार विमर्श कर किसी समस्या का समाधान निकालते हैं या नए ज्ञान का निर्माण करते हैं।
2. परिवेश जिसमें अधिगम की प्रक्रिया घटित होती है वह निर्मित ज्ञान या सोच से पृथक नहीं होता। किसी नए ज्ञान या कौशल को बच्चों के सामुदायिक अभ्यासों (Community Practices) से जोड़ा जाता है जहाँ इसे सीखा गया है या इसकी उत्पत्ति हुई है।
3. सामाजिक निर्माणवाद स्थापित अधिगम (Situated Learning) की अवधारणा को सम्मिलित करता है तथा इस बात पर जोर देता है कि वास्तविक दुनिया एक शिक्षुता (Apprenticeship) है जहाँ आरम्भ करनेवाला (Novice) किसी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में अधिक-से-अधिक उत्तरदायित्व लेता है तथा धीरे-धीरे वह कार्य को करने में सक्षम बन जाता है। यहाँ ज्ञान को वैयक्तिक संज्ञानात्मक संरचना के रूप में नहीं वरन कालांतर में समुदाय के विकास के रूप में देखा जाता है। इसमें सामुदायिक अभ्यास (Community Practices) तथा उपकरण Community Tools) जैसे- भाषा, संकेत एवं कोड आदि सामुदायिक ज्ञान में सम्मिलित होते हैं।
4. सामाजिक निर्माणवाद सामाजिक गतिविधियों को समझने तथा इस समझ पर आधारित ज्ञान के निर्माण के लिए संस्कृति तथा परिवेश के महत्व पर बल देता है।
5. अन्तः विषयनिष्ठता सामाजिक निर्माणवाद की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह किसी समूह या समुदाय के सदस्यों का साझा अवबोध है जो उनके उभय-निष्ठ अभिरुचियों तथा मान्यताओं पर आधारित होता है, जो उनके संप्रेषण के धरातल का निर्माण करता है। अन्तःविषयनिष्ठता लोगों को नई सूचना तथा गतिविधियों के अवबोध के विस्तार में भी सहायता प्रदान करता है।
6. सामाजिक निर्माणवाद में व्यक्ति द्वारा किसी समस्या का समाधान या उसके उच्च मानसिक प्रक्रियाओं का विकास समूह के वरिष्ठ सदस्य या अधिक अनुभवी तथा सक्षम मित्रों के साथ साझा गतिविधियों में संवाद तथा विचार-विमर्श द्वारा होता है।
उच्च मानसिक क्रियाएँ पहले अन्तःमनोवैज्ञानिक (Interpsychological) रूप से उत्पन्न होती है जिसे बाद में व्यक्ति दारा आत्मसात ( Intrapsychological) किया जाता है और यह व्यक्ति के संज्ञानात्मक संरचना ( Cognitive Structure) का अंश बन जाता है। व्यगोत्सकी के अनुसार सामाजिक अंतः क्रिया कई उच्च मानसिक क्रियाओं जैसे समस्या समाधान की उत्पत्ति है।
7. सामाजिक निर्माणवादी ऐसे उपकरणों पर जोर देते हैं जो किसी संस्कृति द्वारा चिन्तन को सहारा देने के लिए प्रदान किए जाते हैं। सांस्कृतिक उपकरण दो प्रकार के होते हैं वास्तविक उपकरण (जैसे- प्रिंटिंग प्रेस, रूलर, अबेकस, कंप्यूटर, इन्टरनेट आदि) तथा प्रतीकात्मक उपकरण (जैसे संख्या, भाषा, सांकेतिक भाषा, संकेत तथा कोड इत्यादि)। बच्चे विभिन्न दैनिक गतिविधियों में समुदाय के वयस्कों या अधिक सक्षम मित्रों/सहपाठियों के साथ अतः क्रिया द्वारा इन उपकरणों की समझ तथा कौशल विकसित करते हैं। वे इन गतिविधियों में विचारों तथा सोचने के तरीकों का आदान-प्रदान करते हैं- मानचित्र खींचना, संवाद के लिए संकेतों का उपयोग, अवधारणाओं का विभिन्न आकृतियों द्वारा चित्रण इत्यादि । भाषा संज्ञानात्मक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। यह विचारों की अभिव्यक्ति तथा प्रश्न पूछने का एक सशक्त माध्यम है। व्ययगोत्सकी के अनुसार भाषा बच्चों के संज्ञानात्मक विकास के लिए सहायक उपकरण के रूप में कार्य करता है- कठिन कार्यों का समाधान करने, किसी समस्या के समाधान की उसके क्रियान्वयन के पूर्व योजना तैयार करने, किसी व्यवहार की निपुणता अर्जित करने आदि में भाषा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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