बौद्धकालीन शिक्षा , बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्य - Buddhist Education , Purpose of Buddhist Education

बौद्धकालीन शिक्षा , बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्य - Buddhist Education , Purpose of Buddhist Education



वैदिक कालखंड में वैदिक धर्म प्रारंभ में अत्यंत सरल था। बाद में गुरुकुल पद्धति और ब्राह्मणा के एकाधिकार के कारण अनेक कर्मकांडो का समावेश हुआ।

फलतः वैदिक धर्म जटिल हाकर लुप्त होने लगा। जनता वास्तविक धर्म का भूलती गई। इस तरह वैदिक कालखंड के अंत में धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएँ आने लगी। इन्हीं समस्याओं एवं विषमताओं के सुधार के लिए बौद्ध धर्म का उदय हुआ। जिसका प्रभाव तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा। बौद्ध धर्म तत्कालीन जनता की भाषा में प्रचारित होने वाला तथा जन साधारण वाला धर्म था इसलिए बौद्ध धर्म का प्रचार और बौद्ध शिक्षा का विकास हुआ।


बौद्ध धर्म की पहचान:


बौद्ध दर्शन के संस्थापक गौतम बुद्ध है। इसका समय १२०० ई. तक माना जाता है। गौतम बुद्ध द्वारा स्थापित धर्म को बुद्ध धम्म कहते हैं।

धर्म और धम्म में मूलभूत अंतर बताया जाता है। धर्म में प्रार्थना है तो धम्म में बदना होती है। धम्म में देवी-देवताओं का काई अस्तित्व नहीं होता है। धर्म आस्तिकवादी है ता धम्म नास्तिकवादी है। धम्म पूर्वजन्म पर विश्वास नहीं रखता, यह धर्म के कर्मकांड को भी नहीं मानता।


बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्य:


बौद्धकाल में शिक्षा मठों और विहारों में दी जाती थी। बौद्धकाल में कर्मकांड एवं यज्ञ विधि का कोई स्थान नहीं था।


बौद्ध शिक्षा के उद्देश्य निम्न हैं:


1) बौद्धधर्म के तत्वों का ज्ञान प्राप्त करना।


(2) बौद्ध धर्म का प्रचार करना।


3) सत्य अहिंसा के आधार पर मानव समाज की स्थापना


4) माथ प्राप्ति


(5) चरित्र का निर्माण


6) व्यक्तित्व का विकास


(7) जीवन के लिए तैयारी


8) लौकिक एवं दैहिक सुखों का त्याग दिव्य मानवता की प्राप्ति।