बौद्ध दर्शन और शिक्षा - Buddhist philosophy and education

बौद्ध दर्शन और शिक्षा - Buddhist philosophy and education


बौद्ध दर्शन नैतिक जीवन का दर्शन है। बुद्ध का मानना है कि जिन विषयों के समाधान के लिए पर्याप्त प्रमाण न हो, उनके समाधान की चेष्टा व्यर्थ है। उन्होंने अप्रत्यक्ष एवं संदिग्ध विषयों के बारे में तर्क का परित्याग कियाक्योंकि उससे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। बौद्ध दर्शन जीवन में आचरण की पवित्रता पर बल देता है।


शिक्षा की संकल्पना


बुद्ध ने जीवन के चार आर्य सत्य बताए हैं दुःख दुःख समय, दुःख निरोध और दुःखनिरोधगामी प्रतिपद। इस संसार में दुःख ही दुःख है। अतः अज्ञान और उससे प्राप्त दुखों को दूर करने का मार्ग जानना ही बोध अथवा शिक्षा है। बौद्ध दर्शन के अनुसार जीवन में दुःख है और शिक्षा इन दुखो को दूर करने का मार्ग बताती है। इसके अतिरिक्त बौद्ध दर्शन में शिक्षा की संकल्पना आत्मज्ञान अथवा आत्म-बोध के रूप में भी की गई है।


शिक्षा के उद्देश्य


भगवान बुद्ध ने सद्जीवन के लिए जो अष्टांग मार्ग प्रदर्शित किया है, उसी को हम शिक्षा के विशिष्ट उद्देश्य के रूप में देख सकते हैं -


• सम्यक दृष्टि


• सम्यक संकल्प


• सम्यक बाक


• सम्यक् कर्म


• सम्यक आजीविका


• सम्यक व्यायाम


• सम्यक् स्मृति


• सम्यक समाधि 


कालांतर में बौद्ध शिक्षा प्रणाली में जिन व्यावहारिक उद्देश्यों को स्थान प्राप्त हुआ है वे निम्न प्रकार से हैं-


• व्यक्तित्व का विकास 


• नैतिक जीवन


• सर्वागीण विकास


• संस्कृति का संरक्षण


पाठ्यचर्या


बौद्ध दर्शन के अनुसार यह जगत् परिवर्तनशील ईससार में कुछ भी स्थायी नहीं है। बौद्ध दर्शन का मूल आग्रह दुःखवाद तथा दुःख से मुक्त होने के उपाय तक सीमित रहा। इस परिप्रेक्ष्य में बौद्धदर्शन के अनुसार शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम निम्न प्रकार से देखा जा सकता है-


• चार आर्य सत्यों का पूर्ण परिपाक इसके अंतर्गत विश्व की व्यवस्था, जगत में मनुष्य का स्थान, जगत की परिवर्तनशीलता तथा क्षणिकता इत्यादि गहन अध्ययन आते हैं। 


• सम्यक् रूप से आजीविका उपार्जन की कला।


• बौद्ध साहित्य का अध्ययन


• भगवान बुद्ध तथा अन्य संत चरित्रों का अध्ययन


 शिक्षण-विधि


 बौद्ध विहारों में शिक्षा प्रदान करने की तीन प्रमुख विधियों का उल्लेख मिलता है जो निम्न है-


• अध्यापक द्वारा शिक्षार्थियों के छोटे समूह में शिक्षा


• व्याख्या


• चर्चा


 सामूहिक अध्ययन


अध्यापन के अतिरिक्त वैयक्तिक अध्ययन-विधियों का विवेचन भी मिलता है। जैसे


• तथ्यों को स्मरण करना तथा उनका संचय करना।


• अध्ययन की गई सामग्री पर बार-बार मनन करना।


• मनन के पश्चात् आत्मसात् की हुई सामग्रीको दृढ़ता के साथ धारण करना । इनके अतिरिक्त वार्तालाप विधि, भ्रमण-विधि, उपदेश-विधि, प्रायोगिक विधि, बाह्य क्रिया विधि आदि भी बौद्ध शिक्षा की प्रमुख विधियों है।


अध्यापक छात्र-संकल्पना-बौद्ध दर्शन के मध्यमा प्रतिपदा सिद्धांत के अनुसार विद्यार्थी का अतीत साथ-साथ उसका भविष्य भी है। छात्र का वर्तमान अस्तित्व उसके पूर्वजन्म के कर्म तथा बाल्यावस्था के संस्कारों पर निर्भर है। छात्र का भविष्य उसके वर्तमान सकल्पों तथा कर्मों पर निर्भर है। भावी विकास की क्षमताएँ वर्तमान अस्तित्व में विद्यमान है। भावी कार्य के बीज वर्तमान कारण में विद्यमान रहते हैं। बौद्ध दर्शन के अनुसार शिक्षाम्प्राप्त करना प्रत्येक मानव का अधिकार है। निर्वाण को प्रशस्त करने बाली शिक्षा सबको सुलभ होनी चाहिए।


बौद्ध-दर्शन के अनुसार बही व्यक्ति शिक्षक हो सकता है जिसने चार आर्यसत्यों को समझ लिया है तथा जिसका स्वयं का जीवन बुद्ध द्वारा प्रदर्शित अष्टांग मार्ग के अनुरूप व्यतीत होता है। जैनदर्शन के अनुरूप इस दर्शन में भी शिक्षकों के दो भिन्न स्वरूपों की चर्चा की गई है। आचार्य छात्रानुशासन का अधिकारी होता है तथा उपाध्याय अध्ययन-अध्यापन का बौद्ध शिक्षा प्रणाली में शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक शिष्य के लिए किसी को गुरु बनाना अनिवार्य है।