बजट का वर्गीकरण - budget classification
बजट का वर्गीकरण - budget classification
बजट को अनेक दृष्टिकोण से वर्गीकृत किया जा सकता है, बजट वर्गीकरण का निम्न आधार पर ही प्रयोग में लाया जाता है:
(अ) समय के आधार पर
(ब) क्रियाओं के आधार पर
(स) लचीलापन कारक के आधार पर
(द) व्यावसायिक क्रिया प्रकृति के आधार पर
(अ) समय के आधार पर समय के दृष्टिकोण से बजट मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं:
(i) दीर्घकालीन बजट संस्था एक निश्चित दीर्घकाल में क्या करना और संचालन को किस ढंग से चलाना चाहती है- इसके सम्बन्ध में निर्मित दीर्घकालीन योजनाओं को निरूपित करने वाले बजट को ही दीर्घकालीन बजट कहते हैं। अधिकांशतः पांच से लेकर दस वर्षों तक की योजनाओं का वर्णन इस प्रकार के बजट में किया जाता है। इस प्रकार के बजट अधिकांशतः भौतिक मात्राओं की इकाई में ही तैयार किये जाते हैं, रुपये की इकाई में नहीं
(ii) अल्पकालीन बजट: जब संस्था एक या दो वर्षों के लिए अपनी संचालन क्रियाओं के सम्बन्ध में योजना बनाती हैं, तो इन योजनाओं के आधार पर तैयार किये गये बजट अल्पकालीन बजट कहलाते हैं। ये बजट हमेशा मौद्रिक इकाई में तैयार किये जाते हैं।
(iii) चालू बजट : ये एक प्रकार के अल्पकालीन बजट ही होते हैं। परन्तु इनकी अवधि एक माह या इससे अधिक होती है। इनका निर्माण अल्पकालीन बजट के अनुसार आवश्यक समायोजन करके किया जाता है। कुछ संस्थाएं अपने यहां मासिक बजट भी तैयार करती है इन्हें भी चालू बजट के रूप में माना जा सकता है।
(ब) क्रियाओं के आधार पर इस आधार पर बजट निम्न प्रकार के हो सकते हैं :
(i) मास्टर बजट या सारांश बजट : मास्टर बजट को सामान्यतः अन्य विभागीय विस्तृत बजटों के सारांश के रूप में माना जा सकता है। परन्तु इसके सम्बन्ध में लेखापालकों की राय में भिन्नता है और इसके सम्बन्ध में दो दृष्टिकोण पाये जाते हैं: प्रथम, कुछ लेखापालकों का विचार है कि बजटेड लाभ हानि और आर्थिक चिट्ठा को ही मास्टर बजट मानना चाहिए। लाभ-हानि द्वारा बजट अवधि के लिए अनुमोदित लाभ प्रकट होता है।
जबकि आर्थिक चिट्ठा पूंजी, दायित्व व सम्पत्ति का सारांश दर्शाता है। मास्टर बजट का दूसरा अर्थ, जो बहुत ही व्यापक है, यह है कि सभी विभाग पहले अलग-अलग विस्तृत बजट तैयार करते हैं और फिर उनका संक्षिप्त विवरण एक पृथक बजट में हस्तान्तरित कर दिया जाता है। इस दशा में मास्टर बजट बजट अवधि की पूरी योजना को चित्रित करता है। इस बजट में साधारणतः विक्रय उत्पउदन, लागत, लाभ, लेखा अनुपात लाभ नियोजन आदि सूचनाएं शामिल की जाती हैं। मास्टर बजट व्यवसाय के विभाग क्षेत्रों में अपेक्षित क्रियाओं का चित्रण करता है तथा सामान्यतः उच्च अधिकारियों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। इस प्रकार मास्टर बजट एक समन्वय करने वाला बजट होता है।
(ii) क्रियात्मक बजट या सहायक बजट : प्रत्येक विभाग या क्रिया के लिए अनुमोदित पूर्वानुमानों के आधार पर तैयार किये गये बजट क्रियात्मक या विभागीय या सहायक बजट कहलाते हैं।
व्यवसाय-दर-व्यवसाय ऐसे बजटों की संख्या बदलती रहती है। सामान्यतः सहायक बजटों में विक्रय बजट उत्पादन बजट, विक्रय व वितरण अप्रत्यक्ष व्यय बजट, उत्पादन लागत बजट सामग्री बजट श्रम बजट, प्लांट बजट, अनुसंधान व विकास बजट, वित्तीय बजट, आदि को शामिल करते हैं।
(स) लचीलापन कारक के आधार पर इसके आधार पर बजट दो प्रकार के हो सकते हैं:
(i) स्थायी या स्थैतिक बजट: यह वह बजट होता है जिसमें निर्धारित लक्ष्य ठोस रूप में स्थिर या स्थायी होते हैं। इस प्रकार के बजट, जिस वर्ष से सम्बन्धित होते हैं,
उसके एक से तीन माह की अग्रिम रूप में तैयार कर लिये जाते हैं। परिणामस्वरूप बजट व वास्तविक परिणाम की तुलना में करीब 12 माह का अन्तर पड़ जाता है। इस दौरान अनेक घटनाएं घटित हो सकती हैं और जो पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को तुलना के अयोग्य बना सकती है। इस प्रकार का बजट वहां पर ही तैयार करना चाहिए, जहां पर विक्रय के सम्बन्ध में पूर्ण शुद्धता के साथ अनुमान लगाया जा सकता हो और लागत व व्यय को शुद्धता के साथ निर्धारित किया जा सकता हो।
(ii) लचीला बजट : इस प्रकार के बजट में प्रयुक्त लागत व व्यय के समंकों में किसी भी माह में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार परिवर्ततन किया जा सकता है न्यूनतम से लेकर अधिकतम संचालन स्तर तक के विभिन्न स्तरों पर प्रमाप लागत के आधार पर लागत व व्ययों का अनुमान लगा लिया जाता है।
इस रूप में एक लचीले बजट का प्रयोग पूर्ण वित्तीय वर्ष के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। आधारभूत में लचीला बजट का यह सिद्धान्त है कि उत्पादन के विभिन्न स्तर पर बजटेड व वास्तविक खर्चों की तुलना की जा सके। इस प्रकार लचीला बजट का विकास इसलिए किया गया है कि वास्तविक उत्पादन स्तर बजट समंकों को आनुपातिक रूप से परिवर्तित किया जा सके। उदाहरण के लिए, एक लचीले बजट का निर्माण 60 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक उत्पादन क्षमता के लिए किया गया है। यदि वास्तविक उत्पादन 90 प्रतिशत है, तो 90 प्रतिशत पर निर्धारित बजट समंकों की तुलना वास्तविक समंकों से की जा सकती है। स्थायी बजट में ऐसी तुलना सम्भव नहीं होती है।
(द) व्यावसायिक क्रिया की प्रकृति के आधार पर व्यवसाय में सम्पन्न विभिन्न क्रियाओं का निरूपण एक अन्य दृष्टि से भी किया जा सकता है।
कुछ क्रियाएं सुविधाओं (साधनों) का सृजन करती हैं और कुछ क्रियाएं संचालन को सम्भव बनाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर बजट को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है-
(i) पूंजी खर्च बजट जो बजट निर्माणी सुविधाओं के सृजन सम्बन्धी योजनाओं से सम्बन्धित होते हैं, उन्हें पूंजी खर्च बजट कहते हैं।
(ii) संचालन बजट या आयगत बजट जो बजट दैनिक कार्यों की योजनाओं से सम्बन्धित होते हैं, उन्हें संचालन बजट कहते हैं। दैनिक कार्यों में बिक्री, उत्पादन, लागत व लाभ, आदि को शामिल करते हैं।
अभी तक बजट वर्गीकरण के विभिन्न आधारों व उनके तत्स्वरूप प्रकारों का वर्णन किया गया है। व्यवहार में एक ही बजट विभिन्न आधारों पर कई स्वरूप ग्रहण कर सकता है।
उदाहरण के लिए, तीन वर्ष के लिए तैयार एक विक्रय बजट (उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर) अल्पकालीन, लचीला व संचालन बजट कहलायेगा ।
कुछ विशेष प्रकार के बजट की बनाने की प्रक्रिया उपयुक्त उदाहरणों द्वारा निम्न प्रकार से समझायी गयी है:
(ii) लचीला बजट का निर्माण: यद्यपि लचीला बजट की अवधारण व सिद्धान्त किसी भी क्रियात्मक बजट पर लागू किया जा सकता है, सामान्यतः इसे उत्पादन लागत बजट पर लागू करते हैं। उत्पादन लागत बजट को लचीला बजट के रूप में तैयार करने हेतु यह आवश्यक होता है
कि अप्रत्यक्ष व्ययों को स्थिर, अर्द्ध-स्थिर एवं परिवर्तनशील वर्गों में बांट दिया जाये। ऐसा करना इसलिए महत्वपूर्ण होता है कि उत्पादन के विभिन्न स्तरों का प्रत्येक वर्ग के अप्रत्यक्ष व्यय पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। यह मान्यता होती है कि उत्पादन या विक्रय के स्तर पर परिवर्तन का स्थिर व्यय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, अर्द्ध-स्थिर व्यय उत्पादन स्तर में परिवर्तन होने पर परिवर्तित तो होते है, परन्तु समान अनुपात में नही । परिवर्तनशील व्यय उत्पादन या विक्रय के स्तर में होने वाले परितर्वन के अनुपात में ही परिवर्तित होते हैं। इस प्रकार लचीला बजट बनाते समय अर्द्ध-स्थिर व्यय व परिवर्तनशील व्यय की गणना उत्पादन के विभिन्न स्तरों के लिए करनी पड़ती है। परिवर्तनशील व्यय की गणना उत्पादन स्तर में परिवर्तन के अनुपात में की जाती है, अर्द्ध-स्थिर व्यय का विश्लेषण करके पता लागया जाता है कि उनमें परितर्वन की प्रवृत्ति क्या है? इस प्रकार के व्यय का कुछ भाग स्थिर रहता है और कुछ परिवर्तनशील परिवर्तनशील अंश की रकम उत्पादन स्तर के परिवर्तन के अनुपात में निकालकर स्थिर अंश की रकम में जोड़ दी जाती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ये व्यय कुछ उत्पादन स्तर तक अपरिवर्तित रहते हैं और उसके बाद भिन्न-भिन्न स्तर - अन्तर पर भिन्न-भिन्न दर से परिवर्तित होते हैं।
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