पूंजीकरण के सिद्धांत - capitalization principle

पूंजीकरण के सिद्धांत - capitalization principle


पूंजीकरण का आशय, परिभाषा


व्यावसाय उद्योग को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु आवश्यक वित्तीय राशी का सुनिच्छित निर्धारन कर उसे प्राप्तस करने हेतु उचित स्त्रोतों का निर्धारन किया जा है, इसे सामान्यतः अर्थ से पूजीकरण कहते है।


अ) गरस्टेन बर्ग के अनुसार पूंजीकरण में, व्यवसायिक संस्थान की खुद मालकी हक्क पूंजी / राशी एवं व्यवसायीक संस्थान ने उधार ली हुई पूंजी / राशी ऐसे दोनों प्रकार के पूंजी / राशी का समावेश होता है।


ब) गुथर्मन एवं डग्गल के अनुसार, "व्यवसायीक कंपनी के एवं ऋणपत्रों के सममुल्यश का योग ही पूंजीकरण है।


क) गिल्वमर्ड हॅरोल्डग के अनुसार निम्नलिखित किसी भी एक आशय से पूंजीकरण का अर्थ स्पष्ट किया जा सकता है।


i) किसी विशेष कालावधी के अदत्तड प्रतिभूतीयों (Securities) अश ( Shares) एवं ऋणपत्रों (Debenture) इनके सममूल्यों का कुल योग को पूंजीकरण कहते हैं।


ii) "किसी विशेष कालावधी के सभी अदत्त प्रतिभूतीयों के कुल सममुल्य एवं सभी दिर्घकालिन देयताथों का मूल्याकन पूंजीकरण कहते है।


iii) "व्यावसाय उद्दोग की कुल पूजी एवं देयता की कुल राशी को पूंजीकरण कहते है।